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ज़ेरे बहस का मुद्दा है “पेगासस स्पाईवेयर”

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सुसंस्कृति परिहार

इज़राइल के पेगासस स्पाईवेयर साफ्टवेयर की पहली सूचीमेंपहलेपत्रकारों,मानवाधिकारकार्यकर्ताओं,वकील आदि के जब नाम सामने आए तो  यह तय माना गया कि यह काम मोदी के प्रिय सखा इज़राइल के पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन की गाढ़ी मैत्री की बदौलत ही वहां की कंपनी ने ही अंजाम दिया है क्योंकि एलगार के सदस्य उनके कार्यकाल के दौरान ही जेल भेजे गए तथा तब से अब तक वे जेल में बंद न्याय की गुहार लगा रहे हैं।सबने इस काम के लिए भारत सरकार के आई टी मंत्री रविशंकर प्रसाद को कटघरे में खड़ा कर दिया ।इसे सरकार द्वारा जासूसी करने का मुद्दा बनाया ही था कि शाम की सूची ने इस कुहासा डाल दिया । इसमें राहुल गांधी, प्रशांत किशोर,लवासा के दो केन्द्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल और वर्तमान आई टी मंत्री वैष्णव जी भी हैं।बस खेल बिगड़ गया और संसद में वैष्णव जी की सफाई धुलाई शुरू हो गई । आश्चर्यजनक रूप से रविशंकर प्रसाद ने कड़े शब्दों में सरकार के पक्ष में डटकर बोला ।लोग तो मज़ाक में कह रहे हैं दाल में काला ज़रूर है वरना मंत्रीमंडल से बाहर किए गए  मंत्री जी इतनी फुर्ती से सरकार के पक्ष में खड़े नहीं होते ।चोर की दाढ़ी में तिनका कहावत चरितार्थ करते हुए उनका आना इस बात की ताकीद करता है ये मामला उनके कार्यकाल का ही है । जहां तक सवाल दूसरी सूची का है लगता है वह बुरे फंसे की आपात स्थिति में संतुलन बनाने का है।क्योंकि इससे अब कोई प्रभावित होने वाला नहीं जिन्हें जेल में डालना था वे तो है ही।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी करा कौन रहा था? जब इजरायल साफ कह रहा है कि वह किसी सरकार के अलावा अन्य किसी निजी कंपनी या पार्टी को अपना सॉफ्टवेयर उपलब्ध नहीं कराता।क्या भारत में दो सरकार चल रही हैं दिल्ली वाली नहीं तो क्या नागपुर की संघ सरकार इस जासूसी के लिए जिम्मेदार है? दिल्ली सरकार ने तो पल्ला झाड़ लिया लेकिन  विपक्ष की जांच की मांग को क्यों दबा रही है?अब नेतान्याहू तो नहीं है । कहीं राफेल जैसी जांच कीआंच इज़राइल से ना आ जाए।
एक घटना के ज़रिए इसे समझने की कोशिश करते हैं,  ज़माल खाशोगी अल अरब न्यूज चैनल के सम्पादक और वाशिंगटन पोस्ट में कॉलम लिखने वाले एक नामचीन पत्रकार थे। 2 अक्टूबर 2018 को इस्ताम्बुल के सऊदी अरब के काउंसलेट में उनकी हत्या कर दी गई। शक सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान पर गया क्योंकि जमाल राजकुमार और सुलतान दोनों के घोर विरोधी थे सऊदी अरब ने उन पर प्रतिबन्ध भी लगा  रखा था। 
जमाल की हत्या के बाद अमेरिका समेत दुनिया भर की एजेंसियां सक्रिय हुई लेकिन अफ़सोस जमाल की लाश आज तक नहीं मिली। लेकिन जो मिला वह चौंका देने वाला था। उनके मोबाइल में इजरायल की कंपनी एनएसओ ग्रुप द्वारा बनाया गया एक स्पाईवेयर ‘पेगासस’, pegasus इंस्टाल था। यह ऐसा स्पाईवेयर था जिसके बारे में जमाल को खुद भी नहीं पता था। 
पेगासस को इसराइल की साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ने तैयार किया है. बांग्लादेश समेत कई देशों ने पेगासस स्पाईवेयर ख़रीदा है. इसे लेकर पहले भी विवाद हुए हैं ।मेक्सिको से लेकर सऊदी अरब की सरकार तक पर इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए जा चुके हैं. व्हाट्सऐप के स्वामित्व वाली कंपनी फ़ेसबुक समेत कई दूसरी कंपनियों ने इस पर मुकदमे किए हैं.
अदभुत क्षमता वाला यह स्पाईवेयर सबसे पहले 2016 में  एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के आई फोन में मिला था। यह स्पाईवेयर न केवल आपकी कॉल पर निगाह रखता था बल्कि आपकी बातचीत, मोबाइल के वीडियोज, आपकी लोकेशन, आपके मोबाइल की सारी तस्वीरें बिना आपकी जानकारी के तीसरी पार्टी को उपलब्ध करा सकता था। यह स्पाइवेयर जिसके मोबाइल में डाला जाता सबसे पहले उसके माइक्रोफोन और वीडियो कैमरे को अपने घेरे में ले लेता। 
जासूसी हालांकि अपने तरीके से सरकारें करती हैं लेकिन जासूसी आतंकी गतिविधियों,पड़ौसी देश की युद्ध की तैयारी विषयक और ज्यादा हुआ तो राजनैतिक प्रतिद्वंदियों पर नज़र रखने के लिए । लेकिन जैसे जैसे नई टेक्नालाजी विकसित हो रही है इसके स्वरुप बदलते जा रहे हैं।कुछ समय पूर्व टूलकिट पर भी ऐसा ही बवाल मचा था फिर यह तो 2016का मामला है अब तो इससे भी सुपर पेगासस आ चुके होंगे  लेकिन यह ज़ेरे बहस का मुद्दा तो बनता ही है कि यह सरकार की जासूसी का मसला है या किसी निजी संस्थान का ।इसकी जांच ज़रुरी है ।एनएसओ ने पहले ख़ुद पर लगे सभी आरोपों को ख़ारिज किए हैं. ये कंपनी दावा करती रही है कि वो इस प्रोग्राम को केवल मान्यता प्राप्त सरकारी एजेंसियों को बेचती है और इसका उद्देश्य “आतंकवाद और अपराध के खिलाफ लड़ना” है. हालिया आरोपों को लेकर भी एनएसओ ने ऐसे ही दावे किए हैं तो भारत में ये सब कैैैसे,और क्यों हुुआ,कौन जिम्मेदार है उसकी खोज बेहद ज़रूरी है क्योंकि यह हमारे निजता कानून के ख़िलाफ़ है।
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