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*रक्त में प्लाज्मा और हमारी स्टेमिना बढ़ाती है तंत्र- साधना*

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          डॉ. विकास मानव

जिसकी अनुभूतियों मे जितना सत्य होता है, उसकी किसी भी विषय की व्याख्या उसके दायरे के अनुसार होता है। उसी तरह सोमरस है। यही जीवन तत्त्व है। हमारा जीवन सिर के चाँद से अन्दर आने वाले अमृत तत्त्व पर निर्भर करता है।  सोम यानि चंद्रमा ही अमृत है।

      सोमरस के कारण ही हमारा समस्त ऊर्जा चक्र सक्रिय होता है, और यही हमारे शरीर को निष्क्रिय होने से बचाता है तथा बच्चों के शरीर की वृद्धि करता है। शरीर के ऊर्जा चक्र का इससे अन्योनाश्रय सम्बन्ध होता है। शरीर ही इस अमृत को खींचता है और इस अमृत से ही शरीर का अस्तित्व बना रहता है।

      युवा होने पर यह छिद्र ऊर्जा प्रदुषण से बन्द हो जाता है, और बाद में अन्दर का तत्त्व ही चाँद पर पडने वाले दबाव से शरीर को क्रियाशील रखता है। जैसे जैसे यह दवाब कम होता चला जाता है, शरीर पकने लगता है, अंगो मे झुरियाँ पडने लगती है और बाल पकने लगते है। 

      जैसे ही दबाव और कमज़ोर होता है, शरीर बूढापे से निर्बल हो जाता है और एक दिन वह मृत्यु को प्राप्त करता है। इसी छिद्र को खोलने के लिए ही कपाल सिद्धि की जाती है।

       श्री विद्या चंद्र विद्या है। चंद्रकला अमृत कला है। दस महाविद्याओं में एक महाविद्या षोडशी श्रीविद्या है। इसकी त्रिपुरसुंदरी राजराजेश्वरी ललिता कामेश्वरी त्रिपुरा त्रिपुरसुंदरी सुभागा बाला त्रिपुर सुंदरी आदि अनेक नामों से पूजा की जाती है।

       श्री यंत्र समस्त सृष्टि का रेखात्मक चित्र तो है ही, साथ ही यह अनंत देवी देवता शक्तियां तथा समस्त रचनास्तरो लोको एवं अध्यात्मिक सूक्ष्म मंडलों का भी निवास स्थान है। देवी एवं उनके यंत्र की आराधना यद्यपि  पशु, वीर एवं दिव्य तीन भाव से की जा सकती है। किंतु दिव्य भाव ही सर्वोत्तम है।

     शाक्तों के तीन संप्रदाय प्रमुख है कौलमार्ग, मिश्रितमार्ग एवं समयमार्ग। आदि शंकराचार्य समय मार्गी थे। समय मार्गी, वेद पुराण सदाचारों एवं विधि निषेध में आस्था रखते हैं किंतु कौल इस लक्ष्मण रेखा को नहीं मानते। समयाचार श्री विद्या की आन्तर पूजा का प्रतिपादक है।     

     समयाचारों का नाम आन्तरपूजारतिः है। परमशिव के साथ शक्ति का या समय के साथ समया का सामरस्य कराना ही समयाचारियो का परम लक्ष्य है।

     श्री विद्या के साधना पथ में भक्ति ज्ञान एवं योग तीनों ही स्वीकृत हैं। षट्चक्र भेदन के द्वारा मूलाधारस्थ से कुल शक्ति को जागृत करके उसके वियुक्त प्रियतम से उसका सम्मिलन कराना भी एक साधना पथ है तथा ज्ञानोत्तरा भक्ति के द्वारा विश्वात्मा भगवती ललिता को अपनी आत्मा के रूप में साक्षात्कार करना भी एक साधन पथ है। 

      यह दोनों पथ श्री विद्या में स्वीकृत है। श्री विद्या की साधना में बहिर्यांग से उत्कृष्टतर अन्तर्याग का ही आत्मीकरण माना जाता है। 

     भगवती मां त्रिपुर सुंदरी समस्त प्राणियों की आत्मा है वह विश्वातीत भी है। और विश्वमय भी हैं वह कामेश्वर भी है और कामेश्वरी भी ।

     बैन्दवस्थान मे सहस्त्रदल कमल है और उसमें भगवती की पूजा आदर्श पूजा है। चंद्रमडल में विगलित अमृत से सिक्त श्रीचक्ररूपी त्रिपुरा की पूरी में पूजा करना ही यथार्थ पूजा है। बैन्दवपुर ही चिन्तामणि गृह है।

     सामयिकों के मत मे इसी चिन्तामणि गृह मे या सहस्त्रदल कमल मे भगवती (जिसके पास विशुद्ध भग यानी योनि हो ) की पूजा की जानी चाहिए। 

     मैं कचरा टाइप विविध तंत्र- मार्गियों के पचड़े में नहीं डालता किसी को. मैं किसी को अष्टांग योग के जाल में भी नहीं उलझाता. मैं “जन्मों की  साधना मोक्ष देती है” ऐसा भी नहीं कहता. तन मन धन का समर्पण या आस्था, श्रद्धा, विश्वास की माँग भी मेरा सब्जेक्ट नहीं. आपके घर की स्त्री के भोग का तो सवाल ही नहीं उठता. ओवरलोड की सेचूएशन में रहता हूँ. मेरे लिए ईमानदार चाहत अहम है. चाह सच्ची है तो राह लें और मंज़िल भी. स्पीड है तो केवल चौबीस घंटे में.

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