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ऑर्गन डोनेशन नीति बदली, क्या होगा असर

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डॉ. अंशुमान कुमार

भारत में अंग प्रत्यारोपण की सबसे ज्यादा डिमांड किडनी या लिवर के लिए है। हार्ट और फेफड़ों का ट्रांसप्लांट अपने यहां रेयर है। भारत में ट्रांसप्लांट की जितनी अधिक डिमांड है, उस हिसाब से सप्लाई बहुत कम है। इसकी कुछेक वजहें हैं।

नजदीकी रिश्तों में डोनेशन

हमारे यहां ऑर्गन ट्रांसप्लांट में दो तरीके चलते हैं। पहला, नजदीकी रिश्ते में ऑर्गन डोनेशन और दूसरा, ऑर्गन देने वाला आपका जानने वाला नहीं है, लेकिन आपने ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए नंबर लगाया है। ऐसे में अगर किसी ऐसे व्यक्ति की प्रीमच्योर डेथ हो जाती है जिसने ऑर्गन डोनेशन का कार्ड बनवाया हुआ था तो आपका नंबर आ जाता है। मगर समूचे हिंदुस्तान में यह कार्ड बहुत कम लोग बनवाते हैं, लगभग चार फीसदी। दोनों ही मामलों में जागरूकता कम है। जो जीवित हैं और ऑर्गन दे सकते हैं, उन्हें लगता है कि उनके अंग खराब हो जाएंगे। फिर एक सोशल स्टिग्मा भी है। एक उदाहरण इसका यह है कि अक्सर लोग पोस्टमॉर्टम से बचते हैं। भले मृत्यु संदेहास्पद स्थिति में हुई हो, एक्सिडेंट या मर्डर किया गया हो, तब भी घरवाले मना करते हैं कि बॉडी की चीरफाड़ मत करिए। यह एक कस्टम का हिस्सा है, जिसकी वजह से ऑर्गन डिमांड और सप्लाई की बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।

अब बात उन परिवर्तनों की जो पिछले दिनों सरकार ने किए हैं।

असल में जरूरत है जागरूकता बढ़ाने की। ऑप्ट आउट पॉलिसी हमारे देश में शायद न आ पाए क्योंकि मानवाधिकार का सवाल उठ सकता है। ऐसे में जागरूकता से ही कुछ हो सकता है। ऑर्गन डोनेशन में जो बड़ी समस्या है, उसका समाधान यह नहीं है कि उम्रसीमा को खत्म कर दिया, राज्य वाला मसला खत्म कर दिया और फीस हटा दी। बात यह है कि ऑर्गन डोनेशन इतना कठिन नहीं होना चाहिए। कठिन इसलिए बनाया क्योंकि कभी कोई किडनी रैकेट पकड़ा गया या कोई और रैकेट पकड़ा गया। आपको याद होगा कि जब अल्ट्रासाउंड करके भ्रूण परीक्षण करते थे तो लड़की होती थी तो गर्भपात करा दिया जाता था। उसके लिए इतने कड़े नियम बना दिए कि बाकी बीमारियों के डिटेक्शन में समस्या आने लगी। मतलब एक समस्या को हल करने के लिए आपने ढेरों समस्याएं पैदा कर दीं। ऐसे ही किडनी रैकेट की प्रॉब्लम हल करने के लिए हमारे पास हर तरीके का सिस्टम है। आईपीसी है, सीआरपीसी है। उसे आपको एग्जिक्यूशन लेवल पर स्ट्रॉन्ग करना पड़ेगा, न कि कानून इतना कठिन बनाते चले जाइए कि ऑर्गन डोनेशन हो ही न पाए।

यहां पर मैं उदाहरण देकर समझाता हूं। बांग्लादेश से हिंदुस्तान में सालाना लगभग साढ़े बारह हजार लोग किडनी ट्रांसप्लांट कराने आते हैं। वहां एनलजेसिक का यूज बहुत ज्यादा है इसलिए किडनी फेल होती है। हमारे यहां रूल है कि फर्स्ट ऑर्डर रिलेटिव- मतलब पति-पत्नी, माता-पिता, चाचा-चाची जैसे संबंधों में ही आप अंग दे सकते हैं। वहां किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा नहीं है तो उसके लिए एजेंट हैं। वहां ये पहले अपनी पत्नी को तलाक देते हैं। दूसरी औरत का एजेंट रहता है, उससे शादी होती है, सर्टिफिकेट बनता है। कुछ पैसे वहां एजेंट को दिए जाते हैं, औरत को दिए जाते हैं। फिर वह औरत अपने पति के साथ इंडिया आती है। इंडिया में भी वेस्ट बंगाल, जो कि इसका हब बना हुआ है और वहां के नियम दिल्ली के नियम से अलग हैं। वहां दिखाया जाता है कि दोनों पति-पत्नी हैं। वह ऑर्गन देती है, ट्रांसप्लांट होता है, वापस जाते हैं। बाकी के जो पैसे और कमिटमेंट हुए हैं, वह उस औरत और एजेंट को दिए जाते हैं। उसके बाद जिस औरत ने अंग दिया, उससे तलाक लेते हैं और अपनी पहली पत्नी से शादी करते हैं।

सांठगांठ से स्कैम

तो आपने कानून ऐसा बनाया तो उन्होंने उसकी काट निकाल ली। इंडिया में हिंदू मेजॉरिटी होने के कारण यह चीज तो नहीं हो पाएगी, न हो रही है। लेकिन जो बदमाशी हो रही है, खासकर नॉन डॉक्टर जिस तरह कुछ डॉक्टरों के साथ सांठगांठ करके किडनी स्कैम चलाते हैं, उसके लिए आप समाधान खोजिए, न कि ऑर्गन डोनेशन या ऑर्गन ट्रांसप्लांट के सिस्टम को इतना कठिन बना दीजिए कि यह हो ही न पाए।

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