बी सिवरामन अनुवाद : महेश राजपूत
ग्यारह साल पहले, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, भाजपा के प्रमुख लक्ष्यों में से एक राज्यों से क्षेत्रीय व अन्य विपक्षी दलों को सत्ताच्युत करना था। इस रणनीति का एक अंश दक्षिणी राज्यों, जहां भाजपा की उपस्थिति नगण्य थी, में पैर पसारना भी था।
अब एक दशक के बाद उड़ीसा को छोड़कर, भाजपा किसी दूसरे राज्य में अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल नहीं रही है। उनकी जगह सत्ता में आने की बात जाने दें, भाजपा इन दक्षिणी राज्यों में सत्तारूढ़ दलों को कोई खास नुकसान तक नहीं पहुँचा पाई है।
काँग्रेस राजनीति की भी विडंबना बनी हुई है। काँग्रेस के अखिल भारतीय नेतृत्व ने चुनावी राजनीति में अपनी जगह और खोया जनाधार पाने के लिए पिछड़ों का कार्ड मुख्य राजनीतिक उपकरण के तौर पर खेलने का निर्णय किया है।
लेकिन, विडंबना है कि काँग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्रियों में से एक मात्र ओबीसी मुख्यमंत्री कर्नाटक में है – सिद्धारमैया और उन्हें भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, वह भी किसी और से नहीं बल्कि एक काँग्रेसी – अपर कास्ट वोक्कलिगा नेता डीके शिवाकुमार – से ही।
काँग्रेस के शासन में दूसरे राज्य तेलंगाना में काँग्रेस के मुख्यमंत्री को ओबीसी चुनौती दे रहे हैं। ओबीसी संगठनों ने कुछ दिन पहले सफल तेलंगाना बंद किया था। जमीनी सच्चाई है कि काँग्रेस के तीन में से दो अपर कास्ट से हैं। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू राजपूत हैं और तेलंगाना मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी रेड्डी समुदाय से जो अपर कास्ट है।
यह दिखाता है कि विपक्षी राजनीतिक रिकवरी की गतिकी जटिल है। यह राज्य स्तरीय कारकों से निर्देशित है। काँग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी लेकिन काँग्रेस की विरोधाभासी जमीनी सच्चाईयों के बावजूद अपने ओबीसी समर्थक मुद्दे को टिकाए रखना चाहते हैं खासकर दक्षिणी राज्यों में जहां काँग्रेस की उपस्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है।
इस लेख में उक्त दोनों परिघटनाओं को समझने के लिए हम दक्षिणी राज्यों की राजनीति की पड़ताल करेंगे। इस बीच, चुनाव आयोग ने दक्षिणी राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की है। भाजपा विरोधी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। यह विरोध तमिलनाडु और केरल में चुनावी अभियान में गुणात्मक नया तत्व जोड़ेगा और इसका अन्य दक्षिणी राज्यों में भी प्रभाव हो सकता है, खासकर यदि बड़े पैमाने पर चुनिंदा मतदाताओं के नाम काटे गए तो।
तमिलनाडु : चूंकि विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई 2026 में होने वाले हैं, इसलिए राज्य में राजनीतिक तौर पर चुनावी बुखार जकड़ चुका है। मुख्य मुद्दा है कि चुनावी लड़ाई द्विपक्षीय होगी या त्रिकोणीय। ज्यादा ठोस अर्थों में क्या लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा गठित नई पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी और सत्तारूढ़ डीएमके और विपक्षी एआईएडीएमके-भाजपा मोर्चों से भिड़ेगी या एआईडीएमके-भाजपा विजय को अपने पाले में खींचने में सफल होंगे।
