पुष्पा गुप्ता
काफी श्रम करके हमने यह विशद् आख्यान तैयार किया है ताकि दुष्टों-मूर्खो के बारे में यत्र-तत्र बिखरी हुई ज्ञान राशि आपको एक जगह उपलब्ध हो जाये और जीवन में आपको इसका लाभ प्राप्त हो। लम्बा है लेकिन पढ़ेंगे तो आपही को लाभ होगा। आलस्य करेंगे तो जीवन में हानि उठायेंगे और तदनंतर पश्चाताप करेंगे।
*श्रीदुष्ट महाख्यानम् :*
दुष्टों अथवा दुर्जनों की महिमा अपरम्पार होती है. दुष्ट कई प्रकार के होते हैं. जैसे राजनीतिक-सामाजिक दुष्टता जहाँ अपने शिखर पर पहुँचकर जघन्यतम और अमानवीयतम हो जाती है, वह पराकोटि या परिणति-बिंदु फासिज्म हैI
वर्गीय दुष्टता एक ऐतिहासिक-सामाजिक परिघटना है. जैसे एक पूँजीपति व्यक्तिगत तौर पर शरीफ़ हो सकता है, पर उसका वर्ग ही दुष्ट वर्ग है क्योंकि वह शोषक है, मज़दूरों से अधिशेष निचोड़ना ही उसके सामाजिक अस्तित्व का आधार है.
इस वर्गीय दुष्टता से हम व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं ले सकते ! इस वर्गीय दुष्टता को वर्ग-संघर्ष की ऐतिहासिक प्रक्रिया से ही समाप्त किया जा सकता है. एक वर्ग के रूप में जबतक पूँजीपति मौजूद रहेगा, तबतक उसकी वर्गीय दुष्टता मौजूद रहेगी.
जहाँतक व्यक्तिगत दुष्टता का सवाल है, दुष्टों या दुर्जनों की कई कोटियाँ होती हैं.
ऐसे दुर्जन आपको समाज के आम लोगों में भी बहुतायत में मिल जायेंगे –आम मध्य वर्ग और मज़दूरों में भी मिल जायेंगे. आम लोगों में यह दुर्जनता कई बार , वर्ग समाज में जीने वाले नागरिक के सामाजिक (और इसलिए मानवीय) व्यक्तित्व के विघटन से पैदा होता है. कई बार जनवादी और तार्किक चेतना की कमी के कारण, दिमाग़ के पोर-पोर में बैठे धार्मिक, जातिगत और जेंडरगत कुसंस्कार और पूर्वाग्रह भी हमें मानवद्रोही और दुष्ट बना देते हैं.
ऐसा भी होता है कि बुर्जुआ समाज में दिन रात, सतत, अंधी प्रतिस्पर्द्धा में जीते हुए, कुत्ता दौड़ में दौड़ते हुए, भेड़ियाधसान करते हुए हम अपनी मनुष्यता खोते चले जाते हैं और तुच्छ और कूपमंडूक होने के साथ ही ईर्ष्या और दुष्टता में जीने को भी कुछ यूँ एन्जॉय करने लगते हैं जैसे खाज का रोगी खुजली कर-करके आनंदित होता है. ज़िंदगी की कुत्ता-दौड़ में जो पीछे छूट गया वह आगे वाले को लंगी मारने की पूरी कोशिश करता है और आगे बढ़ने के लिए हर व्यक्ति किसी को भी रौंद-कुचल देना चाहता है. जो विजयी है, वह विशिष्ट है और जो पीछे छूट गया वह दीन-हीन, तिरस्करणीय है.
इस तरह बुर्जुआ समाज दुष्टता का कोरोना से भी घातक वायरस फैलाता रहता है. न्यायशील और तार्किक विचारों, न्यायशील सामूहिक कर्म तथा कला-साहित्य और प्रकृति के गहन सानिध्य से जिस हद तक हमारी प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई रहती है, उसी हद तक हम दुष्टता के संक्रामक वायरस से बच पाते हैं. आज हम जिस रुग्ण, बर्बर, ज़रा-जीर्ण पूँजीवादी समाज में जी रहे हैं, उसमें दुष्टता के वायरसों का पूरा परिवार नाना संक्रामक आत्मिक-सांस्कृतिक व्याधियों से समाज को त्रस्त किये हुए है.
जब कोई व्यक्ति या सामाजिक समूह बार-बार की पराजयों या सुदीर्घ दासता के चलते गहरे पराजय-बोध से भर जाता है तो उसके भीतर भी एक किस्म का यथास्थितिवाद और चालाकी एवं कायरता भरी दुनियादारी पैदा हो जाती है. तब उसके पास उन्नत मानवीय आदर्श और सपने देखने की क्षमता नहीं रह जाती, उसके व्यक्तित्व में उदात्तता और सरलता का लेश मात्र भी नहीं रह जाता. ऐसे व्यक्तित्व तुच्छता, जलन-कुढ़न और ईर्ष्या से लबालब भरे रहते हैं, अपने से अधिक सक्षम और ताक़तवर के आगे एकदम साष्टांग हो जाते हैं और अपने से नीचे वाले को, अपने से कमजोर को एकदम रगड़-कुचल देना चाहते हैं और फिर उनकी छाती पर बैठकर हुकूमत करना चाहते हैं.
