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मातृ दिवस के मौके पर, सो मुझे अब पढ़ना है

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मुनेश त्यागी

सो मुझे अब पढ़ना है
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बिना अनुरोध के, बिना प्रतिरोध के,
बिना विद्रोह के, बिना विरोध के,
यहां नहीं कुछ मिलना है
बस मरना और मिट जाना है
सो मुझे अब पढ़ना है।

मैं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,
सांसद, विधायक, मेयर
पंचायत सदस्य, प्रधान, पार्षद,
सब कुछ चुन सकती हूं,
पर नही चुन सकती अपना पति,
यही मुझे अब जानना और जनाना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

मां, बहना और पत्नी हूं,
साथी, सखी, सहयोगिनी हूं,
मानवता की जननी हूं,
फिर भी गर्भ में मरने को अभिशप्त हूं,
मुझे अपने हत्यारों को,
अब जानना और पहचानना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

बिना लड़े कभी कुछ कहा मिला?
लड़ाई की तैयारी में अब लगना है,
बिना झुके अब लड़ना है,
बिना रुके अब चलना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

चुप्पी को मैं तोड़ूंगी,
और नहीं चुप रहना है,
बहुत सहा और भोगा है,
और नहीं अब सहना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

खेतों में, खलिहानों में,
धरती और आसमानों में,
इच्छाओं में, अरमानों में,
कविता और अफसानों में,
सभी जगह डटे रहना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

कोई मुझ पर कसे फब्तियां,
कोई मुझे जलाता है,
कोई मुझसे दहेज मांगता,
कोई मुझ को रौंदता है,
मुझे इन शैतानों से अब,
लड़ना और हराना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

सारे अवरोधों को तोड़ना है,
सारी रुकावटों को लांघना है,
और जहां हो साम्राज्य,,
आजादी का, समता का,
इंसाफ का और ममता का,
ऐसी दुनिया को अब गढना है।
सो मुझे अब पढ़ना है।

मम्मी, सखी और बहना आ,
पापा और ओ! भैया आ,
बंधनों को अब तोड़ना है,
संगठन और संघर्ष के,
दायरे को और बढ़ाना है,
सो मुझे अब पढ़ना है।

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