मुनेश त्यागी
पिछले कुछ दिनों से हमारे देश में दुखदाई और परेशान करने वाली घटनाएं घट रही हैं जो देश के कई राज्यों और देश में जारी हैं। इन सब का निशाना लगभग 17 करोड़ मुसलमानों को बनाया जा रहा है। यहीं पर सवाल उठता है कि क्या आज मुसलमान होना गुनाह हो गया है? क्या भारत के मुसलमान इस देश के निवासी, नागरिकों और बाशिंदे नहीं है? हम पढ़े लिखे, धनवान मुसलमानों की बात नहीं कर रहे हैं, हम करोड़ों गरीब, अनपढ़, पिछड़े और वंचित मुसलमानों की बात कर रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों से हम मुसलमानों के जनसंहार और सफाये की बात सुन रहे हैं, उनकी औरतों के साथ बलात्कार करने की बात सुन रहे हैं। उन पर हमले करने के आरोप लगाए गए हैं। बिना नोटिस के उनके घर और दुकानें ढाई जा रही हैं जबकि उन्हें न्यायालय और कानून के शासन द्वारा गुनाहगार नहीं ठहराया गया है। पाकिस्तानी गाने गाने पर उनके छोटे-छोटे बच्चों को जेलों में घुसा जा रहा है, यह सब क्या हो रहा है? यदि हमारे साथ भी ऐसा ही किया जाए तो हम सबको कैसा लगेगा?
मुसलमानों पर जानबूझकर, एक साजिश के तहत उनकी तुष्टीकरण का आरोप लगाया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि जीवन के अधिकांश क्षेत्रों में उनका वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं है। 2006 सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार उनकी स्थिति एससी और एसटी से भी खराब और बदतर है। आकार पटेल की पुस्तक “हमारा हिंदू राष्ट्र” के अनुसार हमारे देश में मुसलमानों की जनसंख्या 15 परसेंट है, मगर केंद्र और राज्यों की नौकरियों में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की तस्वीर बेहद गंभीर है। केंद्र और राज्यों में उनके 4.9 पर्सेंट कर्मचारी हैं, पैरामिलिट्री फोर्स में 4.6 प्रतिशत हैं। आईएएस, आईपीएस और आईएफएस में उनका प्रतिनिधित्व 3.2 फीसदी है, भारतीय फौज में उनका प्रतिनिधि 1% से भी कम है।
समानुपातिक हिसाब से हमारे देश की संसद में उनके यानी मुसलमानों 74 सांसद होने चाहिए जो वर्तमान में केवल 27 हैं। उनका 28 राज्यों में कोई भी मुख्यमंत्री नहीं है। 15 राज्यों में कोई भी मुसलमान मंत्री नहीं है। 10 राज्यों में अल्पसंख्यक मामलों का एक मंत्री होता है। 2014 और 2019 में बीजेपी ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है। गुजरात में 1998 से संसद या विधानसभा सीट पर एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया गया है। पिछले 24 वर्षों में एक भी मुसलमान को उम्मीदवार नहीं बनाया गया है, जबकि गुजरात में 9:00 पर्सेंट मुसलमान हैं।
यह है भारत में मुसलमानों की वर्तमान स्थिति और हकीकत की एक तस्वीर जो वास्तविकता से कोसों दूर है। यह सब एक साजिश के साथ, जानबूझकर फैलाई जा रही हिंसा और नफरत की राजनीति का हिस्सा है। भारत की जनता को, इन सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हकीकत से दूर ले जाया जा रहा है। जनता के बीच हिंदू मुसलमान के नाम पर नफरत की एक खाई पैदा की जा रही है, मुसलमानों के बारे में गलत शब्द, धारणाएं और नफरत फैलाई जा रही है और जनता को गुमराह किया जा रहा है। मुसलमानों को दीमक और बाबर की औलाद क्यों कहा जाता है या उन्हें पाकिस्तान जाने के लिए क्यों कहा जाता है? क्या वे इस देश के नागरिक नहीं है? क्या वे इस देश की उन्नति, प्रगति, विकास और दुख दर्द में शामिल नहीं है?
