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भारत पर थोपा जा रहा है अफीम युद्ध

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हरनाम सिंह*

युवा पीढ़ी पर हेरोइन का हमला*
 *भारत सरकार की चुप्पी से हैरानी
*
 मंदसौर। देश-विदेश के दूरदराज क्षेत्रों की यात्रा के दौरान जब कभी किसी के द्वारा पूछा जाता है कि आप कहां के रहने वाले हैं तब केवल मंदसौर और मध्यप्रदेश बताना ही पर्याप्त नहीं होता। हमें प्रश्नकर्ता को बताना होता है कि हम उस क्षेत्र में रहते हैं जहां अफीम की पैदावार होती। मंदसौर की अफीम से पहचान वैश्विक स्तर पर रही है । गुलामी के दौर से लेकर वर्तमान में तस्करी के कारण और अतीत में अफीम युद्ध के चलते देश मैं पूंजीवाद के विकास एवं चीन को बर्बाद करने के लिए भी कमोबेश मंदसौर की भूमिका रही है।  वर्तमान में अफीम का परिष्कृत स्वरूप मार्फिन- हेरोइन चर्चा के केंद्र में है । गोदी मीडिया चंद ग्राम ड्रग के संदिग्ध आरोपी शाहरुख खान के पुत्र को लेकर दिन-रात व्यस्त है। वहीं गुजरात में अडानी के बंदरगाह मुंद्रा में 21 हजार करोड़ रुपए मूल्य की 3 हजार किलोग्राम हेरोइन के अपराध पर पर्दा डालने के प्रयास हो रहे है।


 भारत में हीरोइन की इतनी बड़ी खेप का पकड़ा जाना पोर्ट के मालिक पर कार्यवाही ना होना, इस पर भारत सरकार की चुप्पी और गोदी मीडिया द्वारा दर्शकों- श्रोताओं का ध्यान भटकाने का प्रयास किसी बड़े खतरे की ओर संकेत के रूप में देखा जा रहा है। क्या यह चीन के बाद भारत के विरुद्ध तीसरा अफीम युद्ध तो नहीं है ? 18 वीं शताब्दी में इंग्लैंड ने भारत में कार्यरत ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से चीन में अफीम बेचकर वहां की युवा पीढ़ी को बर्बाद कर दिया था। जिसके चलते चीन को हांगकांग सहित अपने कई टापूओं, बंदरगाहों से हाथ धोना पड़ा था। वर्तमान में भारत में भी बड़े पैमाने पर मादक पदार्थ भेजकर यहां की युवा पीढ़ी को बर्बाद करने का षड्यंत्र चल रहा है।अतीत अफीम बेचने के लिए ब्रिटेन ने दो बार चीन पर आक्रमण किया था ।
 *देश के हर कोने से मिल रहा है मादक पदार्थ* 

मुंद्रा पोर्ट पर 3 हजार किलो हेरोइन के अलावा भी मात्र अक्टूबर माह के चंद दिनों में ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर मादक पदार्थों की जब्ती बताती है कि खतरा कितना बड़ा है । एक अक्टूबर 20 21 को गुरदासपुर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर साडे 8 किलो हेरोइन का पैकेट पकड़ा गया । 3 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के उरी में सुरक्षाबलों ने 30 करोड़ रुपये मूल्य की हेरोइन पकड़ी । सात अक्टूबर को दिल्ली में 13 करोड़ रुपए की हेरोइन के साथ तीन नाइजीरियन गिरफ्तार हुए। 8 अक्टूबर को कंधार से तेल की खेप में छिपाकर लाई गई 125 करोड़ रुपए की हीरोइन जप्त की गई । 13 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक करोड़ रुपए की हीरोइन पकड़ी। 20 अक्टूबर को मुंबई में एक महिला से 21करोड़ 70 लाख रुपए की हीरोइन जप्त की गई, इसी दिन अमृतसर में पाकिस्तानी ड्रोन से एक किलोग्राम ड्रग की बरसात हुई। मुंबई में राजस्थान से आई 21 करोड़ की हीरोइन जप्त की गई। 21 अक्टूबर को गोवा में 7.4 लाख की ड्रग मिली,इसी दिन असम से 4 करोड़ रुपए की हीरोइन मिली। 22 अक्टूबर को असम राइफल्स के तीन कर्मचारियों से एक करोड़ रुपए की हीरोइन जप्त की गई। 23 अक्टूबर को कोलकाता पुलिस ने चार तस्करों से 55 करोड़ रुपये की हेरोइन जप्त की । इसी दिन चेन्नई में आंध्र प्रदेश से आस्ट्रेलिया भेजी जा रही 3 किलोग्राम ड्रग पकड़ी गई। एसटीएफ ने शंभू बॉर्डर पर उत्तर प्रदेश के तस्कर से ढाई किलोग्राम हेरोइन जप्त की। मिजोरम के कोलासिब जिले में एक व्यक्ति से 6 करोड़ रुपए की हीरोइन जप्त की गई। 24 अक्टूबर को अहमदाबाद में 25 लाख रुपए की हीरोइन पकड़ी गई। यह केवल एक महीने के चंद दिनों का लेखा-जोखा है, जो कि सुरक्षाबलों के नजर में आया है। इससे कई गुना अधिक मादक पदार्थ देश के गांव- गांव में पहुंच चुके हैं।
 *मुंद्रा बंदरगाह पर पहले से रखा था ड्रग*

