रक्षाबंधन परसाई की पुण्यतिथि पर
सुसंस्कृति परिहार
आज के दौर में जब प्रजातंत्र कठघरे में है संविधान खतरे में है। अवाम दहशत में है।संसद से लेकर सड़कें तक ख़ामोश हैं। लेखकों कवियों और पत्रकारों में से बहुसंख्यक को सांप सूंघ गया है।तब मशहूर व्यंग्यशिल्पी हरिशंकर परसाई बहुत याद आ रहे हैं। रक्षाबंधन के रोज़ ही वे चिरनिंद्रा में सो गए थे।बहिन राखी की तैयारी करते बिलख रही थी।जिसके पति की अकाल मृत्युपरांत वे इस निष्ठुर समाज से हटकर भाई हरिशंकर के घर अपने बच्चों सहित आ गई थीं।

उन्होंने अपने जीवन में भी इस बीच बहुत कुछ भोगा था अब बहिन और उसकी स्थिति को संभालने में जिन कठिनाइयों को देखा,समझा उसे बिना लाग-लपेट के लिखा।इस रिश्ते को उन्होंने जिस शिद्दत से निभाया। अपना तमाम जीवन अर्पण किया वह दुर्लभ है। रक्षाबंधन के रोज उनका अवसान ही उसे ,इस पावन रिश्ते से मुक्त कराया पाया।आज की बदलती दुनिया में उन्होंने भाई बहिन के रिश्ते को एक नई रोशनी दी।
अपने गर्दिशके दिनों रचना में परसाई इस बात का खुलासा करते हुए कहते हैं कि बाल्यकाल में जिस व्यक्ति ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वह थीं उनकी बुआ। परसाई जी ने उनसे ही अपनी ज़िंदगी के कुछ मूल-मंत्र सीखे थे: जैसे, निस्संकोच किसी से भी उधार मांग लेना या बेफिक्र रहना। बड़े-से-बड़े संकट में भी वो यही कहते कोई घबराने की बात नहीं, सब हो जाएगा।
संघर्षों से भरे अपने जीवन में परसाई ने स्वयं को सदैव मजबूत बनाए रखा:‘मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत. डरे कि मरे. सीने को ऊपर कड़ा कर लो, भीतर तुम जो भी हो। ज़िम्मेदारी को गैर ज़िम्मेदारी के साथ निभाओ।’
परसाई के व्यक्तित्व में धार्मिक रूढ़िवादिता, जातीयता, धार्मिक कट्टरता इन सबके विरुद्ध जो एक खास किस्म का विरोधी तेवर दिखलाई पड़ता है उसका बहुत कुछ श्रेय वह अपनी बुआ को देते हैं।
उनसे ही उन्होंने सीखा कि जातीयता और धर्म बेकार के ढकोसले हैं। स्वयं उनकी बुआ ने पचास साल की अवस्था में तमाम विरोधों के बावजूद एक अनाथ मुस्लिम लड़के को अपने यहां शरण दे रखी थी।
परसाई का लेखन व्यंग्य को एक साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विसंगतियों पर आधारित उनके लेखन ने व्यंग्य साहित्य की दिशा और मानकों को नया स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने साहित्यिक व्यंग्य को इसकी पारंपरिक सीमाओं से निकालकर गंभीर सामाजिक मुद्दों से जोड़ा। समाज में व्याप्त पाखंड, भ्रष्टाचार और बेईमानी जैसे मुद्दों पर परसाई के व्यंग्य लेख साहित्य को एक प्रखर सामाजिक माध्यम के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न नहीं करते, बल्कि विसंगतियों के विरुद्ध चेतना जागृत करते हैं। उनकी विविध रचनाएँ बदलाव की भावना को जन्म देती हैं और आदर्श मूल्यों की स्थापना का प्रस्ताव करती हैं।
बतौर कमला प्रसाद वे लेखक और नागरिक, हरिशंकर परसाई भारतीय समाज के सजग प्रहरी थे—ऐसे प्रहरी, जो लगातार जागते रहे और समाज को जगाते रहे। उनकी रचनाओं का मूल आधार समाज-संलग्न संवेदनशीलता और व्यथा है।
हरिशंकर परसाई का लेखन साहित्यिक मंडलियों के लिए नहीं था, बल्कि आम पाठक वर्ग से संबोधित होता था। उन्होंने केवल साहित्यिक चर्चाओं तक अपने लेखन को सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज की गहराइयों में जाकर ग़रीबी, असमानता और विसंगतियों को उजागर किया। वह समाज में व्याप्त भ्रम और अंधविश्वास को तोड़ने के लिए अपने लेखन में साहसिक प्रहार करते रहे। उनकी संवेदनशीलता सामाजिक चिंतन की पृष्ठभूमि पर टिकी थी। परसाई का व्यक्तित्व एक गंभीर विचारक का रहा था। सामाजिक संदर्भों के ज्ञान और सहज भाषा शैली ने उनके निबंधों को अद्वितीय बना दिया। उनकी भाषा और विषयवस्तु में अद्भुत सामंजस्य है, जो उनकी रचनाओं को प्रभावशाली बनाता है।
परसाई एक सफल व्यंग्यकार हुए, उसके पीछे एक सबसे बड़ी वजह संभवतः यह भी है कि वह स्वयं पर भी व्यंग्य करने या अपनी खुद की आलोचना करने से नहीं डरते थे.
अपनी जीवनी में उन्होंने बीसियों बार स्वयं के ऊपर एक तटस्थ आलोचक की तरह आत्मलोचन किया है. उनकी मर्मभेदी लेखनी ने अपनी कमियों को भी बारंबार उभारा है. मिसाल के तौर पर, परसाई अपने बेटिकट यात्रा करने के संदर्भ में कहते हैं:
‘एक विद्या मुझे और आ गई थी- बिना टिकट सफर करना। जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते। पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकट बेखटके गाड़ी में बैठ जाता। तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता. अंग्रेजी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देती और वे कहते-लेट्स हेल्प दि पुअर बॉय.’
परसाई ने अपने आप पर जिस तरह प्रहार किए ऐसा कोई दूसरा लेखक नहीं।उनकी याद आज इसलिए भी बड़ी ज़रूरी है कि उनके पास जो संघर्ष का जज़्बा था वो आज देश के लिए ज़रुरी है।निडर रहकर उन्होंने जिस तरह आज़ादी के बाद के हालात पर बेझिझक लिखा वह उन्हें प्रजातंत्र और देश के कुशल नेतृत्वकर्ता के रुप में भी स्मरण किया जाए तो बेहतर होगा ।वह प्रेरक और अनुकरणीय है।