विजय की अपील युवाओं में ज्यादा थी, खासकर पार्टी लॉन्च करते समय इसके इस दावे के कारण कि वह डीएमके और भाजपा का विकल्प देंगे। अब किसी तरह का विचलन विजय के लिए राजनीतिक हाराकिरी साबित हो सकता है।
इसके अलावा, चूंकि एआईएडीएमके-भाजपा गठजोड़ इस नए चुनावी कसौटी पर अब तक न कसे गए दल को ज्यादा सीटें नहीं दे सकते और विजय हाशिये के खिलाड़ी बन कर रह जाएंगे और उससे उनकी शुरुआती अपील को भी नुकसान ही होगा। करूर भगदड़ से काफी हद तक पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा है और ऐसे में इस तरह का आत्मघाती चुनाव पूर्व गठजोड़ इसकी पहली चुनावी परीक्षा से पहले पार्टी का समाधि लेख बन सकता है।
चुनाव का दूसरा केन्द्रीय मुद्दा है कि आने वाले चुनावों में डीएमके को किस कदर नुकसान होगा। पहली बात, सत्तारोधी लहर तो है है, दूसरी बात चुनावी गणित बदल चुका है। भाजपा और एडप्पाडी पलनीस्वामी नीत एआईएडीएमके का फिर साथ आना, हालांकि यह 2021 में अलग हो चुके थे, ने दोनों का मनोबल बढ़ाया है।
243 सदस्यीय विधानसभा में 188 सीटों पर लड़कर डीएमके ने 133 सीटें जीती थीं और एआईएडीएमके 191 से 66 पर अटक गई थी। वोट शेयर के मामले में एआईएडीएमके को 33.29 फीसदी वोट मिले थे जबकि डीएमके को 37.7 फीसदी। डीएमके गठबंधन को कुल मिलकर 45.7 फीसदी वोट शेयर के साथ 159 सीटें मिलीं और एआईएडीएमके-भाजपा गठजोड़ को 40 फीसदी वोट शेयर के साथ 75 सीटें मिलीं।
केवल 5.7 फीसदी वोट के अंतर के कारण डीएमके गठजोड़ के खिलाफ 3 फीसदी से अधिक वोट स्विंग नतीजों और सीटों की संख्या में बड़ी तब्दीली ला सकता है। इस तरह डीएमके शासन चुनावी तौर पर उतना मजबूत नहीं दिख रहा। क्या विजय की पार्टी इतने ज्यादा डीएमके विरोधी वोट एआईएडीएमके के पास जाने से रोक पाएगी कि डीएमके को फायदा हो या फिर वह गैर-एआईएएडीएमके वोट डीएमके के वोट से छीन लेगी और एआईएडीएमके को फायदा होगा?
2021 में डीएमके गठजोड़ ने 54 सीटें 5000 वोटों से कम के अंतर से जीती थीं, यह देखते हुए कहा जा सकता है कि एम के स्टालिन व उसके सहयोगियों की जमीन कमजोर है। यदि डीएमके गठजोड़ आने वाले चुनाव में थोड़ी कम सीटों के साथ भी जीतने में कामयाब होता है तब भी वैचारिक धरातल पर द्रविड मॉडल की चमक मद्धिम आने वाले चुनाव में पड़ सकती है। एआईएएडीएमके का राज्य में मजबूत जनाधार है, जो भाजपा का नहीं है और इसलिए वह गठजोड़ में बड़े भाई की भूमिका में है।
राजनीतिक रूप से लेकिन, चूंकि भाजपा केंद्र में सत्ता में है और एआईएडीएमके आंतरिक विभाजन और गुटबाजी से त्रस्त, भाजपा उसकी बांह मरोड़कर ज्यादा सीटें हथिया सकती है। कुछ भाजपा नेताओं ने पुराने एमजीआर फार्मूले, अर्थात विधानसभा चुनाव में एक तिहाई सीटें केंद्रीय पार्टी के लिए और दो तिहाई सीटें क्षेत्रीय पार्टी के लिए और लोकसभा चुनाव में इसका उल्टा, का राग पहले से ही छेड़ दिया है।