उत्पादन की प्रक्रिया से कटे हुए सर्वहारा के एक हिस्से का भी विमानवीकरण हो जाता है. उनमें से कई आत्मघाती ढंग से खुद को ही नष्ट करते रहते हैं, पर कई ऐसे दुष्ट भी बन जाते हैं जो फासिस्टों के भाड़े के लठैत बन जाते हैं, मानवीय हर चीज़ से बेगाने हो जाते हैं, उससे नफ़रत करने लगते हैं और जघन्य-वीभत्स दुष्कर्मों के लिए भी तैयार रहते हैं. दुष्टता के सभी रूप बुर्जुआ समाज की रुग्णता के, या यूँ कहें कि वर्ग-समाज की रुग्णता के मूर्त रूप होते हैं.
बहरहाल, मैंने तो अपने जीवन में सबसे अधिक, भाँति-भाँति के दुर्जन और दुष्ट खाते-पीते मध्यवर्गीय समाज में ही पाए हैं.
व्यापारियों, प्रॉपर्टी डीलरों और वकीलों-डाक्टरों-प्रोफेसरों जैसे पेशेवर बुद्धिजीवियों के अतिरिक्त कवियों-लेखकों-कलाकारों की दुनिया में भी तरह-तरह के दुष्ट जीव देखे हैं — ईर्ष्यालु, हर बनते काम को बिगाड़ने के लिए तत्पर रहने वाले, चुगलखोर और कुटने, निहायत स्वार्थी, मतलबी, पद-पुरस्कार लोलुप, रसिया और रंगबाज़. शायद यह भारतीय समाज में पुनर्जागरण और प्रबोधन के प्रोजेक्ट के खंडित-विकलांग चरित्र तथा दो सौ वर्षों की गुलामी से पैदा हुई जनवादी व तार्किक चेतना की कमी ही है जिसने हमारे मध्यवर्गीय बौद्धिक समाज के भी एक बड़े हिस्से को इसक़दर दुष्ट बनाया है.
हमारे समाज के ताने-बाने में जनवाद की कमी के कारण यहाँ का मानसिक श्रम करने वाला तबका शारीरिक श्रम करने वालों से सिर्फ़ अपने को बहुत श्रेष्ठ ही नहीं समझता, बल्कि उनसे घृणा करता है. पुरुष-स्वामित्ववाद और सवर्ण-श्रेष्ठतावाद के संस्कार इस अमानवीय सामाजिक दुष्टता को और मज़बूत बनाते हैं. इस वस्तुगत सामाजिक स्थिति का पूरा लाभ फासिज्म की राजनीति को मिलता है. यानी आज जो ब्राह्मणवाद/सवर्ण-श्रेष्ठतावाद की और मर्दवाद की संस्कृति और राजनीति है वह फासिज्म का टूल बन गया है. यूँ कहें कि ब्राह्मणवाद और मर्दवाद आज पूँजीवाद की सेवा में सन्नद्ध हैं.
तो चलिए, दुष्टों के बारे में फिर कुछ और बातें की जाएँ. दरअसल, जो भी दुष्टों के सताए हुए लोग हैं, उन्हें दुष्टों की निंदा से सुख प्राप्त होता है.
संस्कृत का एक कवि (नाम मुझे पता नहीं) कहता है :
“दुर्जनं प्रथमं वन्दे सज्जनं तदनंतरम
मुखप्रक्षालानात्पूर्व गुद्प्रक्षालनं यथा I”
अर्थात्, पहले मैं दुर्जन की वन्दना करता हूँ, उसके बाद सज्जन की, ठीक उसीप्रकार, जैसे मुख-प्रक्षालन के पहले गुदा-प्रक्षालन किया जाता है. (यहाँ तत्सम शब्दों के इस्तेमाल से बात थोड़ी सभ्यतापूर्ण लग रही है. इसी बात को अगर देशज और तद्भव शब्दों में कह दिया जाए तो बात फूहड़ और अश्लील लगने लगेगी. तत्सम शब्दों या अंग्रेज़ी में कहने पर गाली गाली नहीं लगती और गंदी बात भी शालीनतापूर्ण लगने लगती है.
लेकिन दुष्ट जनों के सूक्ष्म पर्यवेक्षण के मामले में तुलसीदास का कोई जोड़ नहीं है. साथ ही दुष्टों के गुण बताते हुए जिस ह्यूमर और विट का प्रदर्शन तुलसीदास ने किया है, वह भी बेजोड़ है.
