प्रखर अरोड़ा
भारत में राजदंड को सत्ता की पावर का प्रतीक मानने की शुरुआत चोलवंश से मानी जाती है, देश के प्राचीन इतिहास में राजदंड की परिकल्पना रही है. ऐतिहासिक ग्रंथ बताते हैं कि हर राजाभवन में एक राजदंड होता था, जिस पर अधिकार राजा का होता था. यह राजदंड जिसके पास होता था, वही साम्राज्य का अधिपति होता था. यह माना जाता था कि राजदंड से कभी गलत निर्णय नहीं दिए जा सकते.
सेंगल शब्द, संस्कृत के संकु से बना है, जिसका अर्थ शंख है. इसे संप्रभुता का प्रतीक माना जाता है. यह धातुओं से बना एक दंड होता था, जिसे राजकीय आयोजनों में राजा अपने साथ रखते थे. मौर्य, गुप्त से लेकर चोल और विजयनगर साम्राज्य तक में इस राजदंड का इस्तेमाल हुआ है. मुगल साम्राज्य में भी अकबर ने सेंगोल राजदंड का इस्तेमाल किया था. इसे नए संसद भवन में रखा जाएगा.
*सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक है सेंगोल :*
’14 अगस्त 1947 को एक अनोखी घटना हुई थी. इसके 75 साल बाद आज देश के अधिकांश नागरिकों को इसकी जानकारी नहीं है. सेंगोल ने हमारे इतिहास में एक अहम भूमिका निभाई थी. यह सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक बना था.
सेंगोल पर नंदी होने का अर्थ :
हिंदू व शैव परंपरा में नंदी को शक्ति-सम्पन्नता व समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह समर्पण राजा और प्रजा दोनों का राज्य के प्रति लगाव को दर्शाता है। शिव मंदिरों में नंदी हमेशा शिव के सामने स्थिर मुद्रा में बैठे हुए होते हैं। हिंदू मिथकों के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पति शिवलिंग से हुई मानी जाती है।
इस प्रकार नंदी की स्थिरता को शासन के प्रति अडिग होने का प्रतीक माना गया है। इसके अतिरिक्त नंदी के नीचे वाले भाग में देवी लक्ष्मी व उनके आस-पास हरियाली के तौर पर फूल-पत्तियां, बेल-बूटे के चित्र उकेरे गए हैं, जो कि राज्य की संपन्नता व कृषि संपदा के प्रतीक हैं|
*सेंगोल का आधुनिक इतिहास आजादी से संबद्ध :*
जब भारत को आजादी मिली तो भारत के आख़िरी वायसरॉय माउंटबेटेन ने पं. जवाहर लाल नेहरू से पूछा कि भारत की बागडोर ब्रिटिश से लेकर भारत को कैसे सौंपी जायें? नेहरू ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजा जी ) से सता हस्तांतरण के बारे में सलाह ली| तब राजगोपालाचारी ने कहा कि सदियों पहले दक्षिण भारत की चेरा, चोला और पंड्या वंशों में जिस तरह सत्ता का हस्तांतरण किया जाता था ठीक उसी तरह अंग्रेज़ों से भारत को सत्ता सौंपी जानी चाहिए| राजा जी ने बताया कि चोल साम्राज्य में इस परंपरा का पालन किया जाता था|
राजा जी का सुझाव मानकर उन्हें ‘भारत की स्वाधीनता का प्रतीक चिह्न’ बनाने का कार्य दे दिया गया था| राजा जी थिरुवावादुथुरई (चेन्नई ) अधीनम मठ के मठाधीश के पास पहुंचे| मठाधीश ने वुम्मिदी बंगारू ज्वैलर्स को राजदंड बनाने की जिम्मेदारी दे दी|
वुम्मिदी बंगारू चेट्टी ने ‘सैंगोल’ तैयार करके अधीनम के प्रतिनिधि को दे दिया। अधीनम के नेता ने वह सैंगोल पहले लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। फिर उनसे वापस लेकर 15 अगस्त 1947 के शुरू होने से ठीक 15 मिनट पहले स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दे दिया। इसे बाद में इलाहाबाद म्यूज़ियम में नेहरू द्वारा इस्तेमाल की गई अन्य वस्तुओं के साथ रखा गया |
*क्या है राजदंड का औचित्य :*
राज्याभिषेक के बाद किसी भी राजा को पहले ताज पहनाया जाता है और फिर छड़ी थमाई जाती है. भारत में यदि यह प्रक्रिया हो तो ताज पहनाने से पहले तिलक भी किया जाता है. ऐतहासिक तथ्यों पर गौर करें तो राजा उसी को माना जाता था जिसके सिर पर ताज होता था. इस ताज को राज्य के अधिकार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन राज्य से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार तभी मिलता था जब राजा के हाथ में राजदंड होता था. पुरातन काल में यदि राजा किसी और को राज्य का प्रभार देकर कहीं यात्रा पर भी जाता था तो उस व्यक्ति को राजदंड सौंपना पड़ता था.
