~ गुरू घटालों के पंडालों में नाचती बहू-बेटियाँ, असल जीवन में दुराचार, और महाभारत
~मुझे मिलकर शाम्भवी मुद्रा में आओ स्त्रियों!
*~ डॉ. विकास मानव*
ध्यान-तंत्रशास्त्र की आजकल पूरे विश्व में बड़ी चर्चा है किंतु इससे आने वाले खतरे की ओर हम अभी से सावधान हो जाना चाहिए।
मुझ जैसे ब्रह्मचारी-योगी, ध्यान-तांत्रिक की बात अलग है बाकी इस क्षेत्र में व्यापार कर रहे लोगों की पहुंच देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ तक है। इसको उलट कर भी कह सकते हैं कि यह राजनीतिज्ञ इनको बड़ी श्रद्धा और आदर की दृष्टि से देखते हैं।
विदेशों में भारतीय योग शास्त्र का कथित डंका बजाने वाले स्वयंभू योगियों की भी कोई कमी नहीं है। यह बात सही है कि ध्यानतंत्र शास्त्र ने और उसे अनुप्राणित योगशास्त्र ने वर्ण लिंग जाति संप्रदाय देव आदि की सीमा को लांघ कर मानव मात्र को इसका अधिकारी बताया है। किन्तु ऐसा करते समय व्यापार वृत्ति वश उसमें दोष आ गये हैं।
प्राचीन भारत में गृहस्थ ऋषि को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्ति थी किन्तु बाद में स्थिति बदल गई गृहस्थ ऋषि का स्थान भिक्षुक मुनि और सन्यासियों ने ले लिया। ऋषि गृहस्थ रहते हुए भी सभी एषणाओं से मुक्त था किन्तु भिक्षुयों मुनियों और संन्यासियों के इर्द-गिर्द मठों और मंदिरों के रूप में सभी एषणाओं का एक रहस्यत्मक ताना-बाना बुने जाने लगा. इसी पृष्ठभूमि में रहस्यत्मक शास्त्रों का अविर्भाव हो गया।
उपनिषदों को रहस्य शास्त्र कहा जाता था किन्तु औपनिषदिक रहस्य एक अलौकिक तत्व था. तांत्रिक योगियों ने इस अलौकिक तत्व को तो सत्तर्क और स्वात्मप्रत्यभिज्ञा द्वारा रहस्य की आवरण से मुक्त कर स्वात्मस्वरूप अथवा जीवन्मुक्त अवस्थाके रूप में प्रतिष्ठित किया लेकिन उसके स्थान पर उन्होंने लौकिक जीवन को ही ढक दिया।
मनुष्य की रागात्मिक वृत्ति का प्रशमन ध्यानतांत्रिक अवधारणाओं का एक लक्ष्य माना जा सकता है। किंतु विगत सहत्राधिक वर्षों में तंत्र शास्त्र का रहस्यवाद में अपनी कुंठा को छुपाने का एक वीभत्स पर्याय रहा है. तंत्र शास्त्र के रहस्यवाद औपनिषदिक रहस्यवाद को ऊंचा दर्जा दिलाने का प्रयास किया जाता रहा है. आज भी है प्रयास रुका नहीं है।
इस अनोखे रहस्यवाद ने ब्रह्मचारी शब्द का अर्थ ही बदल दिया मारविजयी बुद्ध और कामदेव को भस्म कर देने वाले योगीराज शिव के द्वारा परिवर्तित धर्मों में काम के इस अनोखे प्रवेश ने कृष्ण भक्ति धारा में ही नहीं राम भक्ति धारा में भी रसिक संप्रदाय को जन्म दे दिया।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की लोकमंगल कारी स्वरूप की रक्षा का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को दिया जाना चाहिए। अन्यथा राम का यह चरित्र भी उसी तरह से पीछे धकेल दिया गया होता जैसे कि भगवान श्रीकृष्ण का महाभारत और भगवदगीता में वर्णित स्वरूप हमारी आंखों से ओझल सा हो गया है विश्व के उत्कृष्टतम ग्रंथ महाभारत को घर में रखना अथवा पढ़ना आज महान अमंगलकारी कार्य मान लिया गया है और गीता का अध्ययन गृहस्थ के लिए निषिद्ध है।
इसके स्थान पर भागवत के दशम स्कंध की ओर रासलीला की उत्तरोत्तर प्रतिष्ठा बढ़ गई है और रासलीला के रहस्य को औपनिषदक रहस्यवाद से भी ऊंचा स्थान दिया गया है।
हम कहां पहुंच गए हैं?
स्वर्ग देखने के लोभ में नाक कटा लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है।
आज हमें एक जगह खड़े होकर देखना चाहिए कि आगे किस तरफ जाना है किसी समय योगतंत्र पद्धति ने भारतीय संस्कृति के विस्तार के लिए स्तुत्य प्रयास किया था किंतु आज हम उसकी अच्छाइयों को भुला चुके हैं।
समाज विचित्र रूप से ऊंच-नीच छोटे-बड़े के घेरे में बटा हुआ है।
संतों की वाणी का जिनका की प्रेरणा स्रोत मुख्यतः तांत्रिक वाड् मय ही रहा है समाज पर केवल मौखिक प्रभाव है। अर्थात, उसका उपयोग केवल एक दूसरे को उपदेश देने तक ही सीमित है।
अपनी दैनिक दिनचर्या में उसको उतारने का प्रयास नहीं किया जाता इसका भी एक मौलिक कारण है। उपनिषद गीता या अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों के उत्कृष्ट प्रदेशों का अधिकारी सामान्य मनुष्य को नहीं माना जाता है। उनके लिए इन उत्कृष्ट आध्यात्मिक मूल्यों का अनुशरण कर पाना कठिन है। ऐसा मानकर नाना प्रकार के कर्मकांडो की सृष्टि कर दी गई है।
एहलौकिक की अपेक्षा पारलौकिक जीवन पर ध्यान अधिक केंद्रित कर दिया गया है फलतः सामान्य मनुष्य निकृष्टतम जीवन बिताते हुए भी कुछ कर्मकांडो का नियमित आचरण कर धार्मिक बन बैठा है।
इस स्थिति को दूर किया जाना चाहिए।
नहीं तो तथाकथित धर्माचार्यों और कथावाचकों के पंडालों में बहु बेटियों का डांस चलता ही रहेगा और घर में डायवोर्स और एलिमनी का दौर जारी रहेगा। जीवन दुराचार के महाभारत से भर जाएगा.
