-तेजपाल सिंह ‘तेज’
“जब चुनाव महज़ प्रक्रिया बन जाए और जनता एक मौन दर्शक, तब जान लीजिए कि लोकतंत्र अपने अंतिम साँसें गिन रहा है।” 21वीं सदी का भारत एक ऐसे संकट के दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ लोकतंत्र का ढांचा तो बचा है, लेकिन उसकी आत्मा को योजनाबद्ध तरीक़े से बेचा जा रहा है — कभी चुनावी बांडों के जरिए, कभी मतदाता सूची में हेरफेर द्वारा, और कभी संवैधानिक संस्थाओं को सत्ता का औजार बनाकर। चुनाव, जो कभी जन-इच्छा की अभिव्यक्ति का सबसे प्रामाणिक तरीका थे, आज सत्ता के लिए महज़ तकनीकी यंत्रणा बनकर रह गए हैं। और यह सब एक ऐसे दौर में हो रहा है, जब जनता को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि “सब कुछ ठीक है”, जबकि भीतर ही भीतर लोकतंत्र की नींव खोखली की जा रही है। इसे समझने के लिए हमें सिर्फ वर्तमान को नहीं, अतीत को भी टटोलना होगा। क्योंकि इतिहास यही सिखाता है कि जब सत्ता पर सवाल पूछना बंद हो जाए, तो सत्ता निरंकुश हो जाती है। यह लेख में भारत में हो रहे चुनावी घोटालों, इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी की ओर बढ़ते कदम, और विपक्ष के समक्ष खड़े संकट की पड़ताल करता है। साथ ही यह विश्लेषण करता है कि क्या चुनाव बहिष्कार कोई समाधान हो सकता है, या इससे लोकतंत्र और अधिक डगमगा जाएगा। इस निबंध की दृष्टि केवल आलोचना की नहीं, बल्कि समाधान की भी है। यह उस लोकतंत्र के पक्ष में खड़ा है, जो जनता का है, जनता के लिए है, और जनता द्वारा है — न कि कॉरपोरेट बांडों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तकनीकी हेरफेर का शिकार।

भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है — एक ऐसा राष्ट्र जिसकी नींव सार्वभौमिक मताधिकार, स्वतंत्र चुनाव आयोग, और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली पर टिकी है। लेकिन हाल के वर्षों में, खासकर 2014 के बाद, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में जिस प्रकार से चुनावों में गड़बड़ियों, सूचनात्मक असंतुलन, और वित्तीय अपारदर्शिता का बोलबाला हुआ है, उसने भारत के लोकतंत्र को “इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी” (Electoral Autocracy) की ओर धकेल दिया है।
इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी क्या है?
यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें चुनाव तो होते हैं, लेकिन वे महज औपचारिकता रह जाते हैं। सत्ता पक्ष संस्थानों पर इतना नियंत्रण स्थापित कर लेता है कि वास्तविक विपक्ष, निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया, मीडिया की स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो जाती है। स्वीडन के वी-डेम (V-Dem) संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब पूर्ण लोकतंत्र नहीं रहा, बल्कि एक “इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी” है।
ऐतिहासिक सन्दर्भ: 1975 की आपातकाल अवधि में चुनाव तो हुए, लेकिन वे लोकतांत्रिक नहीं कहे जा सकते थे। इंदिरा गांधी के चुनाव को न्यायालय ने अमान्य घोषित किया था, इसके बावजूद उन्होंने आपातकाल लागू कर दिया। विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और संसद को कठपुतली बना दिया गया। यही वह दौर था जब लोकतंत्र का ढांचा तो था, लेकिन आत्मा गायब थी — ठीक उसी तरह जैसी आज की “इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी” में है।