‘रामचरित मानस’ के ‘बालकाण्ड’ की शुरुआत में ही तुलसी दुष्टों की वन्दना करते हैं ताकि वे उनका सत्कार्य पूरा होने दें. हालांकि अंत में वह यह संदेह भी प्रकट करते हैं कि इस वन्दना से दुष्टों पर कोई प्रभाव पड़ेगा ! वह कहते हैं कि अत्यंत प्यार से पालने पर भी कौव्वा निरामिषभोजी नहीं हो सकता. तुलसी की इस पूरी खल-वन्दना का आनंद लीजिये :
“बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥
दोहा-उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥”
अब सुविधा के लिए इस ‘खल-वन्दना’ का भावार्थ भी पढ़ लीजिये :
अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों की वन्दना करता हूँ जो बिना किसी प्रयोजन के दायें-बायें होते रहते हैं। दूसरों की हानि करना ही इनके लिये लाभ होता है तथा दूसरों के उजड़ने में इन्हें हर्ष होता है और दूसरों के बसने में विषाद। ये हरि (विष्णु) और हर (शिव) के यश के लिये राहु के समान हैं (अर्थात् जहाँ कही भी भगवान विष्णु या शिव के यश का वर्ण होता है वहाँ बाधा पहुँचाने वे पहुँच जाते हैं)। दूसरों की बुराई करने में ये सहस्त्रबाहु के समान हैं। दूसरों के दोषों को ये हजार आँखों से देखते हैं। दूसरों के हितरूपी घी को खराब करने के लिये इनका मन मक्खी के समान है (जैसे मक्खी घी में पड़कर घी को बर्बाद कर देती है और स्वयं भी मर जाती है वैसे ही ये दूसरों के हित को बर्बाद कर देते हैं भले ही इसके लिये उन्हें स्वयं ही क्यों न बर्बाद होना पड़े)। ये तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं और पाप और अवगुणरूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं।
इनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के समान केतु (पुच्छल तारा) के समान है। ये कुम्भकर्ण के समान सोये रहें, इसी में सभी की भलाई है। जिस प्रकार से ओला खेती का नाश करके खुद भी गल जाता है उसी प्रकार से ये दूसरों का काम बिगाड़ने के लिये खुद का नाश कर देते हैं। ये दूसरों के दोषों का बड़े रोष के साथ हजार मुखों से वर्णन करते हैं इसलिये मैं दुष्टों को (हजार मुख वाले) शेष जी के समान समझकर उनकी वन्दना करता हूँ। ये दस हजार कानों से दूसरों की निन्दा सुनते हैं इसलिये मैं इन्हें राजा पृथु (जिन्होंने भगवान का यश सुनने के लिये दस हजार कान पाने का वरदान माँगा था) समझकर उन्हें प्रणाम करता हूँ।
सुरा जिन्हें नीक (प्रिय) है ऐसे दुष्टों को मैं इन्द्र (जिन्हे सुरानीक अर्थात देवताओं की सेना प्रिय है) के समान समझकर उनका विनय करता हूँ। इन्हें वज्र के समान कठोर वचन सदैव प्यारा है और ये हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं। दुष्टों की यह रीत है कि वे उदासीन रहते हैं ( अर्थात् दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिये यह नहीं देखते कि वह मित्र है अथवा शत्रु)। मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक दुष्टों की वन्दना करता हूँ।
मैंने अपनी ओर से वन्दना तो की है किन्तु अपनी ओर से वे चूकेंगे नहीं। कौओं को बड़े प्रेम के साथ पालिये , किन्तु क्या वे मांस के त्यागी हो सकते हैं?
क्या ख़याल है दुष्टों के बारे में? क्या थोड़ा और गलचौर किया जाए ? अगर कभी दुष्टों के पाले पड़े होंगे, और आप खुद दुष्ट नहीं होंगे, तो मज़ा ज़रूर आयेगा.
एक गाँधीवादी टाइप अंकलजी हैं. मुझे तो, जो गाँधी टोपी वह पहने रहते हैं, साक्षात वैसे ही लगते भी हैं. जो भी हो, आदमी भले हैं. मुझे बहुत दुर्विनीत और क्रोधी स्वभाव का मानते हैं. सच्चे शुभचिंतक हैं. डरते हैं कि इतना क्रोध करने और तनाव में रहने से मुझे उच्च रक्तचाप हो सकता है, हृदयगति भी रुक सकती है, बुढ़ापा जल्दी आ सकता है और बहुत सारे लोग मेरे शत्रु हो सकते हैं जो मुझे हानि पहुँचा सकते हैं. वे मुझे समझाते हैं और मैं उनको समझाती हूँ और अंततः हम एक-दूसरे को समझाने में कभी सफल नहीं हो पाते.
अंकलजी लगातार मुझे दुष्टों की दुष्टताओं को भूल जाने और उन्हें क्षमा कर देने और उनपर ध्यान ही न देने की कोशिश करने के लिए कहते हैं और मेरी आदत यह है कि कोई दुष्ट मिल जाए और उसका टारगेट मैं न भी होऊँ, तो भी मैं रुककर उसका बारीकी से अध्ययन करने लगती हूँ कि अब यह कौन सी दुष्टता करेगा, किसको निशाना बना रहा है, अभी यह क्या सोच रहा है, आदि-आदि …!