मुझे मिलकर शाम्भवी मुद्रा में आओ स्त्रियों!
स्त्री की आँखे जब शाम्भवी मुद्रा में जाती है, वो क्षण ऐसा होता है जैसे समस्त सृष्टि ठहर गयी हो और विष्णु समस्त सृष्टि को महादेव को सौंपकर चिर निंद्रा में प्रस्थान कर रहे है।
महादेव तीसरी आँख पर पहुंचने ही वाले हैं, जैसे शिव और शक्ति का निर्बाध मिलन होने ही वाला है, समस्त ओर जैसे फूलो की सुगंध से समस्त सृष्टि मदमस्त हो रही है,जैसे कामदेव की रागिनियाँ चारो ओर नाच रही हैं, जैसे समय और सृष्टि सब शून्य होने ही वाला है, कि अचानक पुरुष भरभरा के स्वयं ही गिर जाता है, स्त्री को चरम के परम तक वह पहुंचने ही नहीं देता..स्त्री से वो परमसुख समयातीत परम शून्यता की अनुभूति छीन ली जाती है.
परम पुरुष (महादेव ) और प्रकृति (स्त्री) का वो समयातीत मिलन फिर अधूरा रह जाता है.
स्त्री की फिर प्रतीक्षा, पुरुष की फिर से वही अधोगति, स्त्री की फिर वही अपूर्णता की पीड़ा.
स्त्री हर पुरुष में उस एक पुरुष को खोजती है जो उसे परम के चरम पर पहुंचने में सहयोगी हो, पर कोई पुरुष उसकी तराजू पर खरा नहीं उतरता.
कोई तो आएगा, जो परम प्रकृति को परम पुरुष से मिलन का साक्षी होगा. कोई तो आएगा जो उस परम स्त्री के चरणों में स्वयं को समर्पित करेगा, और उसे अपने मस्तक की जटाओ में बिठा लेगा, और दोनों उस परम शून्यता में, परम अद्वैत में, परम शांति में, परम आनंद में , समयातीत में ठहर जायेंगे.
हे महादेव, हे महादेवी! ये प्रेम की पीड़ा, ये प्रेम की प्यास, सब अधूरा अधूरा. सृष्टि के आरम्भ से सृष्टि के अंत तक.
हे पूर्ण ! तुम्हारी स्वयं (अद्वैत) को ही दो अपूर्ण (द्वैत ) “स्त्री-पुरुष” में खंडित कर, पूर्ण होने का ये खेल , ये किस खेल किस दौड़ में तुमने हमें फसाया है?
पर , प्रेम की पीड़ा ही तो प्रेम का परम आनंद है ! इस पीड़ा से मुक्ति और परमानंद की तृप्ति सिर्फ एक ही पुरुष दे सकता है और वो है “गुरु”।
कबीर, सूर, जायसी, तुलसी सभी ने गुरु की महिमा गाई है। गुरु को गोविंद से भी अग्रणी माना गया है :
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
तुलसी बाबा कहते हैं :
बन्दउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर-रूप हरि।
महा मोह तम पुंज, जासु वचन रवि-कर-निकर।।
रैदास कहते है :
गुरु को सबद अरु सुरति कुदाली, खोदन कोई कोई हैरे।।
और सहजोबाई ने तो बड़े विस्तार से गुरु-महिमा बताई है :
सहजो कारज जगत के गुरु बिन पूरे नाहिं।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं समुझि देख मन माहिं।।
सहजो गुरुवर्ती वचै, निगुरै अरुझत जाहिं।
बार बार नाते मिलैं, लख चौरासी माहिं।।
साधना के सभी मार्गों में गुरुदीक्षा की अपनी गरिमा है। बिना दीक्षा के कुछ भी सम्भव नहीं है।
बिन्दु-साधना मार्ग भी बिना गुरुदीक्षा और बिना गुरु साहचर्य के संभव नहीं है है।
बिंदु साधना-मार्ग में गुरु, साधक को यजनिका दीक्षा और साधिका को क्रम से भैरवी और महा भैरवी की दीक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन गुरू, आज तो गोरू हैं सारे के सारे.
स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं।
दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं।
जब तक वे अधूरे है, वे अपने अपने अभाव की पूर्ति हेतु बार-बार जन्म लेते रहेंगे।
योगतंत्र में साधक साधिका के बीच भैरवी साधना का एकमात्र कारण है यह है कि वह आघ्यात्मिक अद्वयानंद को प्राप्त करने का तात्कालिक साधन है। इससे ‘त्रिपुटी’ का नाश हो जाता है।
यह स्त्री पुरुष के पूर्णत्व-लाभ का जागतिक और पारलौकिक आधार है। साधना द्वारा अन्तरमिलन की जिस व्यवस्था के सबंध में हम आपको बतला रहे हैं , वह ‘पूर्णत्व’ के लाभ का आध्यात्मिक आधार है।

