Site icon अग्नि आलोक

सिर्फ चमड़ी का भेद….?

Share

शशिकांत गुप्ते

भारतीय मूल का व्यक्ति फिरंगियों के देश में प्रधान बना। इस मुद्दे पर मिलीजुली प्रतिक्रिया होना स्वाभविक है। एक समय था, जब फिरंगियों के लिए कहा जाता था कि उनका सूरज कभी अस्त होता हो नहीं। यह अतिशयोक्ति पूर्ण शाब्दिक प्रशंसा हो सकती है।
बहरहाल मुद्दा है। फिरंगियों के देश में भारतीय मूल का व्यक्ति प्रधान बना है। इस मुद्दे पर अनेक लोगों की विभिन्न तरह की सोच हो सकती है।
सीतारामजी का कहना है कि किस देश में क्या हुआ?हो रहा है? क्या होगा? इन मुद्दों पर चर्चा कर अपनी मानसिक ऊर्जा व्यर्थ ही जाया करना है।
अपने को तो भारत के मूल में क्या हो रहा है? इसपर गम्भीरता से विचार विमर्श करना चाहिए।
महामारी से छुटकारा पाने के बाद इस वर्ष दीपावली का त्यौहार अतिउत्साह के साथ मनाया गया।
पटाखे महंगे होने बाद भी तादाद में पटाखें जलाए गए।
सियासी पटाखों की भी सार्वजनिकक्षेत्र में बहुत चर्चा हुई।
एक पटाखे की लड़ कन्याकुमारी से शुरू हुई है, काश्मीर तक जाकर पूरी होगी, देखना है यह लड़ कितना धमाका करती है?
यह लड़ जिन जिन राज्यों में बिछाई जाएगी उन उन राज्यों में इस लड़ का धमाका कितनी तीव्रता से होगा यह समय पर पता चलेगा। धमाका करें या ना करें इस लड़ ने सियासी हलचल तो पैदा कर ही दी है।
इस लड़ को रोकने के लिए जो विरोध में शाब्दिक बम हैं वे बगैर आवाज के ही साबित हो रहें हैं। बहुत सी जगहों पर तो जोर शोर से विज्ञापनों के माध्यम से शाब्दिक बम फोड़ने की घोषणा की जाती है। लेकिन बमों का धमाका सुनने वालों के लिए रखी कुर्सियों पर लोग बैठने को तैयार ही नहीं है। कारण पूछने पर लोग कहतें हैं पिछले आठ वर्षों से शाब्दिक पटाखें सुन रहें हैं। अभी तक तो सारे पटाखें फुस्स ही निकले हैं।
एक मनोवैज्ञानिक ने यहां तक कह दिया कि,सामान्यज्ञान कहता है कि,जहाँ जहाँ कीचड़ फैलता है वहाँ वहाँ पटाखों में सीलन लग जाती हैं। सीलन वाले पटाखें जलेंगे ही नहीं तो फूटेंगे कैसे?
इसलिए जमीनी पटाखें जैसे आनर, सुतलिबम, जमीन पर चलने वाली चक्री, आदि पटाखे तो फुट ही नहीं सकतें हैं। यदि फूटते भी हैं तो ये पटाखें जमीनी हक़ीक़त बयाँ करने लगतें हैं। कारण इन पटाखों में पटाखों की आवाज नहीं आती है। इन पटाखों में महंगाई,भुखमरी, बेरोजगार, कुपोषण, के साथ किसानों की समस्याओं के अलावा और जमीनी समस्याएं सुनाई देती है।
कीचड में सिर्फ आकाशबाण पटाखें ही फोड़े जा सकतें है।आकाशबाण के पटाखों को कीचड़ में आसानी से रखा जा सकता है। आकाशबाण की बत्ती जलाओ और आसमान में देखो कब फूटेगा,कब रंगबिरंगी रंग बिखरेगा।
आसमान की ओर देखना मतलब ताकते रहना। आठ वर्षों से देश की जनता आसमान में ताक ही रही है
अतिसर्वत्रवर्जयती।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version