उच्च कोटि के दुष्टों की एक खासियत होती है. वे काहिल और सुस्त या मनहूस नहीं होते. लगातार खुराफात के बारे में सोचते रहते हैं या करते रहते हैं. दुष्ट लोग सक्रिय लोग होते हैं. उन्होंने अपने को इस दुनिया में जीने लायक बना लिया है.जो सुस्त और काहिल भलेमानस होते हैं वे सिर्फ़ सरकारी दफ्तरों में नौकरी करने के लिए ही इस धरती पर आये हैं. न वे बिंदास-बेलौस जी पाते हैं, न ज़िंदगी को बदलने की लड़ाई में कुछ तूफानी अंदाज़ में शिरक़त ही कर पाते हैं.
तो पिछली बार जब अंकलजी मिले, तो बोले,”तुम संस्कृत के शास्त्रीय आचार्यों के अनुभव और अभिव्यक्तियों की सूक्ष्मताओं का तो बहुत ख़याल करती हो.
देखो, एक आचार्य क्या कहते हैं:
‘क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जन: किं करिष्यति|
अतॄणे पतितो वन्हि: स्वयमेवोपशाम्यति ||’
अर्थात्, क्षमा रूपी शस्त्र जिसके हाथ में हो , उसे दुर्जन क्या कर सकता है ? अग्नि , जब किसी जगह पर गिरता है जहाँ घास न हो , अपने आप बुझ जाता है I
मैंने अंकलजी से कहा,” इन वाले आचार्य के जीवनानुभव शायद कुछ कम हैं.”
अब मैं आपको ऐसा कुछ और भी दिखाती हूँ :
‘सर्प दुर्जनयोर्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनःI
सर्पो दशति कालेन दुर्जनास्तु पदे-पदेII’
अर्थात्, सर्प और दुर्जन के बीच सर्प को चुनो, न कि दुर्जन को क्योंकि सर्प तो समय आने पर डंसता है, पर दुर्जन तो कदम-कदम पर डंसता हैI
‘खलानां कंटकानां च द्विविधैव प्रतिक्रियाI
उपानन्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्II’
अर्थात्, दुष्ट मनुष्य और कांटे से छुटकारा पाने के दो ही उपाय हैं — या तो जूते से मुँह तोड़ दो, या फिर दूर से ही भगा दोI
‘दुर्जस्नन सज्जनं कर्तुमुपायो नही भूतलेI
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्II’
अर्थात्, इस पृथ्वी पर दुर्जन को सज्जन बनाने का कोई उपाय नहीं हैI अपान इन्द्रिय को सौ बार धोकर भी उसे श्रेष्ठ इन्द्रिय नहीं बनाया जा सकता।
‘दुर्जनः स्वस्वभावेन परकार्य विनश्यतिI
नोदरतृप्तिमायाति मूषकः वस्त्रभक्षकःII’
अर्थात्, दुर्जन अपने स्वभाव से ही दूसरे के कार्य को हानि पहुंचाता हैI वस्त्रभक्षक चूहा उदर-तृप्ति के लिए वस्त्र नहीं काटताI
‘यथा परोपकारेषु नित्यं जागर्ति सज्जनःI
तथा परापकारेषु जागर्ति सततं खलःII’
अर्थात्, जैसे सज्जन परोपकार करना के लिए नित्य जाग्रत रहता है, वैसे ही दुष्ट व्यक्ति दूसरों का अपकार करने के लिए सतत जाग्रत रहता हैI
‘तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाश्व मस्तके I
वृश्चिकस्य विषं पृच्छे सर्वांगे दुर्जनस्य तत् II’
सांप का विष उसके दांत में, मक्खी का उसके मस्तक में और बिच्छू का पूँछ में होता है, लेकिन दुर्जन का तो पूरा शरीर ही विष से भरा होता हैI
‘दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोSपि नित्यशःI
स्वेदनाभ्यंजनोपायै:श्वापुच्छमिव नामितम II’
अर्थात्, जैसे कुत्ते की पूंछ स्वेदन-अंजन आदि उपायों से सीधी नहीं होती, उसीप्रकार चाहे जितनी भी सेवा करें, दुर्जन को सीधा नहीं बनाया जा सकता !”
मैं अंकलजी को दुष्टों के बारे में अभी पाँच-छः श्लोक और सुनाने वाली थी, पर अंकलजी अबतक मुझे रास्ते पर लाने के मिशन से पर्याप्त निराश हो चुके थेI उन्होंने कहा कि मैं दुष्टों से शत्रुता मोल लेने के खतरों को समझ नहीं रही हूँ, इसीलिये संघियों और भक्तों से अक्सर बैर मोल लेती रहती हूँ. मैंने अंकलजी से कहा कि गाँधी से मैं चाहे जितनी असहमति रखूँ, पर उनकी एक बात ठीक थी कि वह पतली गली से बच निकलने की टैक्टिक्स नहीं अपनाते थे. अंकलजी के असंतोष में अब कुछ नाराज़गी भी घुलने लगी थी. कुछ कारण बताकर वह तुरत चलते बने.