इससे एआईएडीएमके के दूसरी पंक्ति के नेताओं में निराशा फैल सकती है और इसीलिए एआईएडीएमके कार्यकर्ताओं में यह बात भी चल रही है कि पार्टी भाजपा के बदले विजय से गठजोड़ करे। खैर, यदि भाजपा गठजोड़ के कारण और डीएमके के खिलाफ सत्तारोधी लहर के कारण दहाई में सीटें भी जीत लेती है तो दावा करेगी कि उसने तमिलनाडु के अभेद्य द्रविड़ किले, जहां लोग मूल रूप से केंद्र विरोधी होते हैं, का मिथक तोड़ दिया है।
चुनावी अर्थ में डीएमके सरकार द्रविड मॉडल पर अपना दावा मुख्य रूप से तमिलनाडु में परिवारों की मुखिया महिलाओं को 1000 रुपये मासिक देने के कारण है। यह देखना होगा कि क्या भाजपा-एआईएडीएमके गठजोड़ इसका प्रभाव बड़ी रकम से कम कर सकता है क्या, बिहार चुनावों में भाजपा ने 10 हजार रुपये महिलाओं के खातों में जमा करवाए थे।
हालांकि महत्वपूर्ण फर्क यह है कि डीएमके का 1000 रुपये मासिक भुगतान है जो सीधे राज्य के सरकारी खजाने से आता है जबकि बिहार में मोदी के 10 हजार रुपये के वायदे के अनुसार यह एक बार का भुगतान होगा जो बैंक स्वरोजगार के लिए सेल्फ हेल्प समूहों की लगभग 1.2 करोड़ महिलाओं, अधिकांश जीविका दीदियों में बांटेगी।
दूसरे शब्दों में किसी महिला को दस हजार रुपये मिलेंगे या नहीं यह स्थानीय बैंक शाखा प्रबंधक पर निर्भर करेगा और ऐसी स्वरोजगार मदद के लिए कैवीएट भी जुड़े होंगे। चूंकि डीएमके जनवादी लोकलुभावन के पुराने खिलाड़ी हैं, तमिलनाडु में बीजेपी के प्रतिस्पर्धात्मक लोकलुभावन को मुश्किलें पेश आएंगी ही।
एक और संदर्भ में राज्य की राजनीति पूर्वोत्तर मानसून के दौरान बार बार आने वाली बाढ़ से निबटने की तैयारियों के जाल में भी फंसी है। 2021 के बाढ़ ने चेन्नई में तबाही मचाई, 2023 की बाढ़ ने दक्षिणी जिलों को नुकसान पहुंचाया और 2015 के अभूतपूर्व दु:स्वप्न ने राज्य की राजधानी को डुबो ही दिया था। ऐसी तबाही का दोहराव हुआ तो सत्तारूढ़ डीएमके के लिए चुनाव पूर्व यह बड़ी राजनीतिक आपदा होगी।
इस तरह चुनावी अभियान इस समय डीएमके नेताओं के बारिश प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री की जांच के लिए पानी में उतारने के लिए अपनी कमर कसने पर केंद्रित है। विपक्ष बारिश प्रभावित लोगों के विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में लगा है। वर्तमान चुनाव पूर्व बारिश ने हालांकि चुनावी गर्मी को कम नहीं किया है।
इस बीच, दूसरे सबसे विकसित राज्य में आम लोगों को हाथों में खर्च की जा सकने वाली नकदी दिख रही है। टीएएसएमएसी दुकानों, जो तमिलनाडु में सरकार के स्वामित्व वाली शराब बिक्री की दुकानें हैं, ने दिवाली के दिन 790 करोड़ रुपये की बिक्री दर्ज की।
केरल : पड़ोसी केरल, दूसरा राज्य है जहां मई 2026 से पहले चुनाव होने हैं। यहाँ सोने की चमक लाल की आभा को मद्धिम कर रही है। 2018-19 में सामने आए सोना तस्करी स्कैन्डल में फंसी माकपा नीत पिनराई विजयन सरकार अब मंदिर सोना घोटालों की शृंखला से परेशान है।
सोना तस्करी घोटाले में एलडीएफ सरकार के स्वामित्व वाली केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड का एक पूर्व अधिकारी स्वप्ना सुरेश, जो रंगे हाथ पकड़ा गया था, ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर आरोप लगा दिया कि उन्होंने कूटनीतिक चैनलों के जरिए गैरकानूनी आयात से सोना तस्करी का रास्ता साफ किया था।
