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इंदौर में सेंट्रल इंडिया का एक ऐसा चर्च जो करीब 165 साल पुराना,नाम पड़ा व्हाईट चर्च

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देवेंद्र मीणा/इंदौर

सेंट्रल इंडिया का एक ऐसा चर्च जो करीब 165 साल पुराना है। तब ब्रिटिश गवर्नमेंट में लेफ्टिनेंट जर्नल ने इसे प्रार्थना के लिए बनवाया था। एक संत के नाम पर चर्च का नाम रखा गया लेकिन चर्च के ऊपर किया गया पेंट (कलर) ही इसकी पहचान बन गया। हम बात कर रहे है इंदौर के व्हाइट चर्च की। क्रिसमस पर जानिए व्हाइट चर्च का इतिहास…।

जानिए कब बना चर्च

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि 1857 में आरएनसी हेमिलटन ने चर्च को बनवाया था। ये बेसिकली अमेरिकन चर्च कहलाता है। ये इंग्लिश चर्च है। यहां हिन्दी में सभा नहीं होती है। इंग्लिश में होती है। अभी व्हाइट चर्च में दो पास्टर्स है। वहीं रेमन जेम्स बॉन्ड इसके इंचार्ज है।

सेंट्रल इंडिया के पुराने चर्च में से एक

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि सेंट्रल इंडिया में तीन-चार चर्च ही पुराने है। व्हाइट चर्च भी सबसे पुराने चर्चों में से एक है। नागपुर, इंदौर का व्हाइट चर्च, महू का क्राइस्ट चर्च, सिहोर, जबलपुर के चर्च शामिल है। बताया जाता है कि महू का क्राइस्ट चर्च 1823 में बना था और तब लगभग 45 हजार रुपए में यह बनकर तैयार हुआ था। तब महू का चर्च समाज के लिए प्रार्थना का एक मात्र केंद्र था। जिसके कारण इंदौर सहित दूसरे जिलों से क्रिसमस पर एंग्लिकन पंथ के ईसाई यहां आते थे।

इसलिए नाम पड़ा व्हाईट चर्च

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि चर्च का नाम सेंट एंस चर्च है। संत के नाम पर चर्च है लेकिन सफेद कलर से पेंट होने के कारण इसका आम बोल चाल में नाम व्हाइट चर्च पड़ गया। एक तरह से व्हाइट चर्च के रूप में ही इसकी पहचान बन गई।

बारिश के कारण ढह गया था कुछ हिस्सा

चर्च के इंचार्ज जे जेम्स बॉन्ड बताते हैं कि साल 1993 के आसपास बारिश में पुराने चर्च का कुछ हिस्सा ढह गया था। पुराना चर्च ईटों से नहीं बल्कि मिट्‌टी और गारे से बनाया गया था। इस वजह से भविष्य की रिस्क को देखते हुए इंदौर शहर के लोगों के सहयोग से 1994 में नया भवन बनाया गया। सरकार की तरफ से भी सहयोग राशि दी गई। प्रार्थना अब नए चर्च भवन में ही होती है। पुराने चर्च भवन को सहेज कर रखा गया है।

1857 के दौरान का ईगल स्टैंड।

बैठक के लिए टेबलनुमा लंबी बेंच में राईफल रखने की जगह

वहीं 1857 में चर्च में जो वस्तुएं थी जैसे बेदी, ईगल स्टैंड, पुलपिट, बैठने के लिए जो पीयूस आदि आज भी पहले की तरह ही है। बैठक के लिए टेबलनुमा लंबी बेंच को पीयूस कहा जाता है। तब राईफल लेकर भी प्रार्थना करने सिपाही चर्च आते थे, ऐसे में पीयूस में राईफल को टिकाकर रखने की भी व्यवस्था है ताकि वह गिरे नहीं। राईफल टिकाने के बाद उसी के ऊपर टोपी भी सिपाही रख दिया करते थे।

चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया में मिल गए सारे चर्च

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि करीब 700 साल पहले कुछ लोग कैथोलिक से अलग हुए थे। उसमें ये एंगलिकन चर्च की स्थापना हुई जो कि चर्च ऑफ इंग्लैंड के अंतर्गत आता है। चर्च ऑफ इंग्लैंड में जो मेन है वो सबसे बड़ा चर्च है। नॉर्थ इंडिया में जितने भी एंग्लिकन चर्च है वो सब अब चर्च ऑफ नार्थ इंडिया में आ गए हैं। जिसका हेड क्वार्टर दिल्ली में है। भोपाल धर्म प्रांत के अंतर्गत अब व्हाइट चर्च आता है। 1970 में जितने भी चर्च थे सब आपस में मिल गए और चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया का जन्म हुआ।

ब्रिटिश गवर्नमेंट में लेफ्टिनेंट जर्नल थे हेमिलटन

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि आरएनसी हेमिलटन ने अपने पैसे से ही व्हाइट चर्च बनवाया था। वे ब्रिटिश गवर्नमेंट के लेफ्टिनेंट जर्नल थे। इसके लिए किसी से कोई पैसा नहीं लिया था। उनके निजी पैसों से ही उन्होंने निर्माण करवाया था। प्रेयर (प्रार्थना) और वरशिप के लिए ही उन्होंने चर्च बनवाया था। बाद में जर्जर होने के बाद साल 1966 के करीब लोगों के सहयोग से चर्च की नई बिल्डिंग बनवाई गई।

व्हाईट चर्च।

चर्च संरक्षित इमारत घोषित

व्हाइट चर्च से जुड़े सुरेश कार्लेटन बताते हैं कि चर्च को मेंटेन करके रखा है। उसको गिराया नहीं है। एक स्मारक की तरह उसे सहेज कर रखा है। मध्यप्रदेश के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इमारत में व्हाइट चर्च भी घोषित है। चर्च में करीब 250 से 300 लोग प्रेयर (प्रार्थना) कर सकते हैं। प्रत्येक रविवार को प्रेयर (प्रार्थना) होती है।

1857 के दौरान की बेदी।

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