उनके जाने के बाद मित्रों ने कहा कि बाकी हमको सुना डालिए, ताकि समय पर काम आवे. मैं भी सोची कि परोपकार के इस पावन कृत्य से पीछे क्यों हटूं. तो लीजिये, आप भी पढ़िए :
‘बोधितोSपि बहु सूक्ति विस्तरै:किं खलो जगति सज्जनो भवेत् I
स्नापितोSपि बहुशो नदीजलै: गर्दभःकिमु हयो भवेत् क्वचित् II’
अर्थात्, सद्वचनों का उपदेश देने से क्या इस विश्व के दुष्ट जन सज्जन हो जायेंगे ? नदी के जल से बार-बार स्नान करने के बाद भी क्या गधा घोड़ा बन पायेगा ?
‘अहमेव गुरु:सुदारुणानामिति हलाहल मा स्म तात दृप्य:I
ननु सन्ति भवादृशानि भूयो भुवनेस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम् II’
अर्थात्, हे हलाहल ! मैं भयंकरों में सर्वाधिक भयंकर हूँ, ऐसा कदापि न सोचना ! इस जगत में तुमसे अधिक भयंकर दुष्ट के वचन हैं.
‘अमरैरमृतं न पीतमब्धे: न च हलाहलमुल्बनं हरेणI
विधिना निहितं खलस्य वाचि द्वयमेतत् बहिरेकमन्तरान्यत् II’
अर्थात्, सागर में से जो अमृत देवताओं ने नहीं पिया और जो हलाहल शंकर ने नहीं पिया, उन दोनों को ब्रह्मा ने दुष्टों की वाणी में रख दिया — अमृत को बाहर, और हलाहल को भीतर.
‘वर्जनीयो मतिअमता दुर्जनः सख्यवैरयो:I
श्र्वा भवत्यपकाराय लिहन्नपि दशन्नपिII’
अर्थात्, विवेकवान मनुष्य को दुष्ट से न मित्रता करनी चाहिए, न शत्रुता ! कुत्ता चाटता है, या काटता है, दोनों ही स्थितियों में बुरा ही होता है.
‘बहुनिष्कपटद्रोही बहुधान्योपधातकःI
रंध्रान्वेषी च सर्वत्र दूषको मूषको यथाII’
अर्थात्, दुष्ट चूहों की तरह होते हैं ! वे निष्कपट लोगों से द्रोह करते हैं जैसे चूहा कीमती चीज़ों को कुतर देता है, चूहों की ही तरह वे छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं और गन्दगी फैलाते हैं.
‘त्यकत्वापि निज प्राणान् परहित विघ्नं खलः करोत्येवI
कवले पतिता सद्यो वमयति खलु मक्षिकाSन्नभोक्तारम् II’
अर्थात्, दुष्ट अपने प्राण त्याग कर भी दूसरे के हित में विघ्न डालने को तैयार रहता है, जैसे भोजन में पड़ी हुई मक्खी भोजन करने वाले को उल्टी करने के लिए विवश कर देती हैI
‘रविरपि न दहति तादृग् यावत् संदहति वालिका निकर:I
अन्यस्माल्लब्धपदः नीचः प्रायेण दुस्सहो भवती II’
अर्थात्, बालू जितना जलाता है, उतना सूरज भी नहीं जलाता I दूसरों के प्रभाव से पद पाने वाला नीच मनुष्य प्रायः दुस्सह्य होता है I
‘तुष्यन्ति भोजनैर्विप्रा:मयूरा घनगर्जितै:I
साधवः परकल्याणे: खला: परविपत्तिभिःII’
अर्थात्, ब्राह्मण भोजन से, मयूर मेघ-गर्जना से, सज्जन व्यक्ति परहित से और दुष्ट व्यक्ति परविपत्ति से संतुष्ट होता है.
‘अहो दुर्जन संसर्गात् मानहानि: पदे पदेI
पावको लोहसंगेन मुद्ररैरभिहन्यते II’
अर्थात्, दुष्ट मनुष्य की संगत से पग-पग पर मानहानि होती है, वैसे ही जैसे, लोहे के साथ के कारण आग को भी हथौड़े से पिटना पड़ता है.
‘क्वचित् सर्पोSपि मित्रत्वमियात् नैव खलः क्वचित्I
न शेषशायिनोSप्यस्य वशे दुर्योधनः हरे:II’
अर्थात्, कभी साँप भी मित्र बन सकता है, पर दुष्ट को कभी मित्र नहीं बनाया जा सकता ! हरि शेषनाग को शैय्या बनाकर सोते थे, पर दुर्योधन उनका मित्र न हो सका.
‘गुणायंते दोषाः सुजनवदने दुर्जन्मुखे
गुणाः दोषायंते तदिदं नो विस्मयपदम्I
महमेघः क्षारं पिबति कुरुते वारि मधुरम्
फणी क्षीरं पीत्वा वमति गरलं दुस्सहतरंII’
अर्थात्, कोई आश्चर्य नहीं कि सज्जन पुरुष के मुँह में दोष भी गुण बन जाते हैं जबकि दुर्जन मनुष्य के मुँह में गुण भी दोष बन जाता है ! बादल खारा जल पीकर मीठे जल की वर्षा करते हैं, जबकि साँप दूध पीकर भी भयंकर विष उगलता है.
