मुनेश त्यागी
आजकल भारत के प्रधानमंत्री मोदी के “मन की बात” के 100वें संस्करण की बात हो रही है। कल हुई मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि जिस विषय पर भी चर्चा हुई, लोगों ने उसे जन आंदोलन बना दिया। मन की बात के इस संस्करण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह केवल एक कार्यक्रम नहीं है बल्कि मेरे लिए आस्था, पूजा और व्रत है। जैसे लोग ईश्वर की पूजा करते हैं वैसे ही मेरे लिए यह जनता जनार्दन के चरणों में प्रसाद के थाल की तरह है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम जिस भी विषय से जुड़ा वह जन आंदोलन बन गया।
पीएम मोदी ने आगे कहा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की बात हो, स्वच्छ भारत आंदोलन की बात हो, खादी के प्रति प्रेम हो या प्रकृति की बात हो या आजादी का अमृत महोत्सव की बात हो, लोगों ने इन्हें जन आंदोलन बना दिया है। उन्होंने बताया की मन की बात कोटि-कोटि भारतीयों के मन की बात है। उनकी भावनाओं का प्रकटीकरण है। उनका यह प्रोग्राम भारत के सामाजिक ताने-बाने को मजबूती देने में मन की बात किसी माला के धागे की तरह है जो हर मनके को जोड़ें रखता है।
प्रधानमंत्री के इस प्रोग्राम का लगभग सारे भारत में प्रसारण किया गया मगर प्रधानमंत्री के इस मन की बात को सुनकर यकीन नहीं हुआ कि यह पहले वाले मोदी बोल रहे हैं। उसमें जनता की अनेकों समस्याओं में से किसी का भी जिक्र नहीं किया गया था। उसमें ना विकास की बात थी, ना रोजी रोटी की बातें थीं, ना शिक्षा और रोजगार की बात थीं,ना उसमें न्याय की बातें थीं। प्रधानमंत्री के इस मन की बात से किसान मजदूर नौजवान छात्र, न्याय गरीबी भुखमरी भ्रष्टाचार महंगाई हिंदू मुस्लिम नफरत सांप्रदायिक सद्भाव की बिगड़ती हालत और लोगों में फैलती सांप्रदायिक नफरत के जहर की कोई बात नहीं हुई।
इसमें दो करोड़ रोजगार की बात नहीं थी, भारत के सर्वांगीण विकास की बात नहीं थी। इसमें लोकायुक्त की बात नहीं थी, इसमें विदेशों से काला धन वापस लाने की बात नहीं थी। इस कार्यक्रम में पूंजीपतियों के 12 लाख करोड़ रुपए सरकार द्वारा माफ कर दिए गए इस पर बात नहीं हुई। इस मन की बात में कर्नाटक सरकार में 40% रिश्वतखोरी करने की बात नहीं हुई। इस मन की बात में राजपाल सत्यपाल मलिक द्वारा खोले गए राज का कोई प्रत्युत्तर देने की बात नहीं हुई। इस प्रोग्राम में मोदी जी ने मन की बात तो कीं मगर इसमें से “जन की बात” सिरे से गायब थी। इस मन की बात से भारत की जनता यानी किसान मजदूर नौजवान छात्र बेरोजगार गरीब भुखमरी के शिकार लोग और उनकी दारुण कथाएं शामिल नहीं थीं।
मोदी सरकार ने एक साल पहले किसानों से किए गए फसलों के एमएसपी की बात नहीं पूरी नहीं की, किसानों के साथ किए गए वादे वादे पूरे नहीं किए, किसानों की मांगे नहीं मानीं और भारत के किसान सरकार की इस बेरुखी से नाराज और परेशान होकर देश में फिर से देशव्यापी आंदोलन की नीति बना रहे हैं।मन की बात में किसानों की समस्याओं का कोई भी जिक्र नहीं किया गया था।
इसी के साथ हमारे देश का पूंजीपति वर्ग मजदूरों के कल्याण के लिए बनाए गए मजदूर कानूनों को लागू नहीं कर रहा है और अब तो हद हो गई है कि उसने मजदूरों के कल्याण के लिए बनाए गए लगभग सारे के सारे श्रम कानून वापस ले लिए हैं और उनकी जगह चार श्रम संगीताएं बनाई हैं इन संहिताओं को देख और पढ़कर लगता है कि सरकार ने मजदूरों से वे सब हक और अधिकार छीन लिए हैं जो उन्होंने लाखों लाख बलिदान देकर, कुर्बानियां देकर हासिल किए थे। मन की बात में इसका भी कोई जिक्र नहीं था।
ये चारों श्रम संहिताऐं मजदूरों के आधुनिक गुलामी के नए पट्टे हैं। इन कानूनों के जरिए मजदूरों से अस्थाई नौकरी का अधिकार, पेंशन का अधिकार, ग्रेच्युटी का अधिकार, बोनस का अधिकार, ओवरटाइम का अधिकार, यूनियन बनाने का अधिकार लगभग छीन लिए हैं और मोदी के बनाए गए कानूनों के हिसाब से मजदूर पूंजीपति वर्ग के आधुनिक गुलाम हो जाएंगे।
इसी के साथ मोदी प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की जनता को सस्ते और सुलभ न्याय की बात नहीं की। आज हमारे देश में 5 करोड़ से भी ज्यादा मुकदमें अदालतों में वर्षों बर्ष से लंबित हैं, मगर सरकार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए कोई कार्यवाही नहीं कर रही है। वह मुकदमों के अनुपात में न्यायालय नहीं बना रही है, मुकदमों के अनुपात में न्यायाधीश कर्मचारी और स्टेनो नहीं नियुक्त कर रही है। निचली अदालतों में 25 परसेंट पद खाली पड़े ऊहैं और हाईकोर्ट लगभग 35% जजों के पद खाली पड़े हुए हैं जिन्हें लगातार मांग करने के बावजूद भी सरकार नहीं भर रही है।यह ज्वलंत मुद्दा मन की बात से सिरे से नदारद था।
