~ डॉ. विकास मानव
_’आसक्ति’ हमें कर्म से बांधती है और ‘अनासक्ति’ हमें मुक्त करती है कर्म-बन्धन से। कर्म से आसक्ति रखने वाला अज्ञानी है और न रखने वाला ज्ञानी है। कर्म दोनों करते हैं। एक का ‘कर्म’ बन्धन का कारण बन जाता है और दूसरे का बन जाता है कारण मुक्ति का।_
इस विषय में गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–कर्म में आसक्त अज्ञानी व्यक्ति जैसा कर्म करता है, ठीक उसी प्रकार अनासक्त ज्ञानी व्यक्ति भी कर्म करे (गीता )। कर्म में जो आसक्त है, वह तो कर्म करता ही है लेकिन करता है वह आसक्ति के कारण।
अनासक्त होकर कर्म करने की बात को समझना अत्यंत कठिन है। कर्म के प्रति आसक्ति न हो तो लोग श्रम क्यों करेंगे ? कर्मफल की आशा है–वही आशा तो श्रम करवाती है। उसी से प्रेरित होकर लोग धन के लिए, मकान के लिए पागलों की तरह श्रम करते हैं। इससे उनके अहंकार की तृप्ति होती है, क्योंकि आसक्ति भीतर ही है।
यदि लोग अनासक्त हो जाएं तो फिर कैसे लोग भाग-दौड़ करेंगे, कैसे श्रम करेंगे ? आज के युग में अहंकार रहित होकर, अनासक्त भाव से कर्म करने वाला व्यक्ति दीपक लेकर खोजने पर भी नहीं मिलेगा संसार में।
गीता में दो बातें कहीं गई हैं–पहली यह कि अनासक्त व्यक्ति को ठीक उसी प्रकार कर्म करना चाहिए जैसा कि आसक्त व्यक्ति कर्म करता है। कर्म में अंतर नहीं करना चाहिए, अंतर आसक्ति और अनासक्ति के भाव का होना चाहिए।
*इससे क्या लाभ है ?*
इससे यह लाभ होगा कि हमारा जीवन एक अभिनय हो जाएगा और हम हो जाएंगे एक अभिनेता। एक कुशल अभिनेता भी तो कर्म करने का अभिनय ही करता है। क्या वह कर्म में आसक्त रहता है ? नहीं, वह यही समझता है कि यह कर्म जो मैं कर रहा हूँ–वह अभिनय मात्र है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। राम भी अपने जीवन में कर्म के प्रति अनासक्त थे और कृष्ण तो थे ही।
दोनों ही अपने-अपने समय के महान अभिनेता थे लेकिन एक के अभिनय को हम ‘चरित्र’ कहते हैं और दूसरे के अभिनय को कहते हैं ‘लीला’।
भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों के जीवन से हमें कर्म के विषय में शिक्षा लेनी चाहिए। राम जीवन के प्रति गम्भीर थे। प्रत्येक कर्म को भलीभांति समझकर करते थे वे। जबकि श्रीकृष्ण जीवन को एक अभिनय के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझते थे।
चरित्र को बड़ा गम्भीर और तटस्थ रखना पड़ता है। चरित्र में जो कुछ किया जाता है, उससे संयुक्त होना पड़ता है जबकि लीला में जो कुछ किया जाता है उससे होना पड़ता वियुक्त और अनासक्त।
भारतीय मनीषा का कहना है कि अज्ञानी लोग मोहग्रस्त होकर जैसे कर्म में डूबे हुए दिखलाई पड़ते हैं, वैसे ही ज्ञानी भी कर्म में डूबे हुए दिखलाई पड़ते हैं, लेकिन ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में आंतरिक भेद होता है। ज्ञानी डूबने में अंतर नहीं करता है। वह वैसे ही डूबता है जैसे अज्ञानी डूबता है। वह तो अंतर करता है भीतर और अंतर करता है कर्ताभाव में।
वह अपने भीतर सत्य को रूपांतरित किया हुआ होता है। बाहर से अज्ञानी और ज्ञानी के कर्म एक जैसे ही दिखते हैं। इसलिए यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि कौन ज्ञानी है और कौन अज्ञानी और यही कारण है कि इस संसार में प्रारंभ से ही ज्ञानीजनों की स्थिति बड़ी नाजुक रही है ठीक वैसे ही जैसे पागलखाने में उस व्यक्ति की होती है जो पागल नहीं है और पागलों के बीच रहता है।
ज्ञानी की स्थिति इसी प्रकार अज्ञानियों के बीच सदा नाजुक रही है।
*निष्कर्म क्या है ?*
सर्वस्व त्यागकर पलायन कर जाने से परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता। मात्र कर्म का न होना निष्कर्म नहीं है। निष्कर्म बहुत बड़ी घटना है, बहुत बड़ी उपलब्धि है। बहुत-से लोग निष्क्रियता को ही निष्कर्म समझ लेते हैं।
यदि निष्क्रियता ही निष्कर्म होती तो अकर्मण्य और आलसी भी निष्कर्म को उपलब्ध हो गए होते। वास्तव में कर्ताभाव रहित जो कर्म है, वह निष्कर्म है। निष्कर्म–कर्म का अभाव नहीं है। निष्कर्म वह है जिसके भीतर ‘मैं’ का अभाव है। निष्कर्म में ‘कर्म’ का अभाव नहीं है, ‘कर्ताभाव’ का अभाव है।
