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भारत की धार्मिक सहिष्णुता के लिए हमारी भूमिका 

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)

  _भारत ही वह देश है जहाँ धार्मिक सहिष्णुता परम्परागत साधना के कारण जन-जीवन में सहज ही प्रतिष्ठित रही है। भारत ने आदिकाल से मनुष्य के सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रधान प्रकृति की पहचान की है और उसकी विशिष्ट प्रवृत्ति के अनुरूप आत्मिक विकास के लिए विविधि प्रकार की उपासना- विधियों का प्रवर्तन किया है।_
     मनुष्य की प्रकृति की विचित्रता के अनुरूप उसकी  उपासना की विचित्रता का विज्ञान सारे संसार के लिए एक रहस्य बना हुआ है। उपासना की विचित्रता की इसी सनातन धारा के कारण भारत में गिरि-गुहाओं में विकिसित उपासना विधियों से लेकर गृहस्थ जीवन की सभी उपासना-पद्धतियाँ आज भी जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अपनी इसी विशेषता के कारण भारत को कभी किसी परम्परा की, किसी भी विशेषता को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

जन-जीवन ने नित्य नए नए देवी-देवताओं की अर्चना की और कितने ही लोकप्रिय पुराने देवी-देवताओं की उपासना- धाराएँ स्वतः ही क्षीण होती गयीं किन्तु इतिहास के स्मारक के रूप में वे सभी पुराने देव-मंदिरों में प्रतिष्ठित रहे और सभी उन्हें समान रूप से आदर देते रहे।
कभी ब्रह्मा का पूजन होता था तो कभी बाराह का तो कभी चतुर्भुज विष्णु की उपासना प्रचलित हुई तो कभी उन्हीं के स्थान पर राम और कृष्ण की प्रतिष्ठा हो गयी। उपासना- धारा में आने वाले सारे परिवर्तन विशेष युगों की उन विशिष्ट सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों के द्योतक हैं जिनमें जनता की धार्मिक चेतना को उद्बुद्ध करने के लिए आचार्यों ने उपासना-धारा को नया मोड़ दिया है।
भारत में उपासना के धार्मिक इतिहास की खोज अभी भविष्य के गर्भ में छिपी हुई है जिसके बिना भारत के वास्तविक स्वरुप को समझा ही नहीं जा सकता।
पश्चिमी विद्वानों ने भारत की उपसना- परम्परा की अनभिज्ञता, अपनी आत्महीनता की भावना, अपने पूर्वाग्रह अथवा ईसाईयत के प्रचार की अपनी इच्छा के कारण भारत के धार्मिक इतिहास को जिस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है और भारत के देवी-देवताओं को जो प्राचीन विश्व के विशिष्ट युग पुरुष रहे हैं, जिस प्रकार गल्प-कथा के रूप में प्रस्तुत किया है, उसके अध्ययन से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित भारतीय बुद्धिजीवी पूर्णतया आत्मज्ञान-शून्य हो गया है, वह ही वास्तव में आज के तथाकथित सेक्युलर के रूप में उनकी कूटरचित विषाक्त योजना का सबल सम्बल और आत्मघाती हथियार बन गया है।

उस तथाकथित अंधे सेक्युलर को यह भी नहीं मालूम है कि वह किनके हाथों का खिलौना बना हुआ है और अपनी ही सहस्राब्दियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति के पावन मानदंडों को नष्ट करने का माध्यम बन गया है और सामाजिक समरसता के जीवनप्राण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड बन भस्मासुर सिद्ध हो रहा है और उन बारूदी ढेरों का आवाहन कर रहा है जिन पर उसी के मित्र, रिश्तेदार, पुत्र और सगे संबंधी जलकर राख के ढेर बनने वाले हैं।
भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र का इतिहास एकमात्र उसका धार्मिक इतिहास ही हो सकता है। इतिहास की आधुनिक दृष्टि प्राचीन भारत के सामने हज़ार-डेढ़ हज़ार वर्षों के अन्तराल में पैदा होने वाले अन्य राष्ट्रों पर ही लागू हो सकती है। डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व का जो विश्व था, उसका सारा इतिहास और कुछ नहीं भारत का ही धार्मिक इतिहास है।
इससे यह सिद्ध होता है कि ईसामसीह के जन्मकाल के आसपास ही मडराने का आग्रह करने वाली आधुनिक इतिहास-दृष्टि कितनी अवैज्ञानिक है और उससे मानव जाति किस कदर गुमराह हो रही है और अपनी ही सामूहिक आत्महत्या का आवाहन कर रही है।