‘न दुर्जनः सज्जनतामुपैति बहु प्रकारैरपि सेव्यमानःI
अत्यंतसिक्तः पयसा धृतेन न निम्बवृक्षः मधुतामुपैतिII’
अर्थात्, बहुत प्रकार से सेवा करने के बाद भी दुर्जन को सज्जन नहीं बनाया जा सकता ! ढूध और घी में बहुत अधिक भिगोने के बाद भी नीम के पेड़ को मीठा नहीं बनाया जा सकता.
‘पाषाणो भिध्यते टंके वज्रः वज्रेण भिध्यतेI
सर्पोSपि भिध्यते मन्त्रैर्दुष्टात्मा नैव भिध्यतेII’
अर्थात्, पत्थर को टंक से, वज्र को वज्र से और साँप को मन्त्र से भेदा जा सकता है, लेकिन दुष्ट को किसी भी तरह से नहीं भेदा जा सकता.
‘सर्प क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतर: खलःI
मन्त्रेण शाम्यते सर्पः न खलः शाम्यते कदाII’
अर्थात्, साँप क्रूर होता है, दुष्ट भी क्रूर होता है, पर दुष्ट साँप से अधिक क्रूर होता है ! साँप को मन्त्र से शांत किया जा सकता है लेकिन दुष्ट को किसी भी तरह से शांत नहीं किया जा सकता.
‘खलः सर्षपमात्राणि परछिद्राणि पश्यतिI
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन् अपि न पश्यतिII’
अर्थात्, दुष्ट दूसरों का सरसों बराबर दोष भी तुरत देख लेता है, लेकिन अपने बेल के फल बराबर दोष को देखकर भी नहीं देखता है.
तो हे विद्वज्जनो !
दुष्ट जनों की महिमा इस भाँति अनादि-अनंत-अगाध हुआ करती है कि शेषनाग उन्हें अपने सहस्त्र मुखों से नहीं बता सकते, गणेश उनका वर्णन नहीं कर सकते और वेदव्यास उन्हें लिपिबद्ध नहीं कर सकते. फिर भी किसी सीमा तक इस कार्यभार को मुझ अकिंचन ने संपन्न करने का तुच्छ प्रयास किया ताकि वर्तमान फासिस्ट तमस के घटाटोप में, दुष्टता के महासाम्राज्य में जीते हुए आप दुष्टों का अध्ययन कर सकें, उन्हें पहचान सकें, उनकी भयंकरता को समझें, उनसे सावधान रहें और अनुकूल अवसर आते ही उन्हें उनकी दुष्टता का यथोचित दंड दें.
इस प्रयोजन में संस्कृत के प्राचीन आचार्यों से तो इतनी ही सहायता मिल सकती थी. शेष कार्य आपको स्वयं संपन्न करना होगा.
*अथ मूर्खमहाख्यानम् :*
अब हम मूर्खों पर कुछ विचार करेंगे. ऐसा नहीं कि आज किसी मूर्खाधिराज ने हमसे मन की बातें की हों, या आज रात को आठ बजे या नौ बजे कोई उच्च-पदासीन, आत्मधर्माभिमानी, नार्सिसस-ग्रंथि पीड़ित, आत्ममुग्ध, प्रचण्ड मूढ़मति, अत्याचारी, गगनविहारी दुर्मानव टी.वी. के परदे पर अवतरित होकर सहसा कोई सन्देश देकर पूरे राष्ट्र को विपत्ति में डालने वाला हो (सो तो वह पहले ही डाल चुका है )I
बात यह है कि हम जितना दुष्टता के ऐतिहासिक युग में जी रहे हैं, उतना ही मूर्खता के ऐतिहासिक युग में भी जी रहे हैं ! जो हमारे भाग्य-नियंता हैं, जन-गण-मन-अधिनायक हैं, वे या तो दुष्ट मूर्ख हैं, या मूर्ख दुष्ट हैं.
अतः दुष्टता के महाख्यान के बाद यदि मूर्खता का महाख्यान न प्रस्तुत किया जाए तो एक असंतुलन हो जायेगा, देव-गन्धर्व-यक्ष आदि कुपित हो जायेंगे और विमर्श-यज्ञ में विघ्न पड़ जाएगा.
दूसरी बात यह है कि दुर्योगवश, आज मुझे कुछ मूर्खों ने अप्रत्याशित कष्ट दिया, अतः मैं मूर्खों से कुपित हूँ, क्रुद्ध और क्षुब्ध हूँ.
आप कहेंगे कि मूर्ख के मूर्ख होने में मूर्ख का भला क्या दोष ? जी, यह तो सर्वथा उचित बात है. मूर्ख यदि अपनी राह जाए, आपके किसी कार्य में व्यवधान न डाले, किसी गहन-गंभीर विचार-विमर्श में हाहाकारी ढंग से फेंटा कसकर कूद न पड़े, किसी विषय पर बिन मांगे राय-सुझाव न देने लगे, किसी बात को न समझते हुए समझने के भ्रम में जीकर, या समझने का दिखावा करके आपको क्लेश न दे, साहित्य-कला से लेकर क्वांटम भौतिकी और कामशास्त्र से लेकर सौन्दर्यशास्त्र तक, वेद-वेदांग से लेकर पर्यावरण विज्ञान तक पर अपनी मौलिक प्रस्थापनाएं देकर आपको आत्महत्या या हत्या के लिए न उकसाए; तो किसी मूर्ख से किसी को भला क्या परेशानी हो सकती है?
लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे सुअवसर विरल ही आते हैं कि मूर्ख ऐसा न करें. समस्या यह है कि शायद ही कोई मूर्ख ऐसा मिले जो इस बात को समझता हो कि वह मूर्ख है.
अतः मूर्ख हर विषय में हस्तक्षेप करना, हर मामले में टांग अड़ाना, हर चर्चा-प्रवाह में पोंछिटा कसकर कूदना अपना परम धर्म — परम कर्तव्य और परम अधिकार– दोनों समझता है.
दूसरी बात, मूर्ख को साक्षात् आचार्य वृहस्पति और आचार्य शुक्राचार्य भी मिलकर यह नहीं समझा सकते कि वह गलत है, या उसके जो गुरु या आराध्य हैं, वे गलत हैं. आदर्श मूर्ख स्वयं को सदा-सर्वदा सही तो मानता ही है, अपने गुरु, आराध्य या नेता को वह शाश्वत सही और निर्भूल मानता है. वह मानता है कि वह (यानी उसका गुरु या नेता) है तो कुछ भी मुमकिन हैI
मूर्ख प्रायः धर्मप्राण होता है I वह प्रायः अपने गुरु, आराध्य या नेता से सुनकर ऐसे प्राचीन धर्म-ग्रंथों के हवाले देता रहता है, जिनकी शक्ल तक उसने नहीं देखी होती है I उसके विचार से, जीवन में जो कुछ भी नए संधान और आविष्कार होते हैं, वे हमेशा अतीत में हो चुके होते हैं.
उसके लिए दुनिया में नया कुछ भी नहीं होताI मात्र खोये हुए अतीत की पुनर्प्राप्ति को ही वह अपने जीवन का परम लक्ष्य मानता हैI वह भविष्य को अतीत का पुनरागमन मानता हैI मूर्ख की एक और विशिष्टता यह होती है कि वह अपनी संस्कृति और अपने राष्ट्र को विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानता हैI मूर्ख जब भक्त बन जाता है (और प्रायः बन ही जाता है) तो उस राक्षस सेवक के समान होता है जिसे हमेशा कोई काम चाहिए होता था और उसके स्वामी ने उसे चढ़ने-उतरने के लिए एक खम्भा दे दिया था.
मूर्ख जब भक्त हो जाता है तो उसे हमेशा घृणा करने के लिए एक काल्पनिक शत्रु की आवश्यकता होती है और मूर्ख का नेता उसे समझा देता है कि अमुक देश, अमुक धर्म के लोग या अमुक नस्ल या क्षेत्र के लोग जो तुमसे अलग हैं, ‘अन्य’ हैं, वे तुम्हारे शत्रु हैं.
इस तरह भक्त जीवन-पर्यंत एक काल्पनिक शत्रु से घृणा करता हुआ जीता है. यह घृणा उसकी खुराक होती है. यह घृणा दासता और पिछड़ेपन के अतीत और वर्त्तमान से उपजी उसकी हीनता-ग्रंथि होती है, जो प्रायः अहम्मन्यतापूर्ण श्रेष्ठता-ग्रंथि के भ्रामक बोध के रूप में अभिव्यक्त होती है. अगर दुर्लभ आपवादिक संयोगवश, आपने किसी मूर्ख को अपनी कुछ बातों का कायल कर दिया, तो आपके साथ एक भयंकर दुर्घटना घट जायेगी.
होगा यह कि वह मूर्ख फिर आपका भक्त बन जाएगाI किसी भी तर्कशील और लोकतांत्रिक प्रकृति के व्यक्ति को यदि कोई भक्त मिल जाए तो चार परिणाम सामने आ सकते हैं : या तो वह व्यक्ति तर्कशील रह ही नहीं जाएगा और कालान्तर में स्वयं चाटुकारों और भक्तों से घिरा हुआ एक गधा बन जाएगा, या वह आत्महत्या कर लेगा या भागकर कहीं अज्ञातवास में चला जाएगा, या उस अपने भक्त का ही गला घोंट देगा.
एक ज़माना था जब ऐसे भी मूर्ख हुआ करते थे जो अपने काम से काम रखते थे और अपने निकटवर्तियों और परिवारी जनों के अतिरिक्त किसी को कष्ट नहीं पहुंचाते थे. पर अब ऐसा नहीं है. मूर्ख प्रदूषण की तरह दिग-दिगंत में फ़ैल गए हैं.
राजनीति, समाज और संस्कृति को चलाने वाले लोग ज़रायमपेशा अपराधी, हत्यारे और लम्पट हैं, जिनका प्रयोजन मूर्खों की विशाल अक्षौहिणी सेना तैयार किये बिना सिद्ध ही नहीं हो सकता.