आज मजदूर अन्याय और भ्रष्टाचार के शिकार हैं। 15 अगस्त 2022 की हिंदुस्तान अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है। कई कारखानों, दुकानों और अस्पतालों में मजदूरों को 12-12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है, मगर उन्हें न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा है और ओवरटाइम का भुगतान नहीं किया जा रहा है। पूरा का पूरा श्रम विभाग और भविष्य निधि विभाग सिर्फ खानापूर्ति के अलावा कोई काम नहीं कर रहे हैं और मजदूरों को कानून के द्वारा दी गई सुविधाओं का लाभ नहीं दिलवा रहे हैं।इस मुद्दे को भी मन की बात में शामिल नही किया गया था।
यही हाल रोजगार का है। सरकार प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोजगार देने का नारा और वादा करके सत्ता में आई थी। मगर आज तक उसने कितने नौजवानों को नौकरियां दी, उसका कोई उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपनी मन की बात भी नहीं किया। हमारे देश के सरकारी विभागों में लाखों लाख पद खाली पड़े हुए हैं, मगर सरकार लगातार कोशिशों और मांग करने के बाद भी उन पदों को भर नहीं रही है और और इस प्रकार भारत के करोड़ों बेरोजगार नौजवान हताश निराश होकर दर दर की ठोकर खा रहे हैं मगर उन्हें लगातार कोशिशों के बाद भी नौकरियां नहीं मिल रही हैं।
भारत के संविधान में sc.st.obc और गरीबों को आरक्षण देने की बात की गई है, मगर पिछले 10 सालों में उसने कितने sc.st.obc और गरीब तबके के लोगों को रोजगार दिया है, नौकरियां दी हैं, इसका कोई उल्लेख उन्होंने अपने मन की बात भी नहीं किया। जबकि पिछले दिनों हमने देखा है कि भारत सरकार ओबीसी के तथाकथित मोदी जाति के अपमान पर मरी जा रही है। मन की बात में यह मुद्दा कहां था?
भारत का संविधान भारत की न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करता है। पिछले कई सालों से हम देख रहे हैं कि भारत का शासक वर्ग और सरकार के मंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे रहनुमा, न्यायपालिका की आजादी से खुश नहीं हैं। वे न्यायपालिका को अपना मातहत और पिछलग्गू बनाना चाहता है। सरकार के कानून मंत्री, भारत की न्यायपालिका को, सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों को डरा धमका रहे हैं, उनका अपमान कर रहे हैं और उन्हें सरकार की नीतियों के तहत डालना चाहते हैं, वे न्यायपालिका की आजादी को किसी भी तरीके से खत्म कर देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात में इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पर कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा।
पिछले कुछ दिनों से भारत की कुछ महिला पहलवानों के साथ, सरकार के सांसद द्वारा किए गए यौन शोषण के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रही है, उनकी रिपोर्ट नहीं दर्ज की जा रही है, उनकी बातें नहीं सुनी जा रही हैं। वे खुलेआम आरोपियों पर दोष लगा रही हैं, मगर सरकार दोषारोपियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर रही है और अब तो हद हो गई है कि एफआईआर दर्ज करने के बाद भी दुष्कर्म और यौन शोषण के आरोपी को अभी तक भी गिरफ्तार नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री के मन की बात में दिल्ली पुलिस के इस दौगले मापदंड का कोई जिक्र नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री का बेटी बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का यह कैसा नाटक है?
इसके अलावा दिन रात चौगुनी गति से बढ़ रही कमरतोड़ महंगाई पर भी प्रधानमंत्री के मन की बात कुछ नहीं कह पाई है। जनता के जरूरी सामान और दवाइयों पर, शिक्षा के अनाप-शनाप खर्चों पर, जनता के बुनियादी इलाज से बाहर होती, लगातार बढ़ रही दवाइयों और इलाज के दामों पर भी प्रधानमंत्री की चुप्पी है। उनके मन की बात में इन सब का कोई हवाला नहीं दिया गया है।
इस प्रकार उपरोक्त के आलोक में हम कह सकते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री के मन की बात से किसानों मजदूरों नौजवानों के बुनियादी मुद्दों जैसे शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार महंगाई शोषण जुल्म अन्याय भ्रष्टाचार पर कोई बात नहीं की गई है। जनता के विकास की बात सिरे से नदारद है और जनता के कल्याण की बातें प्रधानमंत्री के मन की बात में शामिल नहीं है। प्रधानमंत्री के मन की बात में लुटेरे पूंजीपति वर्ग की धनवृद्धि और जनता के लिए जुमलेबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार हम देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री के “मन की बात” से “जन की बात” सिरे से नदारद है, गायब है और इस प्रकार प्रधानमंत्री अपने मन की बात से जन की बात गायब कर, मौन की बात पर उतर आए हैं।

