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सौंदर्य-प्रशाधन इंडस्ट्री और आप : फेयर-एंड-लवली के बहाने

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पुष्पा गुप्ता 

    _अब 45 सालों से भारत में बिकने वाली ‘फ़ेयर एंड लवली’ क्रीम का नाम आने वाले समय में बदल जाएगा. इसके साथ ही विज्ञापन में इसके ‘गोरा या गोरेपन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं होगा।_

      “अपने स्किन केयर ब्रैंड्स के ग्लोबल पोर्टफोलियो को ले कर हम पूरी तरह से समर्पित हैं। ये सभी रंगों और तरह के स्किन टोन्स का ख्याल रखेगी। 

      हम ये समझते हैं कि ‘फ़ेयर’, ‘व्हाइट’ और ‘लाइट’ जैसे शब्द ख़ूबसूरती के एकतरफ़ा नज़रिये को बयान करते हैं। हमें नहीं लगता कि 

ये सही है और हम इस पर ध्यान देना चाहते हैं…!”

      ये बयान हिन्दुस्तान यूनीलिवर लिमिटेड कम्पनी के ब्यूटी और पर्सनल केयर डिविज़न के प्रेसीडेंट सन्नी जैन का है। 

     यूनीलिवर ने 25 जून को एक बयान जारी कर कहा कि वो आने वाले समय में ‘फ़ेयर एंड लवली’ ब्रैंड का नाम बदल देगी। साथ ही गोरा या गोरेपन जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने उत्पादों और विज्ञापनों में नहीं करेगी।

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वास्तव में, त्वचा के रङ्ग को ले कर 

भारतीय जनमानस में कुण्ठा कोई नयी बात नहीं है। आज भी गोरे रङ्ग व गोरे लोगों को स्वाभाविक रूप से 

श्रेष्ठ माना जाता है। आज भी हमारे यहाँ शादी के लिए लड़की का रङ्ग महत्वपूर्ण पैमाना होता है। अधिकाँश मां-बाप गोरी लड़कियों को ही तरजीह देते हैं।

    कुछ लोग तर्क देते हैं, 150 साल तक गोरों (अँग्रेजों) की गुलामी ने हमारे भीतर काल और साँवले रङ्ग के प्रति हीनभावना भर दी है। हमारे अवचेतन ने अँग्रेज, अँग्रेजी, अँग्रेजियत को 

अपने से श्रेष्ठ स्वीकार कर लिया है। 

       इसीलिए हमारे भीतर गोरे रङ्ग को ले कर इतना लगाव है. यह बात कितनी सच है, यह तो नहीं पता, 

लेकिन गोरे रङ्ग के चाहने वाले सारी दुनिया में हैं।

     जैसे ये ज़रूरी है कि लड़के को लड़की से ज़्यादा कमाना ही चाहिए। लड़के की लम्बाई लड़की से ज़्यादा होनी ही चाहिए। शादी तो धूमधाम से होनी ही चाहिए। टीचर से सवाल होना ही नहीं चाहिए। वैसे भी किसी से सवाल करना ही क्यों है। 

       और सब से ज़रूरी बात, शादी के विज्ञापन में लड़की को गोरी, पतली, लम्बी लिखना ही चाहिए।अगर गोरी नहीं है तो कोई और रङ्ग ना लिखें, उसे छिपा लें।

ऐसा क्यों ?

ऐसा इसलिए क्योंकि जब इस देश के सेलिब्रिटीज के लिए गोरा होना और गोरा होने की चाह रखना नॉर्मल है तो आम लोगों के लिए तो ये अनिवार्यता ही होगी। काले रङ्ग की वजह से आपकी शादी में अड़चन होना भी सामान्य है, क्योंकि आपके जीवन का उद्देश्य तो शादी ही है ना ये ‘नॉर्मल’ हमारे दिमाग में इतना ठूँसा जा चुका है कि इस गम्भीर मुद्दे को नज़रअन्दाज़ करना भी ‘नॉर्मल’ है।