निष्कर्म या निष्काम कर्म से तीन महत्वपूर्ण लाभ हैं। पहला लाभ है–आवागमन से मुक्ति। दूसरा लाभ है–द्वंद्व से मुक्ति या द्वंद्वरहित जीवन और तीसरा लाभ है–पिछले जीवनों में किये गए समस्त कर्मों का क्षय जिसका परिणाम है–मुक्तिमार्ग का दरवाजा खुल जाना।
निष्काम कर्म का अर्थ है–इस प्रकार से कर्म करना कि भविष्य में करने के लिए कोई कर्म शेष न रह जाये और हम निम्न लोकों की भ्रांतियों और सीमाओं में न बंधें। जैसे शास्त्र कहते हैं कि अमुक कर्म से अमुक लोक की प्राप्ति होती है।
यह हमको ज्ञात होना चाहिए कि मनुष्य की वासनाओं-कामनाएँ की पूर्ति केवल तीन निम्न स्तर के लोकों में ही हो सकती है–भूलोक, भावलोक या वसनालोक और सूक्ष्मलोक। इन्हीं तीनों लोकों में देहात्मा कार्य करती है अपनी कामना-वासना के अनुरूप। इन तीन लोकों के ऊपर कर्म शरीर नहीं है। इसलिए किसी भी प्रकार के कर्म करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
अतः निष्काम कर्म वह कर्म है जो ऐसी वासनाओं-कामनाओं से सम्बंधित नहीं है। स्पष्ट है कि जब हम कोई कर्म निम्न कामना से प्रेरित होकर करते हैं तो उस कर्म में बुराई केवल उसके उद्देश्य के कारण है। उस उद्देश्य से उत्पन्न प्रभाव ही तो भविष्य में हमारे बन्धन के कारण बनते हैं।
प्रत्येक कर्म के पीछे एक उद्देश्य और भावना अवश्य होनी चाहिए परंतु वह भावना आध्यात्मिक होनी चाहिए। उस भावना को उपलब्ध होने के लिए निम्नलिखित छः सूत्रों का त्याग कर देना चाहिए–
1- महत्वाकांक्षा का त्याग कर दें।
2- जीवन-तृष्णा का त्याग कर दें।
3- सुख प्राप्ति की कामना का त्याग कर दें।
4- पृथकता की समस्त भावना का त्याग कर दें।
5-संवेदनशीलता की इच्छा को समाप्त कर दें और
6- उन्नति की अभिलाषा को समाप्त कर दें।
निम्नलिखित छः सूत्रों को स्वीकार करना चाहिए–
1- जो हमारे-आपके भीतर है, उसी की इच्छा करें।
2-जो केवल हमसे-आपसे परे है, उसी की इच्छा करें।
3- जो अप्राप्य है, उसी की इच्छा करें।
4- शक्ति प्राप्ति की उत्कट इच्छा करें।
5- शांति प्राप्ति की तीव्र इच्छा करें और
6- सर्वोपरि आत्मिक संपत्तियों की इच्छा करें।
इच्छाओं के दो समूह हैं। इच्छा का पहला समूह है–देहात्मा की निम्न ‘स्व’ की इच्छाएं। इच्छाओं का दूसरा समूह–देहात्मा की उच्च ‘स्व’ की इच्छाएं। अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए केवल निम्न इच्छाओं को अपने भीतर से निकाल देना आवश्यक है। वह शक्ति और सम्पन्नता तक की इच्छा कर सकता है परंतु वह उच्च ‘स्व’ से सम्बंधित होनी चाहिए।
*एक महत्वपूर्ण प्रश्न :*
सामान्यतया हमारे कार्यों के पीछे जो निम्न स्तर की व्यक्तिगत कामनाएं होती हैं, उनके स्थान पर कौन-सी भावना आनी चाहिए जिससे भविष्य में अवांछनीय कर्म उत्पन्न करने की शक्ति ही समाप्त हो जाये ?
*उत्तर :*
भक्ति-मार्ग पर चलने वालों के लिए सभी कर्म ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। दूसरे शब्दों में– समस्त कर्म ईश्वर की सेवा के लिए उसे समर्पित करने के उद्देश्य से ही करना चाहिए। इस भावना से निम्न स्तर के कार्य करने की क्षमता समाप्त हो जाएगी।
इसका एक शक्तिशाली प्रभाव यह भी होता है कि भक्त को भगवान से मिलन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में सहायता मिलती है।
अपने सारे कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित करने के प्रभाव पर जरा विचार करें। यदि हम-आप भगवान को एक पुष्प भी अर्पित करते हैं या उसकी वंदना करते हैं तो सचमुच हमारा-आपका हृदय एक अव्यक्त भावना से भर जाता है और हमारे-आपके भाव के अनुसार थोड़ी-बहुत भक्ति हृदय में उमड़ने लगती है।
परंतु दिनभर अपने समस्त कर्मों के समर्पण से आराधना की एक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित हो उठती है। इसके प्रत्युत्तर में भगवान की दया, कृपा, करुणा आदि प्राप्त होगी और वह हमारी-आपकी भक्ति में अत्यंत तीव्रता की वृद्धि कर देगी। एक सच्चे भक्त के लिए अपने भगवान के चरणों में अपने जीवन का आनंदपूर्वक समर्पण है।
यदि हमारे हृदय में अपने इष्ट के प्रति सच्ची भक्ति है तो यही एक नित्य पर्व है जो हमारे जीवन की समस्त निराशा, खिन्नता को समाप्त कर देती है।
यही प्रक्रिया यदि निरंतर जारी रहती है तो हम अंत में निष्काम कर्म करने में पूर्णतया प्रवीण हो जाएंगे। फिर हम देखेंगे कि हमारे अंदर एक सूक्ष्म परिवर्तन होना शुरू हो गया है।