हमारे मुस्लिम भाइयों बहनों को यह हर दिन झेलना पड़ता है, जो बहुत ही निराशाजनक और हताश करने वाला है, दिल तोड़ने वाला है। पिछले हफ्ते 13 विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री को, इन मुसलमान विरोधियों के खिलाफ बोलने के लिए लिखा, मगर प्रधानमंत्री ने अभी तक कुछ भी नहीं कहा है। अभी दो दिन पहले हमारे देश के जानेमाने 103 नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि मुसलमानों के साथ जो कुछ किया जा रहा है,वह गलत है, संविधान विरोधी है, जनतंत्र विरोधी है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के बिलकुल खिलाफ है और उनके साथ सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हिंसा और नफरत फैलाई जा रही है।
यहीं पर सबसे प्रमुख सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में हम क्या कर रहे हैं? क्या हमारा कोई कर्तव्य नही बनता है? क्या मुसलमान विरोधी ताकतें हमारी चुप्पी का फायदा नहीं उठा रही हैं? और मुसलमानों के खिलाफ अनाप-शनाप और अनर्गल आरोप नही लगा रही हैं? यह एक जानी-मानी हकीकत है कि जब अच्छे लोग चुप रहते हैं और बुराई का विरोध नहीं करते, तो बुराइयां बढ़ने लगती हैं और बुरे लोग मनमानी और ज्यादतियां करने लगते हैं। याद रखिए आज जो खतरा मुसलमानों के सामने खड़ा है, कल उसका शिकार हम ही होंगे।
यहीं पर हम कहना चाहेंगे कि हमारे देश में मुसलमान विरोधी जो नफरत की साजिश जारी है वह इतिहास विरोधी है। इतिहास का अध्ययन करें, तो हम पाएंगे कि इस देश में टीपू सुल्तान ने सबसे पहले अपने राज्य में आजादी का पौधा लगाया था और अंग्रेजो के खिलाफ लड़ते हुए मैदाने-जंग में मारे गए थे। उनके प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कृष्ण राव और पूर्णिया थे। 1857 में जो भारत की आजादी का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ था, उसके नेता बहादुर शाह जफर थे और उनके निजी सचिव हिंदू थे। उस महासंग्राम में हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर काम कर रहे थे। नाना साहब के निजी सचिव अज़ीमुल्ला खान थे। महारानी लक्ष्मी बाई के तोपची खुदाबख्श और गोश खान थे। पीर अली उसमें एक मुख्य भूमिका निभा रहे थे।
भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 10 मई 1857 को मेरठ में मेरठ से शुरू हुआ था जिसमें 85 सैनिकों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया था। आपको जानकर खुशी होगी और आश्चर्य होगा कि उसमें 52 मुसलमान थे और 32 सैनिक हिंदू थे। इसके बाद 1915 में काबुल में भारत की सबसे पहली सरकार बनाई गयी थी जिसके भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिंह और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह खान थे। जब भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो उसके उसके प्रथम सचिव शफीक अहमद मुसलमान थे।
काकोरी कांड के बहादुर क्रांतिकारी शहीद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र सिंह लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह थे। यहां भी मुसलमान भारत की स्वतंत्रता आंदोलन में पीछे नहीं थे। इस देश को आजाद कराने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सरकार बनाई थी जिसमें आठ आदमी थे जिसमें 4 मुसलमान थे और 4 हिंदू थे। नेताजी सुभाष चंद्र के निजी सचिव आबिद हसन थे और जब दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस मारे गए तो उस समय उनके साथ हबीबुर्रहमान थे जो मुसलमान थे।