इसलिए उन सत्ताधारियों ने बड़े पैमाने पर मूर्खों को भक्त बना लिया हैI इतने बड़े स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक कार्यों में मूर्ख कभी नहीं लगाए गए थे. आज की दुनिया में पूँजी की सत्ता को कुछ आततायी नर-पशु शासकों और कुछ क्षुद्र किस्म के खरीदे गए मान-सम्मानहीन, आत्मा से रिक्त बुद्धिजीवियों के अतिरिक्त मूर्ख भक्तों की विशाल अक्षौहिणी वाहिनियाँ चाहिए. इस तरह इतिहास में पहली बार, लाखों-लाख मूर्खों को सामाजिक-राजनीतिक दायरे में ऐसे काम दे दिए गए हैं जिनमें वे अहर्निश व्यस्त रहते हैं और इसे देश-सेवा समझकर गौरवान्वित होते रहते हैं ! कुछ सौ समझदारों के निर्देशन में लाखों मूर्ख सड़कों-पार्कों से लेकर सोशल मीडिया, आई.टी. सेल, व्हाट्सअप आदि पर निरंतर घृणा के अतिरिक्त मूर्खता का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं. मूर्खता का ऐसा मानव-द्रोही चरित्र इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया था.
आज मूर्ख जितने विकट संकट हैं, उतना पहले कभी नहीं थे, पर फिर भी मूर्खों से दुखी संस्कृत के प्राचीन आचार्यों ने मूर्खों के बारे में पीड़ा और क्लेश के साथ काफी कुछ लिखा है. इनमें भर्तृहरि सबसे ऊपर आते हैं. अपनी कृति ‘नीति-शतकम्’ में उन्होंने मूर्खों को लेकर कई श्लोक लिखे हैं. उनपर दृष्टि डालना पर्याप्त रोचक होगा.
‘अज्ञः सुखमाराध्यः
सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञःI
ज्ञानलवदुर्विदग्धं
ब्रह्मापि नरं न रंजयतिII’
अर्थात्, हिताहितज्ञानशून्य नासमझ को समझाना बहुत आसान है, उचित और अनुचित को जानने वाले ज्ञानवान को राजी करना और भी आसान है; किन्तु थोड़े से ज्ञान से अपने को पंडित समझने वाले को स्वयं विधाता भी संतुष्ट नहीं कर सकताI
‘प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरद्ष्ट्रांंतरात्
समुद्रमपि संतरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् I
भुजंगमपि कोपितंशिरसि पुष्पवद्धारयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् II’
अर्थात्, अगर मनुष्य चाहे तो मगरमच्छ की दाढ़ से मणि निकालकर ला सकता है, चंचल लहरों से आलोड़ित समुद्र को अपनी भुजाओं से तैरकर पार कर सकता है, क्रोधित सर्प को पुष्पहार की तरह अपने सिर पर धारण करने का साहस कर सकता है, लेकिन हठ पर अड़े मूर्ख के चित्त को गलत से सही रास्ते पर कदापि नहीं ला सकता I
‘लभेत् सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितःI
कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् II’
अर्थात्, कदाचित् कोई किसी विधि से बालू में से भी तेल निकाल ले, कदाचित् कोई प्यासा मृग-मरीचिका के जल से भी अपनी प्यास बुझा ले, कदाचित् कोई घूमते-घूमते खरगोश के सींग भी खोज ले, लेकिन हठ पर अड़े मूर्ख के चित्त को गलत से सही रास्ते पर कदापि नहीं ला सकताI
‘व्यालं-बाल-मृणाल-तंतुभिरसौरोद्धं समुज्ज्रिम्भते,
भेत्तुं वज्रमपि शिरीषकुसुम -प्रान्तेन सन्नह्यतेI
माधुर्यं मधुबिन्दुना रचयितुं क्षाराम्बुधेरीहते,
ने तुं वांछति यः खलान्पथि सतां सुक्तै:सुधासंदिभिःII’
अर्थात्, जो मनुष्य अपने अमृतमय उपदेशों से दुष्ट मूर्ख को सही रास्ते पर लाना चाहता है, वह मानो कोमल मृणाल के डोरों से मदमत्त हाथी को बांधना चाहता है, शिरीष के फूलों की नोक से हीरे को छेदना चाहता है, या शहद की एक बूँद से खारे महासागर को मीठा करना चाहता हैI
‘स्वायत्तमेकांतगुनं विधात्रा
विनिर्मितं छादनमज्ञताया:I
विशेषतं सर्वविदां समाजे
विभूषणं मौनमपण्डितानाम् II’
अर्थात्, मूर्खों को अपनी मूर्खता छिपाने के लिए विधाता ने मौन धारण करने का अच्छा उपाय सुझा दिया है I मौन मूर्खता का ढक्कन है I इतना ही नहीं, विद्वानों की मंडली में वह मूर्खों का आभूषण भी हैI
कहा गया है,’हरि अनंत हरि कथा अनंता. मूर्खों की कथा भी अनंत है. पर आपके धैर्य की परीक्षा न लेते हुए मूर्ख-महाख्यान को फिलहाल हम यहीं विराम देते हैं.