महाभारत में भी है राजदंड :
महाभारत के अध्याय शांतिपर्व के राजधर्मानुशासन अध्याय में भी राजदंड का उल्लेख है, इसमें अर्जुन ने युधिष्ठिर को राजदंड की महत्ता समझाई थी. अर्जुन ने कहा था कि- ‘राजदंड राजा का धर्म है, दंड ही धर्म और अर्थ की रक्षा करता है. इसीलिए राजदंड को आप धारण करें. यहां राजदंड का आशय राजा के द्वारा दिए जाने वाले दंड से भी लगाया गया है. इसमें अर्जुन कहते हैं कि- ‘कितने ही पापी राजदंड के भय से पाप नहीं करते, जगत की ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है, इसीलिए सबकुछ दंड में ही प्रतिष्ठित है.
*भारत में सेंगोल यानी राजदंड :*
सेंगोल यानी समृद्धि का प्रतीक राजदंड। ये जिसे मिलता है उससे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन की उम्मीद की जाती है। सेंगोल का पहला इस्तेमाल मौर्य साम्राज्य (322 से 185 ईसा पूर्व) में मिलता है।
इसके बाद गुप्त साम्राज्य (320 से 550 ईस्वी), चोल साम्राज्य (907 से 1310 ईस्वी) और विजयनगर साम्राज्य (1336 से 1646 ईस्वी) में भी सेंगोल का इस्तेमाल किया गया। माना जाता है कि मुगलों और अंग्रेजों ने भी सेंगोल का इस्तेमाल अपने अधिकार के प्रतीक के रूप में किया।
*दुनिया की सभ्यताओं में राजदंड का इतिहास :*
राजा के हाथ में राजदंड देने की परंपरा दुनिया के कई देशों में हैं. ऐसा कहा जाता है कि 1661 में सबसे पहले चार्ल्स द्वितीय के राज्याभिषेक के दौरान सॉवरेन्स ऑर्ब बनवाया गया था. हाल ही में किंग चार्ल्स III के राज्याभिषेक समारोह में भी इसका प्रयोग किया गया था. मिस्र में भी राजदंड को राजा की शक्तियों का केंद्र माना जाता था.
इसे वहां वाज नाम दिया गया था. मेसोपोटामिया में राजा के हाथ में रहने वाला गिदरु ही राजदंड था. इसके अलावा रोमन राजाओं के हाथ में भी राजदंड थमाया जाता था. खास बात ये है कि रोमन साम्राज्य में महत्पूर्ण पदों पर रहने वाले लोगों को भी राजदंड दिया जाता था जो उनकी अलग-अलग शक्ति दर्शाता था.
1661 में चार्ल्स द्वितीय के राज्याभिषेक के लिए इंग्लैंड की रानी का ‘सॉवरेन्स ओर्ब’ बनाया गया था। यह 362 साल बाद, आज भी राज्याभिषेक के समय नए राजा या रानी को दिया जाता है। यह एक सोने से बना वृत्त है जिस पर एक क्रॉस चढ़ा हुआ है और जो सम्राट को यह याद दिलाता है कि उनकी शक्ति भगवान से ली गई है.
अपने सिंहासन पर फारस के महान डेरियस की नक्काशी, जिसमें वो एक राजदंड और कमल पकड़े हुए दिख रहे हैं।
अपने सिंहासन पर फारस के महान डेरियस की नक्काशी, जिसमें वो एक राजदंड और कमल पकड़े हुए दिख रहे हैं।
मेसोपोटामिया :
मेसोपोटामिया सभ्यता में राजदंड को ‘गिदरु’ कहा गया है. इस सभ्यता में इसे देवताओं की सत्ता और उनकी शक्तियों के प्रतीक के रूप में देखा जाता था।
मेसोपोटामिया की प्राचीन मूर्तियों और वहां के अभिलेखों में इसका जिक्र मिलता है।
ग्रीक रोमन :
ग्रीक-रोमन परंपरा में जेयूस और ओलंपस जैसे देवताओं की शक्ति की निशानी के रूप में उनके साथ एक लंबा राजदंड होता था।
जज, मिलिट्री लीडर्स, पुरोहित और राज्य के शक्तिशाली लोग राजदंड का इस्तेमाल करते थे। यह उनकी शक्ति का प्रतीक होता था।
रोमन साम्राज्य के राजा हाथी दांत से बने ‘सेपट्रम अगस्ती’ नाम के राजदंड का इस्तेमाल करते थे।
इजिप्ट :
प्राचीन इजिप्ट यानी मिस्र में भी राजदंड शक्ति और सत्ता का प्रतीक था। ‘वाज’ नाम के राजदंड का जिक्र वहां के अभिलेखों में मिलता है।