  भारत की देवोपासना की सनातन धारा अन्य देशों में जो ले जाई गयी, उसमें आगे चलकर अंधी साम्प्रदायिक कट्टरता का समावेश हो जाने के कारण उसका अपने मूल स्थान और मूल जीवन-दृष्टि से कटकर अलग-थलग हो जाना ही रहा है। यूरोप के धार्मिक-सांप्रदायिक युद्ध और आज के आई एस आई इस और उस जैसे  अनेक आतंकवादी युद्ध इनके ज्वलंत प्रमाण हैं।
   _वे भारत के लिए दशकों से सिरदर्द रहे हैं और अब तो भारत में घुसकर ही खूनी खेल खेलने की पूर्ण तैयारी कर रहे हैं फिर भी भारत में सदियों से रह रहे उन्मादी तत्व और उनकी कूटरचित विषाक्त योजना के शिकार ये तथाकथित सेक्युलर और उनके एक दूसरे के पूरक राजनैतिक रूप से आस्तीन के सांप बन कर अपनों को ही डसने का कार्य ही नहीं कर रहे हैं, वल्कि वे भारत की सदियों पुरानी सहिष्णु संस्कृति को असहिष्णुता का नकली जामा पहनाने का घृणित पाप-कर्म भी कर रहे हैं और विडम्बना देखिये कि भारत की भोली भाली निरीह जनता उनके इस दुष्चक्र का शिकार भी बनती आ रही है।_
   मानवता को इस अत्यन्त भयानक स्थिति से उबारने का दायित्व आज के स्वतंत्र एवं जागरूक धार्मिक भारत पर ही आता है। किन्तु इससे पहले आज के ऐहिकतावादी भारत को जाति वर्ग से परे होकर, सच्चे अर्थों में धार्मिक बनना होगा।
    _हम सब को मिलकर इसके लिए प्रण लेना होगा, संकल्प लेना होगा कि हम अपने आस-पास के लोगों को तथाकथित अदृश्य किन्तु घातक सेक्युलर  जहर के फैलते प्रदूषण से सतर्क करेंगे और मानवता के रक्षण की शपथ लेंगे। चलो हम अपने से ही शुरू करते हैं। हर व्यक्ति अपने से शुरू करे तो बहुत कुछ सफलता मिलने की संभावना है।_
  (चेतना विकास मिशन)

  _भारत ही वह देश है जहाँ धार्मिक सहिष्णुता परम्परागत साधना के कारण जन-जीवन में सहज ही प्रतिष्ठित रही है। भारत ने आदिकाल से मनुष्य के सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रधान प्रकृति की पहचान की है और उसकी विशिष्ट प्रवृत्ति के अनुरूप आत्मिक विकास के लिए विविधि प्रकार की उपासना- विधियों का प्रवर्तन किया है।_
     मनुष्य की प्रकृति की विचित्रता के अनुरूप उसकी  उपासना की विचित्रता का विज्ञान सारे संसार के लिए एक रहस्य बना हुआ है। उपासना की विचित्रता की इसी सनातन धारा के कारण भारत में गिरि-गुहाओं में विकिसित उपासना विधियों से लेकर गृहस्थ जीवन की सभी उपासना-पद्धतियाँ आज भी जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अपनी इसी विशेषता के कारण भारत को कभी किसी परम्परा की, किसी भी विशेषता को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

जन-जीवन ने नित्य नए नए देवी-देवताओं की अर्चना की और कितने ही लोकप्रिय पुराने देवी-देवताओं की उपासना- धाराएँ स्वतः ही क्षीण होती गयीं किन्तु इतिहास के स्मारक के रूप में वे सभी पुराने देव-मंदिरों में प्रतिष्ठित रहे और सभी उन्हें समान रूप से आदर देते रहे।
कभी ब्रह्मा का पूजन होता था तो कभी बाराह का तो कभी चतुर्भुज विष्णु की उपासना प्रचलित हुई तो कभी उन्हीं के स्थान पर राम और कृष्ण की प्रतिष्ठा हो गयी। उपासना- धारा में आने वाले सारे परिवर्तन विशेष युगों की उन विशिष्ट सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों के द्योतक हैं जिनमें जनता की धार्मिक चेतना को उद्बुद्ध करने के लिए आचार्यों ने उपासना-धारा को नया मोड़ दिया है।
भारत में उपासना के धार्मिक इतिहास की खोज अभी भविष्य के गर्भ में छिपी हुई है जिसके बिना भारत के वास्तविक स्वरुप को समझा ही नहीं जा सकता।
पश्चिमी विद्वानों ने भारत की उपसना- परम्परा की अनभिज्ञता, अपनी आत्महीनता की भावना, अपने पूर्वाग्रह अथवा ईसाईयत के प्रचार की अपनी इच्छा के कारण भारत के धार्मिक इतिहास को जिस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है और भारत के देवी-देवताओं को जो प्राचीन विश्व के विशिष्ट युग पुरुष रहे हैं, जिस प्रकार गल्प-कथा के रूप में प्रस्तुत किया है, उसके अध्ययन से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित भारतीय बुद्धिजीवी पूर्णतया आत्मज्ञान-शून्य हो गया है, वह ही वास्तव में आज के तथाकथित सेक्युलर के रूप में उनकी कूटरचित विषाक्त योजना का सबल सम्बल और आत्मघाती हथियार बन गया है।