स्वप्ना सुरेश पर 2023 में छह करोड़ रुपये का जुर्माना लगा था लेकिन पिनराई विजयन किसी तरह अदालतों की कार्रवाई से बच गए। लेकिन उनकी सरकार की छवि तो खराब हुई ही है।
अब, चुनावी राज्य में सोना चोरी की घटनाओं की शृंखला दिखाई दे रही है। सबरीमाला और गुरुवायुर मंदिरों में सोना स्कैन्डल उनकी सरकार की छवि बिगाड़ रहे हैं क्योंकि उनकी सरकार केरल देवास्वम बोर्ड को प्रशासित करती है जो कि इन मंदिरों का संचालन करता है।
सबरीमाला सोना घोटाला तब विस्फोटक हो गया जब एक एसआईटी द्वारा अदालती जांच के दौरान बताया गया कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर को दान में दिए गए सोने में एक पूर्व देवास्वम बोर्ड कर्मचारी मुरारी बापू और उनीकृष्णन (उसी के लगाए मंदिर अधिकारी) ने घोटाला किया था। एसआईटी सितंबर में गड़बड़ी की शिकायत के बाद अदालत के आदेश से बनी थी। दोनों को अब एसआईटी ने गिरफ्तार किया गया है और यह एलडीएफ नेताओं के करीबी माने जाते हैं।

एलडीएफ नेतृत्व से उनकी करीबी और मंदिर का सोना कैसे कुछ मूर्तियों की गोल्ड प्लेटिंग के नाम पर किया गया, का विवरण अब सामने आ रहा है। केरल में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति सोने का उपभोग किया जाता है। हर साल 200-225 टन सोना राज्य में उपभोग किया जाता है। प्रसिद्ध मंदिरों की समृद्धि मुख्य रूप से सोने के आभूषणों के कारण है। सबरीमाला सोना घोटाले के बाद गुरुवायुर मंदिर में सोना घोटाले का खुलासा हुआ, जब 2019 में की गई ऑडिट की रिपोर्ट अब सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार मंदिर के खजाने से सोने की कई चीजें गायब हैं। इसके बाद कई अन्य मंदिरों में भी सोने की चोरी के आरोप लग रहे हैं, उदाहरण पूमथरेईशा मंदिर। धीरे-धीरे लोगों के जहाँ में यह बात बैठने लगी है कि यह केवल मंदिरों में हो रहे घोटाले नहीं हैं बल्कि केरल देवास्वम बोर्ड, जो एलडीएफ के नियंत्रण में है, भ्रष्टाचार में धंसा है। एलडीएफ जो सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के कारण नैतिकता के ऊंचे स्थान पर बैठ था, भ्रष्टाचार के कीचड़ में धँसने लगा है।
विडंबना ही है कि गुरुवायुर और सबरीमाला मंदिरों की पवित्रता नष्ट न होने देने के कारण महिलाओं को प्रवेश नहीं करने देते थे। पर ऐसा लग रहा है कि इन पवित्र रूढ़िवादी संस्थानों का नेतृत्व कुछ चोर कर रहे हैं।
पिनराई विजयन जो वाम खेमे में शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे हैं, ने सभी असंतुष्टों को किनारे कर आंतरिक असंतोष को समाप्त कर दिया है। पर यह शक्तिशाली नेता चुनावों के बाद अपनी इस छवि की परछाई भी नहीं रह जाएगा यदि चुनाव हार गया तो। अनुमान है कि यूडीएफ चुनाव जीतने वाला है। पिनराई विजयन माकपा के निर्विवाद बॉस हैं और इसकी केन्द्रीय समिति और महासचिव पर भी हावी हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि जब यह नेता, जिसे देश के वाम आंदोलन पर सबसे बुरा अफसरशाही श्राप माना जाता है, की हार के बाद माकपा का क्या होगा?
