सुसंस्कृति परिहार
पी के यानि प्रशांत कुमार को कौन नहीं जानता ? राजनैतिक रणनीतिकार बतौर उनकी चर्चाएं गाहे बाहें होती रहती हैं ।ममता बनर्जी की जीत का सारा श्रेय राजनीति के पारखी लोग प्रशांत किशोर की कुशल रणनीति को मानते हैं।वे जब एन सी पी के नेता शरद पंवार से सप्ताह में दो बार मिलते हैं तो यह ख़बर सुर्ख़ियां बटोरती है।तरह तरह के कयास लगाए जाते हैं प्रशांत किशोर चर्चाओं का केंद्र बन जाते हैं।प्रशांत किशोर का कहीं आना जाना सेलीब्रिटी की तरह ख़बरें बनता है। इस बार वे राहुल से मिलने उनके आवास पहुंचे तो यह समाचार तूफानी वेग से सत्तारुढ़ पार्टी को झकझोर गया। इससे पहले प्रशांत किशोर का यह कहना कि मैं राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता हूं। दोनों का कहीं ना कहीं सीधा सम्बंध नज़र आता है।उनकी दिली तम्मन्ना कैसे पूर्ण होगी इसी कोशिश में वे फिलवक्त लगे हुए हैं। इधर राजस्थान , पंजाब, छत्तीसगढ़ जहां कांग्रेस शासन है वहां इन दिनों घमासान मचा हुआ है ऐसे में वे चुप कैसे बैठ सकते हैं वे पंजाब के मुख्यमंत्री अरमिंदर जी से मिलते हैं। मतलब साफ़ है वे नवजोत के विवाद को ख़त्म करने की पहल करते हैं। विदित हो वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले प्रशांत किशोर ने नवजोत सिद्धू को बीजेपी से कांग्रेस में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। कांग्रेस शासित राज्यों में हो रही तमाम गतिविधियों पर वे सिर्फ नज़र नहीं रखते बल्कि समाधान हेतु पहल कदमी भी कर रहे हैं।
प्रशांत को चाहने वाले इक्का दुक्का दलों को छोड़कर प्राय,:सभी दलों में हैं ।राजनीतिक दलों में बात करें तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रशांत किशोर पर भरोसा बढ़ा है। विधानसभा चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के सलाहकारों में गिने जाते हैं। राज्य सरकार के गठन के बाद पिछले दिनों भी प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी से भेंट की थी। बैठक और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई थी। प्रशांत किशोर के मुरीद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी भी हैं। रेड्डी की राय के बाद ही ममता ने प्रशांत किशोर की सेवाएं ली थीं। नीतीश कुमार भी उन पर भरोसा जता चुके हैं।
इसी तरह से कांग्रेस पार्टी के भीतर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी हैं। प्रियंका वाड्रा की टीम भी प्रशांत किशोर द्वारा उत्तर प्रदेश में 2016 में शुरू किए गए प्रयास की तारीफ करना नहीं भूलतीं। राहुल गांधी के सचिवालय में सक्रिय सदस्य के अनुसार राहुल गांधी भी प्रशांत किशोर को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में मुख्य भूमिका देने के बाद लोकसभा चुनाव 2019 तक जोड़े रखने के पक्ष में थे। हालांकि कतिपय कारणों से ऐसा नहीं हो सका।उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 2017 में प्रशांत किशोर की सलाह से उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में झंडा फहराने का निर्णय लिया था। पीके की सलाह पर ही समाजवादी पार्टी से गठबंधन भी किया था, लेकिन पूरा राजनीतिक आपरेशन फ्लॉप रहा था। हालांकि प्रशांत किशोर पहले ही साफ कर चुके हैं कि वह चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार का काम छोड़ चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि राहुल और प्रियंका से प्रशांत किशोर से क्यों मुलाकात की?वजह साफ है।प्रशांत किशोर भी मानते हैं कि वर्तमान परिस्थिति में बिना कांग्रेस के प्रभावी विपक्ष की कल्पना मुश्किल है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार समेत विपक्ष के तमाम नेता इससे इनकार नहीं करते। प्रशांत किशोर इस समय तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, राष्ट्रीय मंच समेत कई राजनीतिक दलों को सलाह दे रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर भी किसी खास मकसद से राहुल गांधी से मिलने के इच्छुक थे। ऐसा माना जा रहा है कि राहुल गांधी, पीके और प्रियंका के बीच हुए इस विमर्श का जल्द ही कोई राजनीतिक नतीजा सामने आ सकता है।
बहरहाल, राहुल से उनका मिलना किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा लगता है । प्रशांत किशोर भली-भांति जानते हैं कि 2022-23 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं वहां भाजपा की जमीन खिसकी हुई है लेकिन इसका फायदा तभी मिल सकता है जब किसी ठोस रणनीति के तहत टीम वर्क हो।जैसा बंगाल में हुआ।इसी उधेड़बुन में वे ममता को जिताने संकल्प बदलने होते हैं।राहुल को प्रधानमंत्री बतौर अपनी चाहत की पूर्णता के लिए शरद पंवार से मिलते हैं।अब राहुल से हुई मुलाकात को इसी नज़रिए से देखना चाहिए।उन्हीं के आग्रह पर ममता राकेश टिकैत के साथ किसानों की राष्ट्रीय एकता की बात करती हैं।एक विपक्षी मोर्चा बनाने की बात भी बंगाल से आती है।जो प्रशांत के आव्हान के साथ शुरू होती है।
रणनीति में माहिर ममता के सलाहकार की राहुल से भेंट और उनसे लगाव की ख़बरें निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है। चर्चाएं तो इस तरह की भी हैं कि प्रशांत कांग्रेस में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।आज की राजनीति में सब कुछ संभव है ।वे शामिल हों या ना हों पर विपक्ष की एकता की मजबूती के लिए उनके प्रयास यदि भाजपा को हटाने में कामयाब होते हैं तो यह देश हित में उनका बड़ा अवदान होगा । विपक्षी दलों को सोचना होगा यदि वे विखंडित रहे तो येन केन प्रकारेण भाजपा सत्ता में आने नए तरीके ईजाद कर लेते हैं।

