Site icon अग्नि आलोक

छलिए जरा सामने आ

Share

शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी आज बहुत ही भिन्न मानसिकता में हैं।
सन 1957 में प्रदर्शित फिल्म जनम जनम के फेरे के गीत की पंक्तियां बार बार दोहरा रहे हैं।
इस गीत को लिखा है,गीतकार भरत व्यासजी ने
ज़रा सामने तो आओ छलिये
छुप छुप छलने में क्या राज़ है
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है

सीतारामजी, गीत की उक्त पंक्तियां पर्दे के पीछे छिप कर गा रहें हैं।
सीतारामजी से मैने कहा आप तो व्यंग्यकार हो। जो भी कहना हो वह खुलकर माने दुशाले में लपेट कर लिखते हो,और सार्वजनिक मंचों पर पढ़ते भी हो।
आप पर्दे के छुप कर क्यों गा रहे हो?
फिल्म में उक्त पंक्तियां परमात्मा मतलब ईश्वर को संबोधित होकर लिखी और गायी गई है।
मेरे संवाद सुनकर सीतारामजी एकदम अपनी ओरिजनल व्यंग्यकार की मानसिकता में आ गए और पर्दे की ओट से बाहर आ गए।
अपनी व्यंग्यात्मक शैली में कहने लगे,पर्दे की ओट में गाते हुए मैं यह कह रहा हूं कि,
पर्दे में रहने दो,पर्दा जो उठ गया तो सारा भेद खुल जाएगा
इसीके साथ सीतारामजी ने सन 1973 में प्रदर्शित फिल्म धर्मा
के इस गीत की कुछ पंक्तियां सुनाई। सीतारामजी ने कहा, गीताकर वर्मा मलिकजी रचित इस गीत पंक्तियों को खलनायिका बिंदु पर फिल्माया है और इन पंक्तियों को गायिका आशा भोसले ने गाया है। यह पंक्तियां व्यंग्य के लिए एकदम उपयुक्त है। इसीलिए मैं इन्हें गुनगुना रहा हूं।
राज़ की बात कह दूँ तो
जाने महफ़िल में फिर क्या हो
ज़बाँ पे बात जो आई, कभी रूकती नहीं है
उठ गई आँख जो एक बार, वो झुकती नहीं है
उम्मीदों का कभी ना, सामने मैं ख़ून होने दूँ
हक़ीक़त को छुपाऊँगी, तो वो छुपती नहीं है

मैने सीतारामजी के चरण स्पर्श किए और कहा सच में आप व्यंग्यकार हो। यह कहते हुए मैंने सीतारामजी को पुरानी फिल्म के गीत की पैरोडी सुना दी।
इशारों इशारों में गहरी बात कहने वाले
बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से
कलम से शब्दों के कमाल का ये जादू चलाना

सीतारामजी आपने सीखा कहां से
सीतारामजी ने कहा चर्चा को यहीं विराम देना चाहिए।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version