( मातृभाषा हिन्दी दिवस पर विशेष )
निर्मल कुमार शर्मा
किसी भी मानव शिशु के जन्म लेने के बाद वह जो प्रथम भाषा सीखता है,उसे ही मातृभाषा कहते हैं,मातृभाषा किसी भी सभ्य समाज या देश के नागरिक की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है,भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार अपनी बात को हम जितने प्रभावशाली ढंग से अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति कर सकते हैं,उतनी किसी भी सूरत में किसी विदेशी भाषा में कतई नहीं कर सकते ! आज अगर भारत की शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व है,उसकी जगह भारत की शिक्षा इस देश की मातृभाषाओं में हो,तो आज भारत में जो नकलची मसखरे और नमूनों की जगह करोड़ों दार्शनिक और वैज्ञानिक पैदा होते ! भारत में अंग्रेजी भाषा के बढ़ते वर्चस्व व हिन्दी के अपमान व उपेक्षापूर्ण बदतर स्थिति से व्यथित और क्रुद्ध होकर एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘यदि मुझे कुछ समय के लिए निरंकुश बना दिया जाय तो मैं विदेशी भाषा अंग्रेजी को तुरन्त बंद करा दूँगा। ‘
आज के समय में दुनिया के अन्य उन्नतिशील देशों की तुलना में हम भारतवासियों में अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और देश के स्वाभिमान के प्रति जरा भी निष्ठा और स्वाभिमान ही नहीं है । हम स्वयं को दुनिया के आध्यात्मिक गुरू और विश्व गुरू कहते नहीं थकते,परन्तु बहुत ही दुःखद है कि हमें न अपनी मातृभाषा पर गर्व है न अपनी संस्कृति पर न अपने देश के स्वाभिमान पर ! वह देश क्या उन्नतिशील बनेगा जो अपने बच्चों को अपनी मातृ भाषा में शिक्षा न देकर किसी दूसरे देश की भाषा में शिक्षा की शुरूआत कराता हो ! जहाँ के लोगों को स्वयं अपनी मातृ भाषा बोलने में शर्म आती हो और विदेशी भाषा बोलने में दर्प और अभिमान महसूस होता हो और अपने को श्रेष्ठ मानने की गलतफहमी पालते हों !
कुछ क्षुद्र बुद्धि के कथित भारतीय यह कुतर्क देते हैं कि अँग्रेजी भाषा आज की सबसे जरूरी भाषा इसलिए बन गई है क्योंकि वह अंतर्राष्ट्रीय रोजगार परक भाषा बन गई है,अँग्रेजी के ज्ञान के बगैर हमारे बच्चों को रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है,इसलिए हमें बच्चों को अँग्रेजी में शिक्षा देना बहुत ही आवश्यक है या भारतीय उच्च एकेडमिक शिक्षा,इंजिनियरिंग ,मेडिकल आदि में ,शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी भाषा में ही होती है या उच्च शिक्षा की सभी स्तरीय पुस्तकें अँग्रेजी भाषा में ही उपलब्ध हैं। ये सारे तर्क लार्ड मैकाले के उस उद्देश्य के सफल होने के पुष्ट प्रमाण हैं,जिसमें उसने आज से ठीक 186 साल पहले 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में कहा था कि ‘हमें ऐसे भारतीयों की फसल तैयार करनी है,जो देखने में तो भारतीय हों ,परन्तु मानसिक तौर पर वे अँग्रेजों की मानसिकता रखते हों । ‘ आज भारत में मैकाले के सिद्धांत के सफलीभूत स्वरूप अँग्रेज़ी मानसिकता वाले भारतीय हैं,उन्हीं की सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्जा है और वही अँग्रेजी के बगैर भारत का काम ही नहीं चल सकता !जैसे कुतर्क देते हैं,यक्षप्रश्न है दुनियाभर में और भी अनेक देश हैं,वहाँ की सभ्यता और संस्कृतियाँ भी हैं । शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुँह छिपाकर बात करने से दुनिया छोटी नहीं हो जाती ! अगर उन देशों का सारा काम बगैर किसी विदेशी भाषा के चल जाता है,तो हमारा क्यों नहीं चल सकता ! उदाहरणार्थ जापान,जर्मनी,फ्रांस,नीदरलैंड ,बेल्जियम,स्पेन ,पुर्तगाल आदि-आदि सैकड़ों अत्यन्त छोटे-छोटे और जरा-जरा सी आबादी वाले देशों की बोल-चाल,पढ़ाई,शिक्षा और उच्च शिक्षा भी उनकी अपनी मातृ भाषा में ही होती है,क्या उन्हें और उनके बच्चों को अँग्रेजी ज्ञान न होने से रोजगार से वंचित रहना पड़ता है ? या वे अँग्रेजी ज्ञान से लैस किसी कथित भारतीय से किसी भी मामले में कमतर हैं,हीन हैं,पिछड़े हैं ?