 मुद्रा बंदरगाह पर 3 हजार किलोग्राम हेरोइन का राज तब खुला जब इस घटना के पूर्व तटरक्षक दल ने समुद्र से एक  नौका पकड़ी जिसमें 300 किलो हेरोइन थी। इस नाव में सवार 7 लोगों को गिरफ्तार कर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन आरोपियों को पत्रकारों से मिलवाया। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर आरोपियों ने उन्हें बताया कि पकड़ी गई यह हीरोइन की मात्रा तो कुछ भी नहीं है, इससे अधिक हीरोइन तो बंदरगाह में आ चुकी है । हैरान अधिकारियों ने पत्रकारों से वादा किया कि आरोपियों से विस्तृत पूछताछ की जानकारी वे पुनः प्रेस को देंगे।  कोई आश्चर्य नहीं कि जिस ताकतवर पूंजीपति की बड़ी दुकान( बंदरगाह ) में यह हीरोइन रखी थी उसकी जानकारी कभी सार्वजनिक भी नहीं हो पाती अगर वहां पत्रकार मौजूद नहीं होते। एनसीबी को मन मारकर पोर्ट पर रखी हीरोइन की जानकारी सार्वजनिक करना पड़ी।


 *अडानी के पोर्ट पर पहले भी उतरी थी मार्फिन*

 हैदराबाद से प्रकाशित अंग्रेजी अखबार “डेक्कन क्रॉनिकल “ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर दावा किया था कि इस घटना के पूर्व ही अडानी के मुंद्रा बंदरगाह के माध्यम से 24 हजार किलो मार्फिन देश में आ चुकी है। जिसकी कीमत 72 हजार करोड़ रुपए बताई गई है । यह मादक पदार्थ मुंद्रा पोर्ट से विजयवाड़ा तक जिन ट्रकों के माध्यम से भरकर लाया गया था उसकी किसी भी टोल नाके पर एंट्री नहीं मिली, ना रसीद है ना सीसीटीवी कैमरे में तस्वीरें, नहीं ट्रकों के नंबर। बेहद संगठित और व्यवस्थित तरीके से मार्फिन देशभर में पहुंचाई गई है । इसी अखबार ने लिखा है कि राजस्व खुफिया विभाग के अनुसार कुल 90 हजार करोड़ रुपए की हेरोइन देश में आ चुकी है । इनमें से 70 हजार करोड़ रुपए की हेरोइन गायब है। अखबार के अनुसार विजयवाड़ा की आशीष ट्रेडिंग कंपनी के माध्यम से टेलकम पाउडर के नाम से मार्फिन की खेप आई थी। इसी इस कंपनी ने चांवल आयात करने का सरकार से लाइसेंस लिया था। लेकिन कभी भी चांवल नहीं मंगवाया। इस कांड में जिस पते का इस्तेमाल किया गया है, जिस पते पर कंपनी पंजीकृत है वह एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार का छोटा सा घर है। उस परिवार की ऐसी हैसियत ही नहीं है कि वह इतना बड़ा व्यवसाय कर सके।


 *एनडीपीएस एक्ट और अडानी*

 मादक पदार्थ द्रव्य अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) और उसकी शक्तियों के बारे में मंदसौर वासी बेहतर जानते हैं। जहां से भी अफीम या उसके सह पदार्थ पकड़े जाते हैं पुलिस उनके मालिकों को, जिस वाहन से पदार्थ लाए जाते हैं  उन वाहनों को जप्त कर उनके मालिकों को भी गिरफ्तार करती है, चाहे मादक पदार्थ की मात्रा 10 ग्राम ही क्यों न हो। लेकिन 21 हजार करोड़ रुपए की मार्फीन जिस परिसर से जप्त की गई उसके मालिक गौतम अडानी ही नहीं उसके मैनेजर या अन्य किसी अदने से कर्मचारी तक को न तो गिरफ्तार किया गया नहीं पूछताछ की गई। प्रारंभिक सुनवाई में जब अदालत ने इस संबंध में पूछा तो वकीलों ने बताया कि अडानी जी कानूनी जवाब तैयार करवा रहे हैं। जबकि इस एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है । क्या ऐसी छूट आज तक किसी आरोपी को मिली है ?     