“हमारे पास एक महान संविधान है। लेकिन वह उतना ही अच्छा या बुरा साबित होगा, जितना अच्छे या बुरे लोग उसे लागू करेंगे।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान सभा में भाषण, 25 नवम्बर 1949। यह वाक्य आज के भारत में और भी प्रासंगिक हो गया है, जहाँ संविधान तो मौजूद है, पर उसकी आत्मा को लगातार भ्रष्ट किया जा रहा है।
चुनावी घोटाले: सत्ता का नया हथियार:
1. चुनावी बांड (Electoral Bonds): वित्तीय घोटाले का केंद्र
· सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में चुनावी बांड को असंवैधानिक ठहराया, क्योंकि यह अनाम चंदे के ज़रिए सत्ताधारी दल को अपार धन शक्ति देने वाला तंत्र बन गया था।
· भाजपा ने अकेले 50% से अधिक चुनावी बांड हासिल किए, जो यह दर्शाता है कि वित्तीय असमानता चुनावी असमानता में बदल गई।
· ऐतिहासिक उदाहरण:
नेहरू युग (1952–1964) में कांग्रेस पार्टी चुनावी चंदा ज़रूर लेती थी, लेकिन यह सार्वजनिक रूप से घोषित होता था और उसकी पारदर्शिता बनी रहती थी। नेहरू स्वयं कांग्रेस की बैठकों में चंदा लेने की विधियों को लेकर चिंता जताते थे। उन्होंने निजी उद्योगपतियों के अत्यधिक प्रभाव को सीमित करने की बात कही थी। इसके विपरीत, चुनावी बांड प्रणाली में चंदा गुप्त और मनमाने ढंग से बंटा — जो इतिहास के खुलेपन से पूर्णत: विपरीत है।
· “जनता की सरकार, जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी जानी चाहिए। लेकिन जब धन बल ही चुनाव तय करे, तो यह सरकार नहीं, कंपनियों का शासन बन जाती है।” — महात्मा गांधी (हरिजन, 1939 में चुनावी नैतिकता पर)
· भाजपा को मिले अधिकांश बांडों की गोपनीयता और बिना ट्रेस किए गए स्रोत चुनावों को कॉर्पोरेट नियंत्रण की ओर धकेलते हैं।
2. मतदाता सूची में गड़बड़ी: बिहार में SIARE का मामला
· बिहार में SIARE (State Intelligent Automated Response Engine) नामक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर कथित रूप से मतदाता सूची में बदलाव, डुप्लीकेशन हटाने के नाम पर विपक्षी वोटरों को हटाने जैसे आरोप लगे हैं।
· स्थानीय स्तर पर कई बूथों पर यह सामने आया कि दलित, मुसलमान और अन्य पिछड़े वर्गों के वोटरों के नाम गायब मिले।
ऐतिहासिक उदाहरण: 1987 में हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर बूथ कैप्चरिंग और वोटर लिस्ट में फेरबदल के आरोप लगे थे। इस पर जन लोकचेतना के साथ-साथ कई राजनैतिक आंदोलनों ने चुनाव आयोग की भूमिका को कठघरे में खड़ा किया। नतीजतन, बाद के वर्षों में T.N. Seshan जैसे कड़े चुनाव आयुक्त आए जिन्होंने मतदाता सूची, बूथ सुरक्षा और चुनाव आचार संहिता को सख्ती से लागू किया। आज SIARE जैसे डिजिटल हथकंडों से उसी लोकतांत्रिक संकल्पना पर प्रहार हो रहा है।
· “यदि कोई वोट देने से वंचित कर दिया जाए, तो वह सिर्फ राजनीतिक अधिकार से नहीं, बल्कि मानवाधिकार से भी वंचित होता है।” — डॉ. अंबेडकर, संविधान सभा में मतदान अधिकार पर दलितों, मुसलमानों, और वंचित वर्गों के नाम अगर योजनाबद्ध ढंग से गायब किए जा रहे हैं, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, संवैधानिक अपराध है।
3. ईवीएम और वीवीपैट पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न:
