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: फिल्म की असली कहानी

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शशिकांत गुप्ते

एक फिल्म निर्माता ने सीतारामजी से पटकथा लिखने के लिए संपर्क किया।
सीतारामजी ने कहा आपने गलत जगह दस्तक दी है। मैं व्यंग्यकार हूं,मैं कल्पनातीत कहानी कभी लिख ही नहीं सकता हूं।
फिल्म निर्माता ने कहा मुझे हास्य-व्यंग्य मिश्रित कहानी ही चाहिए।
सीतारामजी ने फिल्म निर्माता से कहा देश की वर्तमान स्थिति को जस का तस कैमरे में कैद कर फिल्मा दो, हास्य-व्यंग्य पर आधारित फिल्म बन जायेगी?
वैसे भी देशी फिल्म का विषय कोई भी हो,तकरीबन सभी फिल्में फार्मूला फिल्में ही तो होती है।
खलनायक के द्वारा अभिनेत्री का देह शोषण करने के प्रयास का दृश्य हर फिल्म में “अनिवार्य” होता है?
खलनायक द्वारा अपने देश को बर्बाद करने के संवाद बहुत ही निर्लज्जता से बोलना, देश की बर्बादी के लिए अवैध रूप से विभिन्न विध्वंसक रसायन और हथियारों के जखीरे का विशाल भंडार निर्भीक होकर एकत्रित करने के दृश्य फिल्माने में भी निर्माता कोई संकोच नहीं होता है?
अभिनेता को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के अमानवीय दृश्य दर्शना, अभिनेता के वृद्ध माता-पिता,या युवा बहन को बांध कर उन्हे बर्बरता पूर्वक यातना देने दृश्य दर्शाए जाते हैं।
लगभग दो घंटे,पचपन मिनिट तक खलनायक का आतंक दर्शना और अंत के मात्र पांच मिनिट में खलनायक का अंत,दर्शाने का भी फार्मूला फिक्स है।
अंत खलनायक आत्म समर्पण करता है या आत्म हत्या करता है या अभिनेता या फिल्मी पुलिस की नकली बंदूक की गोली से मारा जाता है।
फिल्म निर्माता देश भक्ति पर आधारित फिल्मों में भी अभिनेता के प्यार के दृश्य फिल्मातें ही हैं,
क्रांतिकारी का अभिनय करते हुए अभिनेता और अभिनेत्री को चना जोर गरम गाना गाते हुए भी दर्शाए जाता है।
फिल्मों में अंध विश्वास को बढ़ावा देने वाले दृश्यों को फिल्माने की परिपाटी ही है?
उपर्युक्त सारे मुद्दो में हास्य है या नहीं?
सीतारामजी निर्माता से क्षमा मांगते हुते करबद्ध प्रार्थना की,मैं आपके लिए पटकथा नहीं लिख सकता हूं।
अंत में सीतारामजी ने शायर
सफ़ी लखनवी का
यह शेर निर्माता को सुनाया।
बनावट हो तो ऐसी हो जिससे सादगी टपके
जियादा हो तो असली हुस्न छुप जाता है जेवर से

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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