दरअसल, कुछ लोग समझ नहीं पाते हैं कि एक आम इन्सान को सिर्फ उसके रङ्ग की वजह से कितना कमतर और हीन महसूस करवाया जाता है।

      एक घटना याद आई. वर्ष 2015 में जब कुछ नर्स भूख हड़ताल पर थीं और तत्कालीन मुख्य मन्त्री लक्ष्मीकान्त पारसेकर से मिलने गयीं तो पारसेकर जी ने उन्हें सलाह दे डाली कि धूप में बैठ कर हड़ताल ना करो, रङ्ग काला हो जायेगा और फिर बढ़िया दूल्हा नहीं मिलेगा।

     अरे दूर क्यों जा रहे हैं अपने घर में ही देख सकते हैं। घर में ही एक बहन गोरी और एक काली या जिसे साँवली भी कहते हैं, तो माँ-बाप बचपन से ही सिखा देते हैं कि गोरी वाली की तो आराम से शादी हो जाएगी, साँवली के लिए मुश्किल होगी।

      साँवली लड़की के लिए दहेज ज़्यादा देते हैं। जैसे कि कोई भरपायी हो जाएगी। ये सारे उदाहरण हर घर में मौजूद हैं।

सोचिये : दुनिया के इतने बड़े स्टार माइकल जैक्सन अश्वेत थे, बराक ओबामा अश्वेत हैं, एगबानी डेरेगो पहली अश्वेत मिस वर्ल्ड बन चुकी हैं. हमारे देश के खिलाड़ियों को ले लीजिये। पी वी सिन्धु या महेन्द्र सिंह धोनी या साक्षी मलिक  गोरे रङ्ग की श्रेणी में तो नहीं ही हैं। 

       इन सबकी सफलता में इनके रङ्ग की क्या प्रासंगिकता है। दरअसल,

जहाँ एवरेज लोगों की भीड़ ज़्यादा होगी, वहाँ एक ख़ास साइकोलोजी ज़रूर होगी।

     आप खुद को दूसरे से बेहतर दिखाने के लिये या समझने के लिए जाति, धर्म, रङ्ग तक का सहारा ले सकते हैं।

       ऐसी हर चीज़ जिसको हासिल करने में आपका कोई हाथ नहीं और 

जो चीज़ें हासिल करने लायक है,उसके लिए टैलेन्ट आपके पास होता नहीं. लेकिन ये गोरेपन की चाहत आयी कैसे। 

       क्या ये भारत में ब्रिटिश राज की देन है ? क्योंकि प्राचीन साहित्य को देखिये तो श्याम रङ्ग तो सुन्दरता का प्रतीक माना जाता था। श्री कृष्ण को श्याम सुन्दर कहा जाता है।

      कालिदास ने अपने काव्य में सभी महिला किरदारों को श्याम रङ्ग ही दिया। इसके बारे में पढ़ते हुए कई और मिसालें मिलीं। जैसे, जयदेव की गीता गोविन्दा में राधा का रङ्ग साँवला है. काम्बा रामायण में सीता को गोरी नहीं बताया गया है। भानुभट्ट की नेपाली रामायण में सीता साँवली हैं। मतलब कवियों ने तो साँवले रङ्ग को ख़ूबसूरती के साथ जोड़ा है।

चलिए, फिर भी आपको गोरेपन की चाह है तो एक बात जान लीजिये। कोई भी क्रीम आपको गोरा नहीं बना सकती। बाज़ार लोगों की बेवकूफी और अज्ञानता से काफी फलता-फूलता है।

     ये अज्ञानता सिर्फ भारत में नहीं है. दरअसल पूरे विश्व में  गोरेपन के प्रोडक्ट्स का बाजार अरबों-खरबों का है। आप अपनी त्वचा को साफ़ रख सकते हैं, अच्छे खान-पान से चमका सकते हैं  लेकिन उसका रङ्ग नहीं बदल सकते! (चेतना विकास मिशन).

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