कर्नाटक : कर्नाटक में केन्द्रीय राजनीतिक सवाल अब यह बन गया है कि क्या मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपना पूरा कार्यकाल पद पर बने रहेंगे? उनके बेटे यतीन्द्र सिद्धारमैया के हाल में इस असामान्य दावे कि उनके पिता अपना कार्यकाल पूरा करेंगे, ने मीडिया में हलचल मचा दी है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार उनके शासन में सब कुछ सामान्य नहीं है। मई 2023 से शुरू किए अपने दूसरे कार्यकाल में सिद्धारमैया निश्चिंत दिखाई दे रहे थे। उन्होंने विपक्षी भाजपा को खत्म कर दिया था। कर्नाटक में भाजपा बुरी स्थिति में है। उसका चुनावी आधार एक बिन्दु पर अटक गया है। 2018 में उसका वोट शेयर 36 फीसदी था। तब पार्टी ने 104 सीटें जीती थीं और सरकार बनाई थी। 2023 में उसका वोट शेयर वही यानि 36 फीसदी रहा लेकिन इसे केवल 66 सीटें मिलीं।
काँग्रेस का वोट शेयर हालांकि 38.4 से बढ़कर 42.88 हो गया और इसने 135 सीटें जीतकर सरकार भाजपा से छीन ली। गुटबाजी, अंदरूनी कलह के कारण भाजपा इतनी बुरी स्थिति में है कि अब तक वह सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ सत्तारोधी लहर का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं है।
दूसरी तरफ, एक मजबूत स्थिति से अचानक सिद्धारमैया की मुख्यमंत्री के रूप में स्थिति डगमगाने लगी है। लेकिन, चुनौती भाजपा की तरफ से नहीं है। वह अपनी ताकत को बड़ी चुनौती का सामना काँग्रेस के अंदर से ही कर रहे हैं। उनके मंत्रिमंडल में नंबर दो पर डीके शिवकुमार उनकी जगह लेना चाहते हैं। इसने कर्नाटक काँग्रेस में शक्ति संघर्ष को पैदा किया है।
अब तक तो डीके शिवकुमार अपने पत्ते सावधानी से खेल रहे हैं। वह काँग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के खिलाफ जाकर सिद्धारमैया की जगह नहीं लेना चाहते। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वकांक्षा को छुपा भी नहीं रहे हैं, भले वह खुलकर बगावत नहीं कर रहे उसके लिए। वह आलाकमान के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। यह नाजुक मामला है।
उधर सिद्धारमैया ने भी अभी अपने समर्थक विधायकों की कोई परेड नहीं कराई कि काँग्रेस आलाकमान को खतरे का संकेत मिले कि वह कर्नाटक में अशोक गहलोत की भूमिका करने वाले हैं। अब, अपने बेटे के जरिए उन्होंने दावा किया है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। इस बीच, डीकेएस का खेल बिगाड़ने के लिए गृह मंत्री और दलित नेता जी परमेश्वर ने भी अपना पासा फेंक दिया है।
यतीन्द्र सिद्दरमैया ने डीकेएस का दावा विफल करने के लिए सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी के रूप में सतीश झरखोली का नाम भी प्रस्तावित किया है जो प्रदेश काँग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और बेलगाँव से विधायक हैं। वह एसटी वाल्मीकि नायक समुदाय से आते हैं। इस तरह, कर्नाटक काँग्रेस में बहुध्रुवीयता उभरती दिखाई दे रही है। काँग्रेस आलाकमान यथास्थिति बनाए रखना चाहेगा या व्यवस्थित परिवर्तन ला पाएगा यह अंतर्निहित सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करेगा।
काँग्रेस भले डीकेएस को अपना वोक्कालिगा चेहरा बताकर देवेगौड़ा के प्रभाव से दूर कर प्रभावशाली वोक्कालिगा जाति में बहुसंख्य लोगों का समर्थन जीत रही है, लेकिन अपना मूल ओबीसी-मुस्लिम-दलित सामाजिक गठजोड़ कमजोर नहीं कर सकती जो कि उसे सत्ता में टिकाए हुए है। इस तरह कर्नाटक में राजनीतिक हालात जटिल हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि बदलाव कैसे आता है।
इस प्रक्रिया को जो दूसरा कारक प्रभावित कर रहा है वह है जाति सर्वेक्षण। अपना ओबीसी आधार मजबूत करने के लिए, सिद्धारमैया सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में 2014 में जाति सर्वे कराया था। जाति सर्वे के नतीजे काफी समय तक नहीं प्रकाशित किए गए, जिसका कारण सर्वे में कमियाँ बताया गया। हालांकि वास्तव में अपर कास्ट के विरोध के डर से ऐसा किया गया।
