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बंदरवाद से कैसे बचें, बताएं प्लीज!

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अलीशा (मुंबई)

    आजकल बाबा तुलसी दास को लोगों ने बुरी तरह घेर लिया है और उन्हें मरने के बाद भी चैन की साँस नहीं लेने दे रहे हैं।जब वह जीवित थे तब भी लोगों ने उन्हें बहुत तंग किया था। औरों की बात तो अलग है, उनकी इकलौती पत्नी ने भी उन्हें इतना तंग किया, ताने कसे और सताया कि बेचारे तुलसी जी को अपना घर छोड़ कर भागना पड़ गया था।

      इससे एक बात साबित हो जाती है कि बिना तंग हुए कोई उच्च कोटि का कवि नहीं बन सकता है और वह केवल सड़क छाप कविताएँ ही लिख सकता है।कारण साफ़ है कि जब तक आदमी दुखी और परेशान न हो तब तक सटीक भाव पैदा ही नहीं होंगे और उच्च स्तर की कविता जन्म ही नहीं लेगी।शायद यही कारण है कि ज़्यादातर अच्छे कवियों की कविताएँ पढ़ने से यही भान होता है कि इस व्यक्ति की अवश्य धुँआधार खबर ली गई होगी तभी यह कविता के ज़रिये इस कदर चींख पुकार मचा रहा है या आँसुओं की धारा बहा रहा है।   

        आजकल जो हो रहा है उससे एक बात और साफ़ हो जाती है कि जब किसी बात पर बहुत ज़्यादा और अनावश्यक विवाद या झोंटाखींची हो रही हो तो यह समझ लेना चाहिए कि निठल्लों की तादाद में बेतहाशा इज़ाफ़ा हो रहा है।यहाँ बताते चलें कि निठल्ले कई प्रकार के हो सकते हैं।

        जिनके पास रोज़गार या काम नहीं है वह तो निठल्ले होते ही हैं पर काम होते हुए भी कामचोरी करने वाले भी उनसे बड़े निठल्ले होते हैं।रिटायर्ड लोग भी कोई काम के न रह जाने के कारण सहज रूप से निठल्लई करने लगते हैं।मानें या न मानें बहुतायत में पाये जाने वाले कवि भी परिष्कृत निठल्ले माने जा सकते हैं।तो भाइयों ! जब तक यह निठल्ले रहेंगे इस तरह के विवाद होते ही रहेंगे।

ख़ैर हमें तुलसी बाबा के झमेले से क्या लेना देना।पर हमें उनकी इस चौपाई- ढोल गँवार शूद्र पशु नारी- से केवल इतनी परेशानी हो रही है कि उन्होंने केवल इन पाँच प्रकार की श्रेणियों को ही ताड़ना के काबिल क्यों मान लिया और बन्दर को इस श्रेणी में क्यों नहीं शामिल किया ?

       हो सकता है कि उनके ईष्ट प्रभु राम की वानर सेना द्वारा की गयी सहायता के कारण कृतज्ञता बस उन्होंने इस प्रजाति को exempt कर दिया हो।यद्यपि आप यह भी कह सकते हैं कि बन्दर भी पशु की श्रेणी में शामिल हो गया पर यह बात मानने योग्य नहीं है क्योंकि बन्दर आदमी का पूर्वज माना जाता है अत: वह आदमी की केटागरी में ही गिना जाना चाहिए।

        वैसे हमें खुद कभी यह विश्वास नहीं हो पाया कि बन्दर कभी आदमी का पूर्वज था और बन्दर ही कालान्तर में आदमी बन गया है।यदि यह सच होता तो फिर बन्दर नाम का जीव अब तक इस दुनिया में पूरे बन्दरपन के साथ मौजूद क्यों बना हुआ है ? यह बात अलग है कि कुछ लोगों की गर्दनों में फिट मुँह को देख कर कभी-कभी यह मानने का मन करने लगता है कि आदमी का पूर्वज अवश्य बन्दर ही रहा होगा।

       कुछ लोगों की हरकतें भी ऐसी होती हैं कि बन्दर उन्हें अपनी जमात में शामिल करने पर गंभीरता से मन बना लेते होंगे।यह बात उठी तो हमें अपने एक अज़ीज़ मित्र की याद आ गई जिनकी शक्ल और अक्ल दोनों इस प्रजाति से काफ़ी क़रीब हैं।

         वह ‘ आ बैल मुझे मार ‘ की सूक्ति पर पूरा भरोसा रखते हैं और किसी से भी उलझने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं।उनकी विध्वंसक क्षमता से लोग इतना भय खाते हैं कि उनसे सुरक्षित दूरी बना कर ही चलते बैठते हैं।लालिमा युक्त गौर वर्ण के उनके चेहरे का १/४ भाग अत्यंत उपजाऊ है जो बृहदाकार और घनी मूँछों से बारह महीने आच्छादित रहता है जिन पर दृष्टिपात होते ही बड़ों बड़ों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है।

       जब कभी वह हमारे सामने पड़ते हैं तो भक्तिभाव से हम यह लाइनें गुनगुनाने लगते हैं, ‘ लाल देहि लाली लसै अरधर लाल लंगूर, बज्र देहि दानव दलन जय जय जय कपिसूर ‘।इस मंत्र का जाप करने पर हम स्वयं को अति सुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

बन्दरों का मसला हम ज़ोर शोर से इसलिये उठा रहे हैं कि हम निजी तौर पर इस जीव से बहुत ज़्यादा परेशान और हलाकान चल रहे हैं।अपने छोटे से घर के छोटे से बगीचे में जैसे ही हम कुछ पौधे और फुलवारी सजाते हैं पता नहीं कहाँ से बन्दर ब्रिगेड को यह खबर लग जाती है और वह एक एक पत्ती और फूल को नोंच कर ऐसी हिमाक़त दुबारा न करने की चेतावनी देकर अदृश्य हो जाते हैं।

       और तो और छत पर रखी पानी की टंकियों में यह प्रायः इस प्रकार डुबकी लगाते हैं जैसे हमारे द्वारा यह विशिष्ट व्यवस्था केवल उनके लिये ही की गई हो।हमने अनकों बार उन्हें डराने भगाने का असफल प्रयास किया पर आये दिन उनकी हिंसात्मक वारदातों की ख़बरें अख़बारों में पढ़ कर हम खुद अत्यंत भयाक्रान्त हो गये हैं।

         कई बार तो हमारे मन में यह विचार भी आता है कि इस मकान को बेच कर हम खुद किसी सुरक्षित ठिकाने पर चले जायें।इसके लिए हम गंभीरता से किसी ऐसे ख़रीदार की तलाश में हैं जिससे हमारी कोई पुरानी खुन्नस हो जिसे हम अभी तक न निकाल पाये हों।

मित्रों! यदि आपके पास इस बन्दरवाद से निजात पाने का कोई नुस्ख़ा हो तो हमें ज़रूर बतायें, हम आपके जन्म जन्मांतर तक शुक्रगुज़ार हो जायेंगे।

      यदि नहीं बता पाये तो हमारे मकान के बिक जाने की ज़िम्मेदारी आप लोगों की भी होगी क्योंकि आप में से ही किसी मित्र के घर को हमें अपना नया ठिकाना बनाना पड़ेगा और ‘ मान न मान मैं तेरा मेहमान ‘ की कहावत चरितार्थ करनी पड़ेगी।

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