· विपक्षी दल बार-बार ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने कभी भी सभी वीवीपैट पर्चियों की 100% गिनती की अनुमति नहीं दी।
· एक स्वतंत्र आयोग या संसदीय निगरानी के बिना चुनाव प्रणाली पर जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।
ऐतिहासिक उदाहरण: 2009 में BJP नेता लालकृष्ण आडवाणी ने स्वयं EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाए थे, और बैलेट पेपर की ओर लौटने की वकालत की थी। तब चुनाव आयोग ने वीवीपैट की प्रणाली शुरू की। आज, उन्हीं राजनीतिक दलों की सरकार वीवीपैट मिलान से कतराती है — यह ऐतिहासिक विरोधाभास दर्शाता है कि सत्ता में आते ही सिद्धांत बदल जाते हैं। “हर चुनाव का परिणाम सिर्फ मतपत्रों से नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की पारदर्शिता और जनता के विश्वास से तय होता है।” — सच्चिदानंद सिन्हा, संविधान सभा के पहले अध्यक्ष। आज जब ईवीएम को लेकर अविश्वास बढ़ रहा है, और वीवीपैट की 100% गिनती से बचा जा रहा है, तब लोकतंत्र की वैधता ही संदेह के घेरे में है।
4. सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग:
· ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों का चुनाव से ठीक पहले विपक्षी नेताओं पर छापेमारी और गिरफ्तारी के लिए प्रयोग करना अब एक सामान्य परिघटना बन चुकी है।
· ऐतिहासिक उदाहरण: इंदिरा गांधी शासन में 1970 के दशक में इन्कम टैक्स और सीबीआई को विपक्षी दलों के पीछे लगाया गया था — विशेषकर जेपी आंदोलन के नेताओं और उनके परिवारों को परेशान करने के लिए। बाद में जनता पार्टी सरकार के आने पर यह साफ हुआ कि ये एजेंसियाँ सत्ता के दबाव में काम कर रही थीं। आज ईडी और सीबीआई का यही दुरुपयोग फिर से हो रहा है — यह दिखाता है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है, बस पात्र बदल गए हैं।
· “जब न्यायपालिका और प्रशासन पक्षपातपूर्ण हो जाएं, तो लोकतंत्र पुलिस राज्य में बदल जाता है।”— जेपी नारायण, संपूर्ण क्रांति आंदोलन ।
· आज ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं का उपयोग विपक्षी दलों को डराने के लिए किया जा रहा है, जो लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है।
क्या चुनाव बहिष्कार समाधान है?
1. बहिष्कार लोकतंत्र को और खोखला करेगा
· जब विपक्ष चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा, तो भाजपा निर्विरोध जीतती रहेगी। इससे लोकतंत्र का बचा-खुचा ढांचा भी नष्ट हो जाएगा।
· चुनावों से बाहर रहना, जनता के बीच ‘कायरता’ या ‘पराजयवाद’ के रूप में देखा जा सकता है।
2. जनता की भागीदारी घटेगी
· चुनाव बहिष्कार का सीधा अर्थ है कि जनता के पास विकल्प सीमित हो जाएंगे, और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से उनका मोहभंग बढ़ेगा।
3. भाजपा को और अधिक वैधता मिल जाएगी
· यदि कोई मुकाबला न हो, तो भाजपा को ‘जनता का पूर्ण समर्थन’ प्राप्त होने का नैतिक दावा मिल जाएगा, भले ही वह चुनावी धांधलियों से जीत रही हो।