राहुल गांधी ने जाति सर्वे की मांग को अपने ओबीसी कार्ड को मजबूत करने के लिए उछाला लेकिन मोदी ने अगली जनगणना में जाति गणना की बात मानकर इसकी हवा निकाल दी। इसके बावजूद इसे सरसरी सर्वे बताते हुए काँग्रेस नेतृत्व ने काँग्रेस शासित राज्यों में प्रदेश स्तरीय जाति सर्वे का आह्वान किया। इस तरह सिद्धारमैया सरकार ने अब फिर से जाति सर्वे कराने का आदेश दिया, जिसमें लेकिन पुराने कारणों से ही देरी हो रही है।
कर्नाटक काँग्रेस की अपर कास्ट लॉबी जिसमें डीकेएस खुद भी शामिल हैं, ने सर्वे पर कई सवाल लगाए हैं। कुछ दलित संगठनों ने भी इसका विरोध किया है क्योंकि कुछ दलित उप जातियों की गणना को छोड़ दिया गया है। सुधा मूर्ति और इंफ़ोसिस संस्थापक नारायण मूर्ति के जाति सर्वेक्षण के खुलेआम जातीय और बेतुके विरोध ने भी विवाद को मजबूत किया।
पूरी आशंका है कि दूसरे जाति सर्वेक्षण का भविष्य भी पहले सर्वे से अलग नहीं होगा चूंकि इसने पहले ही ओबीसी समर्थक होने का उद्देश्य हासिल कर लिया है।
जाति राजनीति से दूर जाएँ तो कर्नाटक काँग्रेस सरकार की हाल में कॉर्पोरेट जगत से किरण मजूमदार शॉ और पई ने बेंगलुरू की खराब सड़कों को लेकर आलोचना की है। साइबरसिटी के गड्ढे राजनीतिक गड्ढों में बदल गए हैं।
आंध्र प्रदेश : आंध्र प्रदेश में 15 बिलियन डॉलर का अडानी-गूगल डाटा केंद्र स्थापित करने का फैसला मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की निजी जीत के रूप में दर्शाया जा रहा है। वह अल्पसंख्यक मोदी सरकार को बाहर से समर्थन करने के फायदे उठाते देख रहे हैं। लेकिन, चूंकि डाटा सेंटर बिजली और पानी खूब खींचते हैं तो तटीय विशाखापत्तनम के नाजुक पारिस्थितिकी यंत्र पर इसका पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा और स्थानीय लोगों पर सामाजिक असर क्या होगा, यह देखना होगा।
मुख्यमंत्री के बेटे और आंध्र प्रदेश के मानव संसाधन मंत्री नारा लोकेश की अवांछित टिप्पणी कि पड़ोसी कर्नाटक और तमिलनाडु डाटा सेंटर हासिल करने में आंध्र प्रदेश की जीत से जल रहे हैं, ने उन्हें एक अपरिपक्व व्यक्ति के रूप में ही दिखाया है। चंद्रबाबू नायडू के आस-पास एक जोखिमकारी द्विध्रुवीयता दिख रही है। संख्या के आधार पर सबसे बड़े कापू समुदाय के वोटों को साधने के लिए चंद्रबाबू ने पवन कल्याण को उप मुख्यमंत्री बनाया है।
खुद को हिन्दुत्व योद्धा के रूप में पेश कर पवन कल्याण ने भविष्य में बड़ी महत्वकांक्षाओं का प्रदर्शन किया है। दूसरी तरफ चंद्रबाबू अपने बेटे नारा लोकेश को भी अपने उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं। उन्हें हाल में ऑस्ट्रेलिया की यात्रा पर भी भेजा गया ताकि वह अधिक वैश्विक व्यवसायिक एक्सपोजर पा सकें। चंद्रबाबू नायडू और नारा लोकेश जिस कम्मा समुदाय से आते हैं राज्य की आबादी का केवल 4.8 फीसदी है। लेकिन कापू समुदाय जिससे पवन कल्याण आते हैं 24.7 फीसदी है।
हालांकि, कम्मा लोग ज्यादा व्यावसायिक समझ रखते हैं और कम्मा बुर्जुआ बहुत शक्तिशाली हैं जबकि कापू मुख्य तौर पर कृषि समुदाय है। पवन कल्याण की छवि रूढ़िवादी की है जबकि नारा लोकेश की पाश्चात्य व्यवसाय समर्थक की छवि है। दोनों के बीच भविष्य में टकराव अपरिहार्य है।
किसानों की आत्महत्या की घटनाएं अब भी आंध्र प्रदेश में हो रही हैं हालांकि संख्या कम हुई है और सूखाग्रस्त रायलसीमा में ही नहीं श्रीकाकुलम में भी हो रही हैं। व्यवसाय मित्र की छवि के कारण चंद्रबाबू नायडू किसान समुदाय से दूर हुए और 2004 व 2019 में चुनाव हारे थे। नारा लोकेश भी उसी साँचे में ढल रहे हैं। और जगन मोहन रेड्डी रफ्तार पकड़ रहे हैं। क्या चंद्रबाबू और उनके बेटे को तीसरी बार हार की त्रासदी का सामना करना होगा?
