सुसंस्कृति परिहार
कहते हैं कि दुखदर्द के दिनों में सच्चे मित्र की पहचान होती है।इन दिनों कांग्रेस इसी दौर से सभी गुज़र रही है।एक ओर पहाड़ चढ़ती भाजपा नज़र आती है तो कांग्रेस से भरपूर लाभ लिए बेचेन लोग कांग्रेस की हार का पहाड़ा पढ़ते हुए सारा दोष राहुल गांधी के मत्थे मढ़ देते हैं।समझ नहीं आता विभिन्न पदों पर काबिज़ जी 23 की ये फौज उस दौरान क्या करती रही?क्या सभी मोर्चो पर एक अकेला ही लड़ेगा हालांकि कांग्रेस में ऐसा ही हुआ है नेहरू, इंदिरा,राजीव और अंत में सोनिया के नाम और उनकी दम पर ये कांग्रेसी मौज करते रहे हैं। संघर्ष के दिन आए तो स्वर बदल गए । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये बिना कुछ किए ज़िंदाबाद के नारे लगाते हुए ही बहुत कुछ पा चुके हैं इसलिए इनमें संघर्ष का माद्दा नहीं है।अब कायरों की तरह पलायन कर रहे हैं।
याद रखें,सोनिया,राहुल और प्रियंका की तिकड़ी ने इस बीच अपने चंद कांग्रेस के साथियों के साथ ऐसी पार्टी से डटकर मोर्चा लिया है जो झूठ और कथित हिंदुत्ववादी ताकतों के साथ बहुसंख्यक समाज को मंदिर मस्जिद के जाल में फांसकर सत्तारुढ़ हुई।इस सरकार की बेशर्म हरकतों के बीच भी एक देशभक्त परिवार अपनी जान हथेली पर लेकर कांग्रेस की आन बान बचाने संकल्पबद्ध है।उस पर परिवार वाद का आरोप सहजता से लगता है किन्तु सोचिए वे आखिरकार चुनाव के रास्ते ही राजनीति में बने हुए हैं। जबरिया राष्ट्रपति , राज्यपाल नहीं बने। ना ही राजतिलक हुआ है।सोनिया गांधी तो पूरी दुनिया में एक मिसाल हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकराया। राहुल को भी मनमोहन सिंह ने कई बार प्रधानमंत्री बनाना चाहा पर वे नहीं बने।कभी सोचा उनके इस त्याग के बारे में। नेहरू,इंदिरा, सोनिया के बारे में कितने झूठे , बेबुनियाद अनर्गल प्रलाप अब तक हो रहे हैं लेकिन वे भारत को आजाद कराने वाली कांग्रेस को पुनर्स्थापित करने सतत काम कर रहे हैं जबकि दूसरी ओर प्रधानमंत्री बनने की होड़ लगी हुई है।सूत ना कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा ।
उधर जी 23वाले कुछ लोग सहयोग करने की बजाए सत्ता की चाहत में सिर्फ राहुल पर निशाना साधे हुए हैं। सच तो ये है कि राहुल ने ऐसे लोगों से मुक्ति का बीड़ा उठाया हुआ है इसलिए कहते हैं जो निडर हैं हमें उनकी ज़रुरत है। बुंदेलखंड में लोग मज़ाक में जी 23कांगेस के लोगों को फूल छाप कांग्रेस कहते हैं । इनमें प्रतिबद्धता नहीं ये सत्ता लोलुप और अपना कालाधन बचाने की मुहिम वाले लोग हैं। इसलिए कभी बुलंदी से कांग्रेस में राहुल के खिलाफ नहीं बोल पाए।अब ईडी,सी बी आई, आई टी की गिरती बिजलियां देखकर घबरा गए हैं।ऐसे लोगों के जाने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।गंदगी जितनी निकलेगी उतनी ही कांग्रेस निखरेगी।
राहुल के खिलाफ जो हारने का बखेड़ा खड़ा किया है वह भी उतना गंभीर मामला नहीं है जितना फैलाया जा रहा है याद करिए गोवा, मणिपुर मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को वहां कांग्रेस के साथ कितना छल पूर्ण काम हुआ। यहां बिना बहुमत के करोड़ों खर्च करने के बाद विधायकों की खुले आम बिक्री की गई। कांग्रेस हर जगह मौजूद है। बिहार ने भाजपा को पहली बार इस क्रिया की जो प्रतिक्रिया दी है वह महत्वपूर्ण है। झारखंड में हेमंत सोरेन पर जो शासन विरोधी कार्य के आरोप हैं वे अगर हटते भी हैं तो उन्होंने भी भाजपा को सबक सिखाने की पूरी तैयारी कर ली है। बंगाल में इनकी तमाम कोशिशें असफल रही हैं। इसलिए आगत की जो तस्वीर बनती दिख रही है उसमें भाजपा को सिर्फ खोना ही है और विपक्ष जिसमें कांग्रेस की पहुंच देशभर में है उसको पाना ही पाना है।भारत जोड़ो आंदोलन को देशभर में जो रिस्पांस मिल रहा है वह मायने रखता है।
इस सबके बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव को टालने का खराब असर हो रहा है सी डब्लू सी को चाहिए इस चुनाव को लोकतांत्रिक तरीके से मतदान द्वारा शीघ्र कराएं।जी 23की यह मांग लाज़मी है उसे फुलफ्लेश अध्यक्ष की जरूरत है। राहुल के इंकार के बाद जबरन उन्हें पद पर बैठाना पूरी तरह ग़लत होगा।यह संदेश घातक भी हो सकता है। बेझिझक मतदान का आदर करें।एक मुकम्मल अध्यक्ष के आने के बाद कांग्रेस को दृढ़ता मिलेगी। यहां इस बात का ध्यान रखें कि भाजपा यहां अपनी पसंद का अध्यक्ष चाहती है। इसलिए ऐसे उम्मीदवार से परहेज़ करें।बात खुलकर की जाए।
इस बीच में ये अच्छा हुआ है कि फूल छाप कांग्रेसियों की पहचान बेहतरीन तरीके से हो गई है जनता में इनके खिलाफ जो माहौल है वह कांग्रेस के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा। कांग्रेस की हार का ठीकरा राहुल पर फोड़ने वाले लोग उनके बढ़ते कदम नहीं रोक सकते ये कड़वा सच है। भाजपा भी इससे परेशान हैं इसलिए फूल छाप कांग्रेसियों को सहलाती रहती है ।

