शशिकांत गुप्ते
छोटे बड़े में भेद नहीं है भाव कम ज्यादा हो सकता है*
नीति गत शराब वाह क्या बात है।
भ्रष्टाचार के विरुद्घ आंदोलन से पैदा हुई सियासत मादक पदार्थ को आम आदमी तक सुलभ रीति ने पहुँचाने के लिए नीति बनाती है। यह एक कीर्तिमान ही है।
नशे मुहैया कर राजस्व की आय में वृद्धि करना भी प्रशंसनीय कार्य है। नशे की नई परिभाषा में नशा करवाना भ्रष्ट आचरण नहीं कहलाता होगा?
कट्टर ईमानदार है हम। चुनाव जीतना ही हमारा लक्ष्य है। हम मुफ्त पानी देने में माहिर है। बिजली भी मुफ्त वह भी दो सौ यूनिट तक देने का संकल्प पूरा करने के लिए वचन बद्ध है। बेचारा गरीब भोलाराम अपना जीवन यापन बगैर बिजली के करता है। लच्छू कारागिर बेचारा ब-मुश्किल पचास यूनिट से ज्यादा बिजली यूज ही नहीं कर पाता है। लल्लू मिस्त्री ज्यादा से ज्यादा पचास से सौ यूनिट तक ही वापर पाता होगा। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला मंगू बिजली के एक लट्टू में अपना काम चलाता है।
यह सब आम आदमी की परिभाषा में आतें हैं। नाम इन बेचारों का लाभ संभ्रात लोगों को मिलता है। कमोवेश संभ्रात शब्द सामंती का पर्यायवाची शब्द लगता है।
इनदिनों परिभाषा बदल रही है, जिस तरह रुपया गिरता नहीं है डॉलर मजबूत हो जाता है।
तो सकता है,कट्टर संभ्रात लोगों को ही कट्टर गरीब कहलाने लग जाए। यह भ्रांति नहीं है यथार्थ है।
देश के अनोखे राज्य में जो पिछले बीस+सात वर्षों से एक विकसित मॉडल का तमगा प्राप्त कर चुका है। वहाँ नीति गत मदिरा बंदी है।
फिर भी वहाँ “शराब” जहरीली विशेषण से विभूषित होकर मुहैया हो जाती है? है न आश्चर्य जनक किंतु सत्य बात।
इस अनोखे राज्य में हमें चुनाव जीतना है।
यह तो पक्का सबूत है,झाड़ू सफाई करने के काम आती है। एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में नीति गत “शराब” और मुफ्त में लुफ्त उठाने की योजनाएं हैं। वाह क्या बात है।
मुफ्त की योजनाओं की आलोचना रेवड़ी कह कर की जाती है।
बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह वाली कहावत चरितार्थ होते दिख रही है।
बड़े मियां और छोटे मियां दोनों ही कट्टर भी हैं और ईमानदार भी है। शेष सभी सियासी दल सवालों के घेरे में हैं?
बड़े मियां ने कहा 70 वर्ष देश में कुछ हुआ ही नहीं। छोटे मियां ने बाकायदा बड़े मियां के सुर में सुर मिलाते हुए विज्ञापनों में दर्शाया दिया,70 वर्ष कुछ नहीं हुआ।
इनदिनों एक मुद्दा पब्लिक डोमेन में चर्चित है। यह मुद्दा है, जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले कुछ सुसंस्कृत लोगों की रिहाई का?
इस मुद्दे पर झाड़ू मौन है।
सच में जब एक ही लक्ष्य है कि, चुनाव जीतना है। तो जात-पात धर्म-विधर्म जैसे संवेदनशील मुद्दों को दर किनार करना ही कट्टर ईमानदार होने का प्रमाण है।
गोलमाल है भाई सब गोलमाल है
आम आदमी को सिर्फ इतंजार करना है। आम आदमी की नियति है, वादों को सुनना और उन्हें पूरा होने का इंतजार करना है।
हम इंतजार करेंगे तेरा
कयामत तक,इंतजार करेंगे।
कयामत भी अटल है।
बात शुरू हुई हाला से तो मधुशाला को कैसे भूल जाएं।
मधुशाला महाकाव्य का एक छंद प्रस्तुत है।
बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
‘होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले’
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।
सब नीति गत होगा। एक तकनीकी मुद्दा है। देश का कानून नीति से बड़ा होता है। यह बात सिर्फ समझदार लोगों को ही ध्यान में रखना है।
बड़े और छोटे मियां को निरंतर चुनाव जीतने की शुभकामनाओं के साथ अग्रिम बधाई।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

