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विदुरनीति (महाभारत, उद्योग पर्व) से चयनित पंचपुष्प 

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पुष्पा गुप्ता

अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहु: सत्यं वदेत्‌ व्याहृतं तद्‌ द्वितीयम्‌।
प्रियं वदेद्‌ व्याहृतं तत्‌ तृतीयं धर्मं वदेद्‌ व्याहृतं तच्चतुर्थम्‌॥

जो भी मन में आये) बोलने से मौन रहना बेहतर है. मौन रहने से सत्य बोलना बेहतर है.
सत्य बोलने से ऐसा सत्य बोलना बेहतर है जो प्रिय भी हो. प्रिय सत्य बोलने से ऐसा प्रिय सत्य बोलना बेहतर है जो न्यायसंगत भी हो.
इस तरह उतरोत्तर क्रम से चार श्रेणियाँ हैं– न्यायसंगत और प्रिय सत्य—सर्वोच्च. प्रिय सत्य—द्वितीय. सत्य—त्रितीय, मौन—चतुर्थ. ऐसा बोलने से जो सत्य तक न हो, मनुष्य का मौन रहना ही बेहतर है.

अकस्मादेव कुप्यन्ति प्रसीदन्त्यनिमित्तत:।
शीलमेतदसाधूनामभ्रं पारिप्लवं यथा॥

दुष्ट लोगों का स्वभाव बादल की तरह चंचल होता है. वे सहसा क्रुद्ध हो जाते हैं, और अकारण ही प्रसन्न भी हो जाते हैं.

पुनर्नरो म्रियते जायते च पुनर्नरो हीयते वर्धते च।
पुनर्नरो याचति याच्यते च पुनर्नर: शोचति शोच्यते च॥

मनुष्य बार-बार मरता और बार-बार जन्म लेता है. बार-बार हानि उठाता है और बार-बार प्रगति करता है. बार-बार दूसरों से याचना करने की स्थिति में होता है और बार-बार ऐसी स्थिति में होता है कि दूसरे उससे याचना करें.
बार-बार दूसरों के लिए शोक करता है और बार-बार दूसरे उसके लिए शोक करते हैं. यही मनुष्य-मात्र की नियति है– इसमें असामान्य कुछ नहीं. बस समय-समय की बात है.

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च।
धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र ! ईंधन की लकड़ियाँ अलग-अलग जलाने पर बस धुआँ देती हैं.
वही एक साथ जलाने पर ज्वाला की शक्ति उत्पन्न करती हैं.
इसी प्रकार बन्धुगण फूट होनेपर दु:ख उठाते हैं और एक साथ होने पर शक्तिशाली बनकर सुखी रहते हैं.

न तथेच्छन्ति कल्याणान्‌ परेषां वेदितुं गुणान्‌।
यथैषां ज्ञातुमिच्छन्ति नैर्गुण्यं पापचेतस:॥

जिनका मन पापों में लिप्त होता है वे दूसरों के सद्गुणों को देखना ही नहीं चाहते, ठीक वैसे ही जैसे उनके दुर्गुणों को देखने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं.
(चेतना विकास मिशन)

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