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किसानों का चक्काजाम शांति पूर्ण ,सलाम

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सुसंस्कृति परिहार

 पिछली 26जनवरी को चोट खाए आंदोलनरत किसानों ने 6फरवरी को आयोजित चक्काजाम को जिस शालीन और सौहार्द्र पूर्ण तरीके से अंजाम दिया उनके लिए देशवासियों का एक सलाम तो बनता ही है । जबकि दिल्ली में 50हज़ार जवानोंस की तैनाती से लग रहा था कि कहीं जाम के दौरान कहीं घुपैठिए गलत हरकत ना कर बैंठें । किसान चौकन्ना तो थे ही लेकिन यह भी घोषणा थी कि ग़लत करने वाले को दंडित भी किया जाएगा । किसानों ने दिखा दिया कि वे शांति के पुजारी हैं । उनमें अपार सहनशक्ति है लेकिन घर वापसी तभी होगी जब तक उनकी मांगों को पूरा नहीं किया जाएगा । 

             बैंगलुरू और दिल्ली के एक क्षेत्र में ज़रूर कुछ बातचीत हुई बताई जाती है जिसे पुलिस ने बिना हमलावर हुए निपटा लिया ।कुछ किसान गिरफ्तार हुए बाद में सब ठीक हो गया ।यह घटनाएं नासमझी से हुई थीं । बहरहाल, दिल्ली वासियों को तीन घंटे के इस बंद से कोई मलाल नहीं है और ना ही किसी शहर ,कस्बे में इससे कोई हैरानी परेशानी देखी गई । पंजाब, हरियाणा से जम्मू-कश्मीर तक तथा राजस्थान से महाराष्ट्र ,तैलंगाना और सुदूर दक्षिण में इस प्रतीकात्मक बंद को नागरिकों का भरपूर समर्थन मिला । राजस्थान, छत्तीसगढ़ और म०प्र० में इस जाम में कांग्रेस भी साथ रही लेकिन मध्यप्रदेश में ग्वालियर ,उज्जैन और इंदौर जैसे शहरों में  ही इसका असर दिखा ।यह गणतंत्र दिवस किसान परेड के बाद दूसरी बड़ी उपलब्धि है ।पहली तो गणतंत्र दिवस की शाम जब राकेश टिकैत की अश्रुधार ने इस आंदोलन को नई रवानी दी थी और उनके हौसलों को जाने माने कवि बल्ली सिंह चीमा ने कविता में उतारा था -कुछ पंक्तियां देखें –

—–     जनता  के  हौसलों  की  सड़कों  पे  धार  देख ,
सब  कुछ  बदल  रहा   है   चश्मा  उतार  देख ।
तेरी  पुलिस  या   बाउंसर   रोकेंगे   क्या   इन्हें ,

 होने  लगे  हैं  अब  ये  लाखों   के   पार  देख  । 

          सच्ची बात ये है यदि किसान परेड जिसकी तैयारी उन्होंने गणतंत्र दिवस की खुशहाली को व्यक्त की थी उन्हें छेड़ा ना जाता तो यूं ही शांत परेड का प्रदर्शन होता ।यदि थोड़ा और पीछे जाएं तो यदि इन्हें बार्डर पर ना रोका गया होता तो वे आंदोलन स्थली रामलीला मैदान में आज डटे होते और आंदोलन इतना विशाल रुप नहीं लेता । फिर भी अभी समय है इसे गंवाना उचित नहीं होगा । किसान निरंतर बार्डर पर शहीद हो रहे हैं जो ग़मनाक है। 

             संयुक्त किसान मोर्चा बार बार ऐलान कर रहा है वे खाली हाथ नहीं लौटेंगे ।अब तो किसान नेता राकेश टिकैत ने साफ़ शब्दों में कह दिया है कि यदि गांधी जयंती दो अक्टूबर तक उनकी मांगे नहीं मानी गई तो उन्हें नया कदम उठाने निर्णय लेना होगा ।आगे क्या निर्णय होगा कहा नहीं जा सकता ।इस बीच सरकार के रुख में क्या परिवर्तन होता है यह महत्वपूर्ण होगा । सरकार ने अब तक किसानों की ताकत को भली-भांति देख लिया है ।उस पर भारी देशी विदेशी जनदबाव भी है ।यह किसानों की अप्रत्यक्ष जीत तो है ही सरकार की हार भी है । किसानों ने जितना सहा है वह कम नहीं ।देखकर सुखद अनुभूति होती है जब आंदोलित किसान के बेटे फौजी पोशाक में अपने लोगों से मिलते नज़र आते हैं या 81वर्षीय मां टे्क्टर चलाती अपने बेटों के लिए सामान लेकर आती है ।यह दृश्य दिलों को रोमांचित कर देते हैं । आंदोलन शीध्र समाप्त होना चाहिए।

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