ऐतिहासिक उदाहरण: 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद जब दिल्ली सहित कई क्षेत्रों में कांग्रेस के विरुद्ध रोष था, तब कुछ सिख संगठनों ने चुनाव का बहिष्कार किया। परिणामस्वरूप कांग्रेस भारी बहुमत से जीत गई। बहिष्कार ने सत्ता को ही और अधिक वैधता दे दी। इसी तरह कश्मीर में 1990 के दशक में चुनाव बहिष्कार से स्थानीय लोकतंत्र ठप हो गया और अलगाववाद को बल मिला। यह इतिहास सिखाता है कि बहिष्कार नहीं, बल्कि प्रतिरोध और भागीदारी ही लोकतंत्र का मार्ग है। “लोकतंत्र की हत्या तब नहीं होती जब एक पार्टी सत्ता में होती है, बल्कि तब होती है जब विपक्ष कमजोर पड़ जाता है।” — राममनोहर लोहिया। “अहिंसक प्रतिरोध त्याग नहीं है, बल्कि सशक्त विरोध है।” — महात्मा गांधी, यंग इंडिया (1921)। इसलिए बहिष्कार के बजाय भागीदारी आधारित प्रतिरोध की आवश्यकता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को बचा सके।
समस्या का विकल्प: समाधान और रणनीतियाँ:
1. विपक्षी दलों की सामूहिक निगरानी समिति (Electoral Monitoring Coalition)
· सभी प्रमुख विपक्षी दल एक साथ आकर चुनाव आयोग, बूथ व्यवस्था, वोटर लिस्ट, ईवीएम पारदर्शिता पर निगरानी के लिए एक साझा तंत्र बना सकते हैं।
2. समान नागरिक अभियान: “वोटर अधिकार यात्रा”
· गांव-गांव जाकर यह सुनिश्चित करना कि हर नागरिक का नाम मतदाता सूची में है, और यदि नहीं, तो उसे तुरंत जोड़ा जाए।
· सिविल सोसाइटी और युवा समूहों को इस काम में सक्रिय रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
3. चुनाव आयोग पर जनदबाव
· चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जब प्रश्न उठे हों, तो जनता, बुद्धिजीवी और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी सार्वजनिक याचिकाओं, मीडिया बयानों और कानूनी कार्यवाहियों के माध्यम से जनदबाव बना सकते हैं।
4. सुप्रीम कोर्ट में सक्रिय हस्तक्षेप
· जैसे चुनावी बांड के मामले में न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया, वैसे ही मतदाता सूची, ईवीएम वीवीपैट मिलान, चुनाव आयोग की पारदर्शिता जैसे विषयों पर कानूनी पहल की जानी चाहिए।
5. जनमत निर्माण के वैकल्पिक मंच
· गोदी मीडिया के दमन के युग में, यूट्यूब पत्रकारिता, पॉडकास्ट, और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को संगठित करना जरूरी है।
· यह आम जनता को सूचना के नए और सच्चे स्रोत उपलब्ध कराएगा।
· “शिक्षा और संगठन ही वह शक्ति है जिससे हम लोकतंत्र को जीवित रख सकते हैं।”
— डॉ. अंबेडकर
· “मैं सत्ता का भूखा नहीं हूँ, पर मैं यह ज़रूर चाहता हूँ कि सत्ता उस व्यक्ति के हाथ में हो, जो जनता की सेवा करना जानता है।” — नेहरू, “डिस्कवरी ऑफ इंडिया”
· विकल्प यही है कि विपक्ष सिर्फ सत्ताविरोधी राजनीति न करे, बल्कि संस्थागत संघर्ष, जन-जागरण, और समानांतर नैतिक मॉडल खड़े करे।
ऐतिहासिक सन्दर्भ: 1950-60 के दशक में सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी जैसे विपक्षी दल संसदीय प्रणाली में भागीदारी के साथ-साथ चुनाव सुधारों के लिए लगातार आवाज उठाते रहे। उनकी सक्रियता के कारण चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाएँ काफी हद तक मजबूत हुईं। 1989 में वी.पी. सिंह सरकार ने “भ्रष्टाचार विरोधी जनादेश” के तहत सत्ता संभाली। उन्होंने बोफोर्स घोटाले के खिलाफ मोर्चा खोला और चुनावी पारदर्शिता को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया।
सिद्धांत और दृष्टिकोण:
