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मन की आँखे खोल

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी ने आज बहुत ही आश्चर्यजनक बात बताई। सीतारामजी को उनके एक मित्र ने उनसे पूछ लिया फ़कीर किसे कहतें हैं?
सीतारामजी ने जवाब दिया 1,सांसारिक विषयों का त्याग करने वाला व्यक्ति ; साधु ; संत ; महात्मा 2. भजन करके गुज़ारा करने वाला मुसलमान साधु 3. बहुत गरीब या कंगाल व्यक्ति।सीतारामजी ने कहा जवाब सुनने
के बाद जिज्ञासावश मित्र ने पूछा
इस कहावत का क्या अर्थ निकालना चाहिए, फूटे भाग फ़कीर के भरी चिलम ढुल जाए
सीतारामजी ने गुस्से में जवाब दिया,जो मर्जी हो वह अर्थ निकल लो। आप स्वतंत्र हैं। इनदिनों यही तो सब चल रहा है। वाणी की स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाया जा रहा है।
मैने सीतारामजी से कहा आप भी इन लोगों क्यों बहस करते हो? इनलोगों से बहस करना मतलब इस कहावत को चरितार्थ करना है,अंधों के आगे रोना और अपनी आँखें खोना
ये लोग सिर्फ पढ़ें-लिखें हैं, शिक्षित नहीं है।
सिर्फ शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने से कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व नहीं हो सकता है।
मैने सीतारामजी को आंखों से अंधे और नाम नयन सुख जैसे लोगों का यथार्थ प्रकट करती एक स्वरचित कविता सुनाई।
यह कविता मैने 13 ऑक्टोबर 2019 के दिन लिखी थी।

जो कुदरती है मूक
क्षम्य है वह,
वाणी है,
फिर भी है, जो मूक दर्शक?
वह अप्रत्यक्ष समर्थक है
अन्याय का।
दृष्टिहीन है, क्षम्य है वह,
देख कर भी,
गुनाहों को,
जो करता नजरअंदाज?
प्रश्रय है उसका,
सभ्यता की आड़ में,
गुनाहों को।
पाठक है,
पढ़ता है सिर्फ,
चाट जाता है,
अनेक गर्न्थो को,
मानव के भेष में है दीमक
लेखक है, लिखता है निरंतर
पुस्तकों है की भरमार
लेकिन,
जिसने नहीं किया हो,
समाज को,
विचारिक रूप से उद्वेलित,
वह अक्षम्य है।
चार दीवारी में बैठ कर कोसना,
दूषित व्यवस्था को,
अपनी कुंठाओं सिर्फ करना शांत
समझना अपने कर्तव्य की इतिश्री
इसीलिए यही सत्य है
“कथनी करनी भिन्न जहाँ
धर्म नही पाखंड वहां”

सीतारामजी ने कहा आपने सत्य ही प्रकट किया है। लेकिन मित्र ने जो जिज्ञासावध प्रश्न पूछा है कि फूटे भाग फ़क़ीर के,भरी चिलम ढुल जाए
मैने कहा यह कहावत अब इस तरह कहनी पड़ेगी।
जागे भाग फ़क़ीर के,गरीब का निवाला छीन गया
इनदिनों भाग जागतें नहीं हैं।
सयोंग से बिल्ली के भाग से छींका टूट जाता है।
यह भी सत्य है कि, सयोंग हमेशा नहीं होता है।
शायर दिवाकर राहीजी का यह शेर मौजु है।
वक़्त बर्बाद करने वालों को
वक़्त बर्बाद कर के छोड़ेगा

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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