दुनिया का एक देश जिसकी आबादी सिर्फ अस्सी लाख है मतलब हमारी दिल्ली की आबादी की लगभग आधी है उस देश का कुल क्षेत्रफल हमारे पूर्वोत्तर में एक नन्हें से राज्य मिजोरम से भी कम है,वह अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और अपने देश के प्रति इतना स्वाभिमानी है कि उससे हम भारतीयों को कुछ सीख और प्रेरणा तो लेनी ही चाहिए,वहाँ के निवासी हजारों वर्षों तक दुनिया के विभिन्न भागों में दरबदर होने को अभिशप्त रहे हैं। वे ताकतवर कबीलों,देशों,शासकों और तानाशाहों,जिनमें जर्मनी का कुख्यात तानाशाह एडोल्फ हिटलर भी उनमें से एक है,जो गैस चैम्बरों में डालकर 60 लाख (600000 )यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया था,जिनमें 15 लाख ( 1500000 ) सिर्फ मासूम बच्चे थे,उस देश की अपनी मातृ भाषा,हिब्रू जो विलुप्त हो चली थी,के प्रति उनकी इतनी आसक्ति और दर्प तथा स्वाभिमान है कि वह देश और वहाँ के स्वाभिमानी लोग अपनी भाषा के प्रति अपने लगन,परिश्रम और यत्न से संजोया और संजोया ही नहीं अपने देश की राजभाषा भी घोषित किया, वे अपने उच्च शिक्षा संस्थानों यथा इंजीनियरिंग, मेडिकल ,अंतरिक्ष विज्ञान,विज्ञान आदि की पुस्तकें यथा भौतिकी,रसायन,जीव विज्ञान आदि विषयों पर अपनी हिब्रू भाषा में पुस्तकें लिखवाकर वहाँ के नीचे से लेेेकर ऊपर तक की कक्षाओं में स्कूलों,कॉलेजों,विश्वविद्यालयों, आफिसों और आम बोलचाल की भाषा में अपनी मातृ भाषा का ही प्रयोग करते हैं। आज वह देश इजरायल इतना उन्नतिशील,सशक्त और बलशाली है कि मुस्लिम आतंकी देशों से घिरा होने के बावजूद किसी भी देश यथा महाबली अमेरिका रूस और चीन तक को भी उसकी तरफ अपनी आँख उठाकर देखने और आक्रमण करने से पहले हजार बार सोचने और पुनर्विचार करना पड़ सकता हैै !
और हम हैं कि तर्क दे रहे हैं कि अँग्रेजी के बगैर हमारा काम ही नहीं चल सकता ! यह बड़े ही शर्म,अफ़सोस और राष्ट्रीय गुलामी मानसिकता का द्योतक है ! आज यह बात वैज्ञानिक शोधों और तथ्यों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि कोई भी बच्चा या बड़ा किसी भी विषय या अपनी भावनाओं को जितनी बढ़िया ढंग से अपनी मातृ भाषा में व्यक्त कर सकता है,उतना बढ़िया ढंग से विदेशी भाषा में कर ही नहीं सकता ! तो फिर मातृ भाषा हिन्दी की इस हिन्दुस्तान में इतना तिरस्कार और अपमान क्यों ? और विदेशी भाषा अँग्रेजी को इतना सम्मान क्यों ? सभी प्रबुद्ध और स्वाभिमानी भारतीय कृपया चिंतन करें ।
–निर्मल कुमार शर्मा ,प्रतापविहार,गाजियाबाद,उप्र

