मुनेश त्यागी
हम पिछले दो तीन दिन से देख रहे हैं कि हमारे अधिकांश अखबार शिक्षकों की प्रशंसा से भरे पड़े हैं, वे उनकी शान में झंडे गाड़ रहे हैं। शिक्षकों ने यह कर दिया, वह कर दिया। इस तरह के दावे कर रहे हैं कि मानो हमारे शिक्षक आदर्शवादी दशाओं में काम कर रहे हैं और स्वर्ग में रह रहे हैं। यह माना कि हमारे समाज में शिक्षा प्रणाली को बढ़ाने में शिक्षकों का एक बड़ा हाथ रहा है और आजादी के 40 साल तक हमारे शिक्षकों ने हमारे देश में बहुत प्रशंसनीय कार्य किया है।
मगर वैसे तो पहले भी शिक्षकों का काम करना इतना आसान नहीं है। पहले भी हमारे शिक्षक किसी स्वर्ग में काम ही कर रहे थे। अपने काम करने के दौरान उन्हें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता था जैसे छात्रों के अनुपात में शिक्षक नहीं थे, शिक्षकों को उनके कानूनी अधिकार मुहैया नहीं कराए जाते थे, बहुत सारे शिक्षकों को दूसरे विषय पढ़ाने पर मजबूर किया जाता था। उनकी सेवा शर्तें निश्चित नहीं थीं, उन्हें न्यूनतम वेतन ही दिया जाता था।
हम अपने छात्र जीवन से यह देखते चले आ रहे हैं, मगर पिछले 30 सालों से जब से शिक्षा का व्यवसायीकरण, बाजारीकरण किया गया है और शिक्षा को मुनाफा कमाने वाले चंद पूंजीपतियों के हवाले कर दिया गया है, तब से शिक्षकों की समस्याएं भी बेतहाशा बढ़ गई हैं और पिछले 15 सालों से तो शिक्षकों को कई बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
आज हकीकत यह है कि आजादी के 75 साल बाद भी, छात्रों के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं, शिक्षकों को उनकी कानूनी सुविधाएं नहीं दी जातीं, शिक्षकों से शिक्षण के अलावा दूसरे काम किए जा कराए जाते हैं, शिक्षकों की समस्याएं साल दर साल बढ़ती चली आ रही हैं, शिक्षकों की समस्याओं को दूर करने का कोई प्रभावी मैकेनिज्म विश्वविद्यालयों के पास नहीं है। विश्वविद्यालय के अधिकारी शिक्षकों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते, उनकी बात नहीं सुनतें। कई बार तो शिक्षकों को अपनी मांगे मनवाने के लिए आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है।
अभी कुछ दिन पहले कई शिक्षक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि यदि उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं किया गया तो वे 5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस के मौके पर को विद्यालय और कार्यों का बहिष्कार करेंगे, अपने काम का बहिष्कार करेंगे। शिक्षकों की इन चेतावनिओं के बाद भी उनकी समस्याओं का कोई निराकरण नहीं किया गया और उनके अधिकारियों पर उनकी समस्याओं को लेकर, कान पर जूं नहीं रेंगी।
कई सारे सरकारी स्कूलों में, विद्यालयों में हजारों शिक्षकों को आज भी गेस्ट टीचर के नाम पर रखा जा रहा है, उनसे कई सारे गैर शिक्षण कार्य कराए जाते हैं। उनके कोई कानूनी अधिकार नहीं हैं। जैसे वे बिल्कुल अधिकार विहीन नौकरी कर रहे हैं। इन शिक्षकों को अर्न्ड लीव नहीं मिलती, कैजुअल लीव नहीं मिलती, मेडिकल लीव नहीं मिलती। हालात यहां तक खराब है कि इन गेस्ट टीचर्स को बीमारी की हालत में भी काम करना पड़ता है और अगर घर में कोई बीमार हो जाए, बच्चे बीमार हो जाएं और यह गेस्ट टीचर छुट्टी कर लें, तो उनका एक दिन का वेतन काट लिया जाता है, छुट्टी के दिनों का इनको कोई वेतन नहीं मिलता। इस प्रकार इनकी शिकायत के निराकरण का कोई कारगर माध्यम निश्चित नहीं है।
ऐसे ही बहुत सारे टीचर्स को अस्थाई नौकरी पर रखा जा रहा है। ना तो उनके घंटे तय हैं, ना उनका मासिक वेतन तय है, ना ही उनका काम करना निश्चित है। इस प्रकार हमारे देश में हजारों लाखों की संख्या में गेस्ट टीचर्स और अनियमित टीचर्स काम कर रहे हैं। यह हाल तो सरकारी क्षेत्र के शिक्षकों का है।
मगर इसी के साथ अगर निजी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों पर और विश्वविद्यालयों पर एक नजर दौड़ाई जाए तो वहां पर पता चलेगा कि यहां पर अधिकांश शिक्षक ठेके पर रखे गए मजदूरों से भी बदतर कार्य दशाओं के माहौल में काम करने को मजबूर हैं। शिक्षण संस्थाओं में अधिकांश शिक्षक अस्थाई तौर पर रखे जाते हैं। उनका न्यूनतम वेतन, उनकी कार्य दर्शाए निश्चित नहीं हैं। उनको न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। वे 10-12 घंटे काम करते हैं, मगर उनका कोई न्यूनतम वेतन नहीं है। उनको कैजुअल लीव, अर्न्ड रिलीव और मेडिकल लीव की कोई व्यवस्था नहीं है।
हालात इतने खराब हैं कि खानापूर्ति के लिए इन टीचर को न्यूनतम वेतन देने का दिखावा किया जाता है, मगर अगले ही क्षण इन्हें ना मात्र ₹8000 मासिक दिए जाते हैं और बाकी वेतन इन से वापस ले लिया जाता है। ये शिक्षक गरीब तबके से हैं, इन्हें पैसे की सख्त जरूरत है, इनका कोई संगठन नहीं है, इनमें लड़ने की ताकत नहीं है। इनका प्राइवेट स्कूलों के मालिकान द्वारा भयंकर शोषण, अन्याय और जुल्म किया जाता है। इनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। सरकार भी इस और कोई ध्यान नहीं दे रही है।
यहां पर हम यही कहेंगे कि सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र के बहुत सारे शिक्षकों को न्यूनतम वेतन दिया जाए, उनके काम के घंटे निश्चित किया जाए, उनकी नौकरी परमानेंट की जाए और उनसे शिक्षण कार्य के अलावा दूसरे कार्य न कराए जाएं और रिटायरमेंट एवं नौकरी सभापति की दशा में उनकी ग्रेचुइटी का भुगतान किया जाए और उनके समस्त कानूनी देयों का भुगतान किया जाए। तभी और केवल सभी शिक्षक दिवस मनाने के कोई मायने हो सकते हैं।
अन्यथा यह सब दिखावा ही रह जाएगा और केवल नारेबाजी और जुमलेबाजी ही जारी रहेगी। हजारों लाखों शिक्षकों के भविष्य यूं ही अंधेरे में गुजरने को मजबूर होंगे और इसका सबसे बड़ा खामियाजा हमारे देश के विकास को, हमारे देश की शिक्षा प्रणाली को और हमारे देश के करोड़ों छात्र छात्राओं को उठाना पड़ेगा।

