शशिकांत गुप्ते
किसान महापंचायत सम्पन्न हुई। महापंचायत में धार्मिक सदभावना प्रत्यक्ष देखने को मिली।धार्मिक सदभावना तो अपने देश की माटी में प्रकृतिक रूप से रची बसी है।
सम्पूर्ण विश्व में किसी भी देश में प्राकृतिक रूप से पवित्र नदियों का संगम नहीं है।यह संगम सिर्फ अपने देश भारत में ही है।इसलिए कहा जाता है,अपने देश में गंगा जमुनी तहज़ीब विद्यमान है।जहां सदभावना होगी वहाँ सांप्रदायिकता हो ही नहीं सकती।जहाँ सांप्रदायिकता होगी,वहाँ सदभावनाओ की अपेक्षा रखना ही व्यर्थ है।
जहाँ सदभावना होती है,वहाँ मानवता प्राकृतिक रूप से दिखाई देती है।
उक्त गम्भीर विषय पर लेखक के मानस में विचार,विमर्श चल ही रहा था,उसी समय बाहर श्वानों की समूह के साथ भौंकने की आवाज सुनाई दी।साथ हो मानवों का कोलाहल भी सुनाई दिया।
घर के बाहर निकल कर देखा कॉलोनी के मानव, भिन्न समूह में वार्ता करतें हुए दिखाई दिए।एक व्यक्ति से पूछा तो उसने कहा नगर निगम कर्मी आवारा कुत्तों को पकड़ ने आएं हैं।उस व्यक्ति ने कुत्तों को आवारा कहा यह बात लेखक को अच्छी नहीं लगी।सड़क पर घूमने फिरने वालें कुत्तों को सड़क छाप कहना भी गलत है।इसके लिए आंग्ल भाषा में योग्य शब्द Street Dog.
जो भी हो लेखक के मानस पटल पर एक अहम मुद्दा प्रकट हुआ?इस मुद्दे पर विचार करने पर यह निष्कर्ष निकाला कि,नगर निगम कर्मियों की प्रशंसा करनी चाहिए।नगर निगम कर्मी श्वानों में भी आवारा श्वानों को पहचान लेतें हैं?
जबतक निगम कर्मी कॉलोनी में मौजूद थे,कुत्तों को ढूंढ रहे थे।तबतक मानवों के समूहों में कुत्तों को लेकर पंचायत चल रही थी।
उसी समय निगम कर्मियों ने एक कुत्ते को पकड़ा,कुत्ता तो अपनी आवाज में भौंक ही रहा था,किंतु कॉलोनी में रहने वाली एक संभ्रांत स्त्री निगम कर्मियों को चीखते हुए डांट रही थी।कहने लगी यह हमारा पालतू है।
नगर निगम कर्मियों ने कहा कि, हमारे पास शिकायत आई है।इस कॉलोनी के कुत्तों ने कुछ मानवों का काटा है।उसी समय वह व्यक्ति प्रकट हुआ जिसे कुत्ते ने काटा था।वह स्त्री बोली जरूर इस व्यक्ति ने इसे छेड़ा होगा?अन्यथा यह काटता नहीं।निगम कर्मी ने कहा कि यदि यह आपका अपना पालतू है, तो इसे बांध कर रखिए।वह स्त्री कहने लगी हम लोग पशु प्रेमी हैं।हम लोग कुत्ते को कैद में नहीं रख सकतें हैं।
स्त्री और निगम कर्मियों की अंतहीन बहस को छोड़ कर लेखक कॉलोनी में खड़े एक समूह के पास गया,यह वयोवृद्ध लोगों को समूह है।इस समूह में अधिकतर सेवानिवृत्त लोग हैं।इस समूह में एक सच्चन व्यंग्यकार भी हैं।वे कह रहे थे कि,जो भी हो रहा है, मुझे तो व्यंग्य लिखने के लिए मुद्दा मिल गया।
कौतूहलवश लेखक ने पूछा कौनसा मुद्दा है।व्यंग्यकार ने कहा दर्शन शास्त्र के आधार पर पाप और पुण्य का मुद्दा?
जो लोग सुबह शाम घूमने जातें हैं।एक व्यक्ति जो थ्रू आउट इंग्लिश मीडियम में पढ़े हैं,उन्हें सुबह, शाम घूमने वाली बात समझमें नहीं आई।व्यंग्यकार ने उन्हें सरल भाषा में समझाया,जो लोग Morning walk and Evening walk पर जातें हैं।
यह लोग सुबह, शाम पुण्य का काम करतें हैं।सड़क पर घूमने वाले श्वानों को बिस्कुट, ब्रेड,खिलाते हैं।दूध पिलाते हैं।यही कुत्ते रात-बे-रात आने जाने वाले लोगों पर भोंकते हैं उन्हें लबूरते है,और कांटते भी है।जिन लोगों पर यह श्वान अपना क्रोध प्रकट करतें हैं, वे निश्चित ही ने पापी लोग होंगे?
कॉलोनी के लोगों की उक्त पंचायत को छोड़ लेखक ने अपने मस्तिष्क को झकझोर कर स्वयं को सामान्य स्थिति में लाया।लेखक को स्वयं पर बहुत अफसोस हुआ।एक बहुत गम्भीर राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है, किसान महापंचायत।महापंचायत में आपसी सौहाद्रपूर्ण वातावरण को देख सुनकर कोई भी व्यक्ति भावविभोर हो जाएगा।इस गम्भीर मुद्दे को छोड़ लेखक कहाँ आवारा कुत्तों के मुद्दे पर भटक गया?इस घटना से लेखक को यह सीख मिली कि, कभी भी मुद्दे से भटकना नहीं चाहिए।मुद्दे से भटकाना भी फितरती लोगों की एक साजिश है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