तेलंगाना : हैदराबाद ने हाई टेक हब के रूप में बेंगलुरू को पछाड़ दिया है। यह न केवल नौकरियां पैदा कर रहा है, आंध्र के ज्यादा कुशल प्रवासी कर्मचारियों के खिलाफ नफरत भी पैदा कर रहा है। तेलंगाना की विभिन्न सरकारों को तेलंगाना के बाकी हिस्सों की उपेक्षा कर हैदराबाद को विकसित करने के लिए ज्यादा ध्यान और संसाधन लगाने के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ती रही है। हालांकि विभिन्न सत्तारूढ़ पार्टियां तेलंगाना की चमक का राजनीतिक फायदा उठा नहीं पाई हैं।
ठेकेदारों और रियल एस्टेट प्रोमोटरों द्वारा जमीन हड़पने, जमीन घोटालों के खिलाफ किसानों के विरोध प्रदर्शन आम हो चुके हैं। स्थानीय युवाओं में प्रवासियों द्वारा नौकरियां पाने को लेकर असंतोष भी है। ओसमानिया छात्रों ने कैम्पस में पेड़ काटे जाने का विरोध किया क्योंकि सरकारी जमीन रियल एस्टेट माफिया को सौंपी जा रही थी। अधिकतर रेड्डी जमींदार हैं। उतने ही ताकतवर वेलामा जमींदार हैं, हालांकि इनकी संख्या कम है।
टीआरएस (अब बीआरएस) चंद्रशेखर राव खुद ताकतवर जमींदार हैं जो वेलामा समुदाय से आते हैं। सिंचाई विकास के नाम पर ग्रामीण अमीरों की सेवा कर उन्होंने केवल भ्रष्ट ठेकेदार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया। भ्रष्टाचार ने न सिर्फ बीआरएस को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया बल्कि चंद्रशेखर राव परिवार को विभाजित भी कर दिया। उनकी बेटी ने शराब घोटाले की लूट का हिस्सा अपने से साझा करने से इनकार कर दिया।
लोगों के असंतोष के कारण काँग्रेस सत्ता में आई और रेवंत रेड्डी 2023 में मुख्यमंत्री बने। रेवंत रेड्डी सरकार ने जीओ यानि सरकारी आदेश के जरिए तेलंगाना स्थानीय निकायों में 42 फीसदी सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित कीं और तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 9 अक्टूबर के निर्णय पर रोक लगा दी। रेवंत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर को उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश हटाने से मना कर दिया।
ओबीसी रेवंत से खफा हैं कि उन्होंने संविधान की नौवीं सूची में शामिल टिकाऊ विधेयक के बजाय ओबीसी के लिए आरक्षण सरकारी आदेश के जरिए लाया। 136 ओबीसी की संयुक्त कृति समिति ने 18 अक्टूबर को एक सफल बंद का आयोजन किया। 2024 के तेलंगाना जाति सर्वेक्षण के अनुसार तेलंगाना में ओबीसी 56.33 फीसदी हैं। उनका छिटकना रेवंत रेड्डी के लिए भारी पड़ सकता है।
भाजपा वापसी करती दिखाई दे रही है। पार्टी ने मार्च में हुए चुनाव में 3 म्यूनिसिपल सीटों में से दो सीटें जीत लीं। भाजपा धनी लोगों में माओवादियों को हुए नुकसान और मनोबल गिरने से आत्मसमर्पण की शृंखला का श्रेय ले रही है। स्थानीय निकाय चुनाव 31 अक्टूबर से शुरू हुए। नवंबर में हुए जुबली हिल्स उपचुनाव हालांकि काँग्रेस ने जीत लिया है पर यह देखना होगा कि निकट भविष्य में पार्टी सत्तारोधी लहर का सामना कैसे करेगी।