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था–“हमारे पास एक महान संविधान है, लेकिन अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह संविधान भी निष्क्रिय हो जाएगा।” आज यही हो रहा है। संविधान का ढांचा तो मौजूद है, लेकिन उसकी आत्मा—लोकतांत्रिक पारदर्शिता—गंभीर संकट में है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को एक शांतिपूर्ण संघर्ष का माध्यम बताया था, न कि व्यवस्था से पलायन का। चुनाव बहिष्कार एक प्रकार का पलायनवाद है, जबकि जरूरत है जनसंघर्ष, जागरूकता और विकल्प निर्माण की।
निष्कर्षत: भारत इस समय एक बड़े लोकतांत्रिक मोड़ पर खड़ा है। चुनावी प्रक्रिया में हो रहे घोटाले, मतदाता सूची में की जा रही छेड़छाड़, और संस्थाओं की गिरती साख — यह सब लोकतंत्र को एक इलेक्ट्रोरल तानाशाही की ओर ले जा रहे हैं। चुनाव बहिष्कार इसका समाधान नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को भीतर से मजबूत करने के लिए संस्थागत संघर्ष, जन-जागरण, न्यायिक हस्तक्षेप, और वैकल्पिक सूचना प्रणाली निर्माण की आवश्यकता है। विपक्ष को चाहिए कि वह बहिष्कार की बजाय वैकल्पिक लोकतांत्रिक चेतना का निर्माण करे।
· “यदि हमें अपने लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी निभाना होगा।” — डॉ. अंबेडकर
· “लोकतंत्र कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं है, वह एक सतत संघर्ष है — बुराई, अन्याय और झूठ के विरुद्ध।”— जेपी नारायण
इसलिए यह समय हार मानने का नहीं, बल्कि नए विकल्पों, नए मंचों और लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का है।
ऐतिहासिक दृष्टि से निष्कर्ष: भारत का लोकतंत्र कई बार संकट में आया — 1975 का आपातकाल, 1984 का हिंसक बहुमत, 1990 का कश्मीर अलगाववाद, 2002 का गुजरात दंगा काल, 2024 का चुनावी बांड घोटाला — हर दौर में लोकतंत्र की आत्मा पर चोट हुई। लेकिन हर बार जनता, न्यायपालिका, और ईमानदार नेतृत्व ने लोकतंत्र को बचाया।
आज भी यही ज़रूरत है — भागीदारी, संगठन और विचारधारात्मक संघर्ष की। बहिष्कार नहीं, लोकतांत्रिक पुनर्जागरण ही एकमात्र रास्ता है। लोकतंत्र एक उपहार नहीं, एक जिम्मेदारी है — और जिम्मेदारियाँ भागने से नहीं, लड़ने से निभाई जाती हैं।” आज भारत की लोकतांत्रिक यात्रा एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ एक ओर “चुनाव” हैं — लेकिन उनके भीतर न पारदर्शिता है, न समानता, और न ही नैतिकता। दूसरी ओर “जनता” है — लेकिन वह या तो गुमराह है, या भयभीत, या हाशिए पर डाल दी गई है। ऐसे में विपक्ष का चुनाव बहिष्कार करना आत्मसमर्पण होगा, न कि संघर्ष। इतिहास गवाह है कि जब-जब व्यवस्था निरंकुश हुई है, तब-तब जनता ने, नेताओं ने, और विचारकों ने संघर्ष, संगठन और संवाद के बल पर परिवर्तन किया है — न कि पलायन या बहिष्कार से। “संविधान केवल कागज का दस्तावेज़ नहीं है, यह एक जीवंत आत्मा है — जिसे जीवित रखने के लिए साहस, संघर्ष और सतत जन-जागरण की आवश्यकता होती है।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर।
यह आवश्यक है कि आज का विपक्ष गांधी की नैतिक शक्ति, अंबेडकर की वैधानिक दृष्टि, लोहिया की सामाजिक चेतना और जेपी की जनसंघर्ष नीति को आत्मसात करे। उसे बहिष्कार नहीं, बल्कि विकल्प बनना होगा। उसे कोलाहल से नहीं, सन्नाटे को तोड़ने की हिम्मत से जनता का विश्वास अर्जित करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारत का लोकतंत्र केवल इतिहास की किताबों में बचेगा — एक प्रयोग जो असफल हो गया।