       जानकारों के अनुसार 120 किलोग्राम अफीम से 40 किलोग्राम मार्फीन बनती है। 24  हजार किलोग्राम के बाद 3 हजार किलो मार्फीन निर्माण के लिए कितनी अफीम की जरूरत रही होगी समझा जा सकता है। 10 ग्राम अफीम भी जप्त होने पर आरोपियों को चार- चार साल तक अदालत से जमानत नहीं मिलती स्थानीय अदालतों की तो हिम्मत ही नहीं है कि वे जमानत दे दें। आरोपी को उच्च न्यायालय में ही जाना होता है । 


*भारत के खिलाफ नशा युद्ध के संकेत*

 इतनी बड़ी मार्फीन का पकड़ा जाना देश के लिए अशुभ संकेत है। इसे केवल तस्करी के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। यह भारत देश को बर्बाद करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश भी है। जिसमें देश के जयचंद शामिल हैं। देशवासियों के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए । पूंजीवादी देश पूर्व में भी दो बार इसी अफीम के माध्यम से चीन को घुटनों पर ला चुके हैं, अब भारत की बारी है।


 *चीन भुगत चुका है अफीम युद्ध* 

19वीं शताब्दी में चीन में वहां की युवा पीढ़ी अफीम के की लत के चलते बर्बाद हो रही थी। यह आदत वहां की सेना व प्रशासन तंत्र तक पहुंच गई थी। ब्रिटेन भारत की इंडिया कंपनी के माध्यम से वहां अफीम तस्करी के जरिए पहुंचाता था। चिंतित चीन के सम्राट ने अपने देश में अफीम के आयात पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया था । इस प्रतिबंध के खिलाफ 1839 में ब्रिटेन ने चीन पर आक्रमण कर दिया, युद्ध में चीन को पराजय का मुंह देखना पड़ा , पराजित चीन को विवश किया गया कि वह ब्रिटेन को “मोस्ट फेवर्ड देश” का दर्जा दे। लेकिन चीन के शासक इस अफीम तस्करी के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे। दूसरी बार 1856 में पुनः ब्रिटेन ने फ्रांस के साथ मिलकर चीन पर हमला बोल दिया, इस बार भी पराजित चीन को अपने 11 बंदरगाह ब्रिटेन व फ्रांस को सौंपने पड़े, जहां उन्हीं के सैनिक रहते थे जिन पर चीन सरकार का कोई कानून लागू नहीं होता था। यही नहीं हांगकांग द्वीप भी 100 वर्षों की लीज पर ब्रिटेन को सौंपना पड़ा था। इस अफीम युद्ध के चलते चीन औद्योगिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ गया। 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद ही चीन पुनः विकास के मार्ग पर चल पाया।


 *खतरे के मुहाने पर खड़ा है देश* 

भारत को इस अंतरराष्ट्रीय साजिश को समझना होगा। वर्षों पहले जब मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे, उस काल में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था कि वह अपने यहां अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगाने की पहल करे ।दिग्विजय सिंह ने भी उनकी मांग का समर्थन किया था लेकिन अफीम की खेती उससे जुड़े अन्य व्यवसाय जो सीधे वोटों की राजनीति को प्रभावित करते हैं इस पर कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। अफीम के कारण पंजाब का युवा बर्बाद हो रहा है। फिल्म “उड़ता पंजाब” में उसी त्रासदी को चित्रित किया गया है ।इस मादक पदार्थ का दायरा अब हरियाणा से होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश राजस्थान के श्रीगंगानगर तक फैल चुका है। उल्लेखनीय है कि यह संपूर्ण क्षेत्र वह इलाका है जहां से देश में सर्वाधिक खाद्यान्न की आपूर्ति होती है, यही नहीं इसी इलाके से भारत की सेना में नौजवान जाते हैं, खेलों में अंतरराष्ट्रीय पदको  की प्राप्ति में भी यही के नौजवान अग्रणी हैं। यह पूरा इलाका सीमावर्ती है कई पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं इसके चलते भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। देश के दुश्मन देश में कौशल और विशेषज्ञ पैदा करने वाले शिक्षण संस्थानों को निशाना बना रहे हैं। उनकी पहचान कर विद्यार्थियों को ड्रग एडिक्ट बनाया जा रहा है । यह काम केवल तस्करों का है यह मानना नादानी होगा।