उस तथाकथित अंधे सेक्युलर को यह भी नहीं मालूम है कि वह किनके हाथों का खिलौना बना हुआ है और अपनी ही सहस्राब्दियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति के पावन मानदंडों को नष्ट करने का माध्यम बन गया है और सामाजिक समरसता के जीवनप्राण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड बन भस्मासुर सिद्ध हो रहा है और उन बारूदी ढेरों का आवाहन कर रहा है जिन पर उसी के मित्र, रिश्तेदार, पुत्र और सगे संबंधी जलकर राख के ढेर बनने वाले हैं।
भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र का इतिहास एकमात्र उसका धार्मिक इतिहास ही हो सकता है। इतिहास की आधुनिक दृष्टि प्राचीन भारत के सामने हज़ार-डेढ़ हज़ार वर्षों के अन्तराल में पैदा होने वाले अन्य राष्ट्रों पर ही लागू हो सकती है। डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व का जो विश्व था, उसका सारा इतिहास और कुछ नहीं भारत का ही धार्मिक इतिहास है।
इससे यह सिद्ध होता है कि ईसामसीह के जन्मकाल के आसपास ही मडराने का आग्रह करने वाली आधुनिक इतिहास-दृष्टि कितनी अवैज्ञानिक है और उससे मानव जाति किस कदर गुमराह हो रही है और अपनी ही सामूहिक आत्महत्या का आवाहन कर रही है।

  भारत की देवोपासना की सनातन धारा अन्य देशों में जो ले जाई गयी, उसमें आगे चलकर अंधी साम्प्रदायिक कट्टरता का समावेश हो जाने के कारण उसका अपने मूल स्थान और मूल जीवन-दृष्टि से कटकर अलग-थलग हो जाना ही रहा है। यूरोप के धार्मिक-सांप्रदायिक युद्ध और आज के आई एस आई इस और उस जैसे  अनेक आतंकवादी युद्ध इनके ज्वलंत प्रमाण हैं।
   _वे भारत के लिए दशकों से सिरदर्द रहे हैं और अब तो भारत में घुसकर ही खूनी खेल खेलने की पूर्ण तैयारी कर रहे हैं फिर भी भारत में सदियों से रह रहे उन्मादी तत्व और उनकी कूटरचित विषाक्त योजना के शिकार ये तथाकथित सेक्युलर और उनके एक दूसरे के पूरक राजनैतिक रूप से आस्तीन के सांप बन कर अपनों को ही डसने का कार्य ही नहीं कर रहे हैं, वल्कि वे भारत की सदियों पुरानी सहिष्णु संस्कृति को असहिष्णुता का नकली जामा पहनाने का घृणित पाप-कर्म भी कर रहे हैं और विडम्बना देखिये कि भारत की भोली भाली निरीह जनता उनके इस दुष्चक्र का शिकार भी बनती आ रही है।_
   मानवता को इस अत्यन्त भयानक स्थिति से उबारने का दायित्व आज के स्वतंत्र एवं जागरूक धार्मिक भारत पर ही आता है। किन्तु इससे पहले आज के ऐहिकतावादी भारत को जाति वर्ग से परे होकर, सच्चे अर्थों में धार्मिक बनना होगा।
    _हम सब को मिलकर इसके लिए प्रण लेना होगा, संकल्प लेना होगा कि हम अपने आस-पास के लोगों को तथाकथित अदृश्य किन्तु घातक सेक्युलर  जहर के फैलते प्रदूषण से सतर्क करेंगे और मानवता के रक्षण की शपथ लेंगे। चलो हम अपने से ही शुरू करते हैं। हर व्यक्ति अपने से शुरू करे तो बहुत कुछ सफलता मिलने की संभावना है।_
  (चेतना विकास मिशन)
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