डॉ. प्रिया मानवी
_जानामि धर्मं न च मे प्रवृतिर्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्ति:।_
_केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियोक्तोsस्मि तथा करोमि॥_
– गर्ग संहिता, 50:36
[(दुर्योधन–) धर्म (नैतिक आचरण) को जानता हूँ किंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं। अधर्म (अनैतिक आचरण) भी जानता हूँ किंतु उससे मेरी निवृत्ति नहीं। हृदय में विराजमान कोई शास्ता है, वह जैसे नियोजित करता है, वैसे ही करता हूँ।]
_कम से कम संस्कृत में धर्म का अर्थ पूजा पद्धति न होकर सार्वभौम नैतिकता है। इसलिए अंग्रेजी में इसका अनुवाद religion के बचाए righteousness किया गया है। रिलिजन लैटिन के religare से बना है —जो बांधता है।_
इलहाम से जुड़ी पूजापद्धति जिसके लिए संस्कृत में संप्रदाय शब्द का प्रयोग हुआ है। संप्रदाय के अर्थ में धर्म मनुष्य को नैतिक या अनैतिक बनाने में कोई भूमिका नहीं अदा करता। धर्म व अधर्म को जानने के बावजूद व्यवहार में हमारा आचरण अनैतिक हो सकता है। पंडे-पुजारी, मठाधीश-महंत, प्रवचनकर्ता बाबा, ख़लीफ़ा-इमाम, मुल्ला-मौलवी, पोप-बिशप तक अनैतिक आचरण करते पाए गए हैं।
और धर्म व अधर्म को जाने बिना भी हमारा आचरण नैतिक हो सकता है। निरक्षर, भोलेभाले आदिवासी, वनवासी भी नैतिक आचरण करते देखे जाते हैं।
क्यों?
धर्म-ज्ञान से नैतिक आचरण का अनिवार्य सम्बंध नहीं। ज्ञान और आचरण दो अलग चीज़ें हैं।
तो मनुष्य में नैतिकता आती कहाँ से है?धर्म से? नहीं। ज्ञान से? नहीं। किसी दर्शन से ? नहीं।
सवाल कठिन है। हमारी एक प्रवृत्ति यह भी है कि कठिन सवाल से बचने के लिए हम सवाल पर ही सवाल उठा देते हैं। जैसे—नैतिकता है क्या? जो एक व्यक्ति के लिए नैतिक है, दूसरे के लिए अनैतिक हो सकता है। जो एक मज़हब में नैतिक है, दूसरे में अनैतिक हो सकता है।
मानवतावादी के लिए जो अनैतिक है, मार्क्सवादी के लिए वह नैतिक हो सकता है। तो नैतिकता का कोई सार्वभौम और सार्वकालिक मानदंड नहीं है। वगैरह।
हो सकता है। किंतु नीचे नैतिकता के सारतत्व पर कुछ उद्धरण दिए गए हैं– देखें, उनमें दी गई नैतिकता की अवधारणा सार्वभौम और सार्वकालिक है या नहीं?
(A)
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
-पद्मपुराण, सृष्टि, 19: 357
[धर्म (नैतिक आचरण) का सर्वस्व सुनें और सुनकर धारण करें। जो अपने लिए प्रतिकूल है, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।]
(B)
बाइबिल (न्यू टेस्टामेन्ट) में ;
“Do for others what you want them to do for you: this is the meaning of the Law of Moses and of the teachings of the prophets.”
-Mathew, 5.7.12
[“दूसरों के लिए वही करो जो तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे लिए करें: मूसा के क़ानून का यही अर्थ है और पैग़म्बरों की यही शिक्षा है।“]
(C)
इस्लामी हदीस में एक प्रसंग आता है। मुहम्मद साहब घोड़े पर सवार कहीं जाने को तैयार थे। तभी एक बद्दू ने आकर घोड़े की रक़ाब पकड़ ली और उनसे पूछा—ओ अल्लाह के नुमाइंदे, मुझे जन्नत का रास्ता बता। मुहम्मद साहब ने कहा—“तुम अपने लिए औरों से जैसा बरताव चाहते हो, उनके साथ वैसा ही करो।
उनका जैसा बरताव नापसंद करते हो, वैसा उनके साथ न करो…अब रक़ाब छोड़ो (तुम्हारे लिए यही काफ़ी है)”।
-किताब-अल काफ़ी, जिल्द-2, पृष्ठ-146
शायद ही किसी मज़हब के लोग इससे असहमत हों।थोड़ी देर के लिए इन तीनों उद्धरणों को भूल जाएँ और प्रकृति-प्रदत्त बुद्धि-विवेक से इसे समझने की कोशिश करें।
मनुष्य पैदा होने के बाद जैसे ही होश सँभालता है, उसे दो चीज़ों का एहसास होता है। एक, अपने होने का, और दो, बाह्य जगत के होने का। यह भी कि उसको अब इसी बाह्य जगत में रहना है, जब तक भी रहना है। दोनों का सम्बंध अविच्छेद्य है। इस सम्बंध का स्वर्णिम नियम वही है जो ऊपर के उद्धरणों में आया है। यह नियम धर्मग्रंथों में न भी होता तो मनुष्य को मनुष्य होने के नाते इसका सहज बोध होता। क्यों?
इसलिए कि यह मनुष्य में अंतर्निहित (innate) है।
तो नैतिकता और अनैतिकता और दोनों की भिन्न-भिन्न मात्रा मनुष्य में अंतर्निहित है। यही उसे मनुष्य बनाती है, अन्य प्राणियों से पृथक् और विशिष्ट।
अंतर्निहित माने वह जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती कि वह क्यों है। जैसे इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती कि यह सृष्टि क्यों हैं, हमारी चेतना जैसी भी है, कहाँ से और क्यों आई, जिसने हमें अपना और बाह्य जगत का बोध कराया। या, हमारे दो हाथ, दो पैर, दो आंख, दो कान किंतु एक नाक और एक मुख ही क्यों है।
तो नैतिकता के सारतत्व के एहसास के लिए मनुष्य को न किसी मज़हब की ज़रूरत है, न ईश्वर की, न किसी दर्शन की। मनुष्य होने के नाते वह एक नैतिक प्राणी है।
नैतिकता और अनैतिकता की मात्रा हर व्यक्ति में भिन्न-भिन्न होगी, लेकिन होगी ज़रूर। और वह औपचारिक रूप से किसी भी मज़हब को माने, किसी भी विचारधारा को माने, किसी को भी न माने, चाहकर भी वह इससे मुक्त नहीं हो पाएगा। यह उसकी अंतर्निहित प्रवृत्ति है। सहजात है। बाध्यकारी है।
उसकी अंतर्निहित प्रवृत्ति अनैतिकता की है तो उसका हाल वही होगा जो दुर्योधन का हुआ। जान सब लेगा पर कर नहीं पाएगा।
_मन को समुझा-बुझाकर कुछ कर भी लिया तो मौक़ा मिलते ही सहज प्रवृत्ति फिर उभर आएगी। क्यों? वही बात : अस्तित्व के हर क्यों का जवाब नहीं।_
(चेतना विकास मिशन)