 *तस्करी से विकसित हुआ था पूंजीवाद* 

पूंजीवाद निर्मम होता है यूरोप में गुलामों के व्यवसाय एवं उपनिवेशों की लूट से पूंजी पैदा कर औद्योगिक विकास किया गया  था। वहीं भारत में भी अफीम की तस्करी इसका माध्यम बनी। ब्रिटिश काल में ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से अफीम संग्रहित कर बेचने वालों में टाटा बिरला के पुरखे थे। रतनजी दादाभाई टाटा एवं बलदेव दास बिरला ने अफीम तस्करी के माध्यम से ही धन कमाकर देश में औद्योगिकरण की नींव रखी थी। यही नहीं वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल के पुरखे भी इसी व्यवसाय में थे। बिरला जी को अच्छा हिंदू माना जाता है वे जहां- जहां अपने कारखाने स्थापित करते हैं वहां- वहां मंदिर बनवाते हैं। लेकिन धार्मिक होने के बावजूद उनके पुरखों को नशे के व्यवसाय से एतराज नहीं था । ऐसे ही इस्लाम को मानने का दावा करने वाले अफगानिस्तान के तालिबानी भी हैं। वे अफीम की खेती व तस्करी को प्रोत्साहित कर धन कमा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि पूंजी की अंतहीन लालसा पूर्ति में धर्म कहीं आड़े नहीं आता । “गंदा है पर धंधा है ” के आदर्श को सामने रखकर पूंजीपति मानवता विरोधी व्यवसाय से गुरेज नहीं करते। कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक दास कैपिटल ( पूंजी ) में लिखा है “जैसे-जैसे मुनाफा बढ़ता जाता है पूंजी पतियों की हवस भी बढ़ती जाती है… इन्हीं संदर्भों से भारत के पूंजीपतियों को समझा जा सकता है। इसलिए भी गौतम अडानी की गिरफ्तारी और पूछताछ जरूरी है। यह विडंबना है कि 3 हजार कुंटल मार्फिन प्रकरण में जिस दंपति को गिरफ्तार किया गया है उनके घर से एक ग्राम मार्फिन या अफीम बरामद नहीं हुई है और जिन की दुकान पोर्ट से इतनी बड़ी मात्रा में ड्रग मिली है वह पूंजीपति छुट्टा घूम रहा है, उससे पूछताछ तक नहीं की जा रही है।         

  वर्तमान में देश में मुकेश अंबानी 112 करोड़ रुपए प्रति घंटा कमा रहे हैं। वही गौतम अडानी 90 करोड़ रुपए। बावजूद इसके पूंजी की हवस का कोई अंत नहीं है। देशवासियों को आगे आकर अपनी संतानों को नशे के खतरे से बचाना होगा।


 *क्यों खतरनाक है मार्फिन ?*

 देश और दुनिया में नशे के अनेक साधन उपलब्ध है। भारत में शराब के अलावा गांजा, भांग चरस का उपयोग होता रहा है। सेवन करने वालों की गंभीर स्थिति होने पर उपचार के माध्यम से उन्हें इन नशों से मुक्ति दिलाई जा सकती है। लेकिन हेरोइन, मार्फिन  का एक शाट एक कश व्यक्ति को एडिक्ट बनाने के लिए पर्याप्त है। एक बार लत लगने के बाद इस व्यसन से मृत्यु उपरांत ही मुक्ति मिलती है। कई प्रतिभाशाली व्यक्ति इस नशे के गर्त में गिर कर बर्बाद हो चुके हैं। विख्यात नर्तक माइकल जैक्सन को कौन नहीं जानता उसकी मृत्यु भी इसी नशे के कारण हुई थी । ऐसी ही स्थिति विख्यात फुटबॉल खिलाड़ी डियोगा मेरेडोना की भी थी। दोनों तमाम महंगे उपचारों के बावजूद इस लत से मुक्त नहीं हो पाए। तो साधारण परिवारों के युवक अगर एडिक्ट हो गए तो परिणामों का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए देशवासियों को गंभीर होती हुई स्थिति को समझना होगा।


 *हरनाम सिंह*

( तथ्य लेफ्ट फ्रंट फेसबुक पेज से साभार)

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