भारत में सबसे पहले मौलाना हसरत मोहनी ने 1921 में “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा लगाया था, जिसको बाद में भारत के शहीदों भगतसिंह और उनके साथियों ने और हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने लगाया था और इस्तेमाल किया था। उसके बाद भारत के किसान और मजदूर आज तक भी उसका प्रयोग करते रहे हैं और इंकलाब जिंदाबाद का नारा आज भी भारत की जनता का सबसे मुखर नारा बना हुआ है।
आजाद हिंद फौज का सबसे प्रमुख नारा *जय हिंद*, नेताजी सुभाष चंद्र के सबसे बड़े दोस्त और करीबी, आबिद अली ने दिया था जो आजाद हिंद फौज का सबसे प्रमुख नारा बना और जिसको भारत की जनता आज भी प्रमुख रूप से लगाती है और बहुत सारे लोग अपने भाषण के बाद, अपनी बात समाप्त करने के बाद “जय हिंद” का नारा बोलते हैं। यह जय हिंद का नारा भी एक मुसलमान आबिद हसन ने दिया था। जब सुभाष चंद्र बोस दक्षिणी अफ्रीका के केप टाउन से पनडुब्बी में जापान पहुंचे तो तब उनके साथ उनके प्रिय दोस्त आबिद हसन ही थे।
इसी के साथ यहीं पर एक जानकारी देना बेहद जरूरी है कि जब आखरी दिन सुभाष चंद्र बोस यूएसएसआर के नेता स्टालिन से मिलने जा रहे थे तो तब उनके साथ जो विमान दुर्घटना अंग्रेजों की साजिश से हुई थी और जो उनकी मौत का कारण बनी थी, उस समय भी उनके साथ उनके सबसे प्रिय दोस्त हबीबुर्रहमान थे। इस प्रकार हम देखते हैं “दिल्ली चलो” और “जय हिंद” का नारा बुलंद करने वाले, किसी भी कीमत पर भारत को आजाद कराने वाले, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यकीन सबसे ज्यादा यकीन मुसलमानों पर ही था। ऐसे में मुसलमानों को देशद्रोही और गद्दार कैसे कहा जा सकता है?
हमारे देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। जब पाकिस्तान के साथ लड़ाई हुई 1965 में, तो उसमें आशाराम त्यागी के साथ अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान के पैटन टैंकों को ध्वस्त किया था। इस प्रकार हिंदू और मुसलमान दोनों सिपाहियों ने मिलकर हिंदुस्तान की रक्षा की थी और अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए पैटन टैंकों को ध्वस्त करके भारतीय सेना के बहादुर और जांबाज सिपाहियों ने सारी दुनिया में तहलका मचा दिया था और अमेरिका को दांतो तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आज भी भारत के विकास के हर क्षेत्र में, इस देश को आगे बढ़ाने में, इस देश की उन्नति और प्रगति में, इस देश के हिंदू और मुसलमानों दोनों का बराबर का हाथ है। ऐसे में कुछ सांप्रदायिक तत्वों द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाया जाना बहुत ही घातक और खतरनाक है, संविधान के विरोध में है, कानून के शासन के विरोध में है और यह सब देश में नफरत फैलाने की साजिश है और वर्तमान में देश की जनता के सामने उपस्थित समस्याओं रोज बढ रही आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, गरीबी, भूखमरी, रिश्वतखोरी और महंगाई से ध्यान हटाने की साजिश का एक बड़ा हिस्सा है।
अब यह भारत की जनता का सबसे प्रमुख काम बनता है कि वह देश विरोधी नफरत फैलाने वालों के खिलाफ संघर्ष के मैदान में उतरे, जनता को हिंदू मुसलमान की साझी संस्कृति की, गंगा जमुनी तहजीब की हकीकत से अवगत कराएं और इन देशद्रोही साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करें और देश के निर्दोष मुसलमानों की रक्षा और हिफाजत में आगे आएं। आज यह हमारी यानी भारत की जनता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

