रामस्वरूप मंत्री
देश का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य साफ तौर पर इशारा कर रहा है कि राजनीतिक दलों को देश की तनिक भी चिंता नहीं है। कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दल घरेलु कलहों और खींचतान में उलझे हैं तो वहीं तमाम दूसरे दल भी अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के अनुसार तोल-मोल कर बोल और फूंक-फूंककर कदम उठा रहे हैं। राजनीतिक दलों के इस व्यवहार के चलते देश और जनहित हाशिये पर खड़े दिख रहे हैं। सत्तासीन भाजपा की पूरी कोशिश आगामी चुनाव में विरोधियों को धूल चटाकर एक बार फिर सत्ता हासिल करने की है तो वहीं पिछले लगभग एक दशक से सत्ता का बनवास भोग रही कांग्रेस भी सत्ता पाने को बेताब दिख रही है।
राष्ट्रीय स्तर के इन दो बड़े दलों की सत्ता में बने रहने और सत्ता हासिल करने की महत्वांकाक्षा और संघर्ष के मध्य देश और जनता के हित बुरी तरह पिस रहे हैं। पिछले डेढ साल से कोरोना महामारी में लाखों लोगों ने अपनी जान गवा दी है इनमें से अधिकांश इलाज उपलब्ध ना होने और दवाई के अभाव में मरे हैं बावजूद इसके सत्तासीन दल व्यवस्था में सुधार के बजाय केवल बयानबाजी में ही उलझे हुए हैं। सीमापार से चीन और पाकिस्तान लगातार आंखे दिखा रहे हैं तो वहीं देश की जनता मंहगाई, बेरोजगारी, बिजली, पानी और भुखमरी जैसी अनगिनत समस्याओं से बुरी तरह बेहाल है, आर्थिक स्थिति डांवाडोल है, जल-जंगल और जमीन तबाही की कगार पर है और किसान और मजदूर आत्महत्या को विवश हैं और इन तमाम परेशानियों और दुश्वारियों के बीच बड़ी निर्लज्जता से राजनीतिक दल सेवा का भाव त्याग कर सत्ता का मेवा खाने और बटोरने में लगे हैं।
मीडिया भी सत्ता की पसंद और नापसंद के हिसाब से आम आदमी की परेशानियों की बजाय राजनीतिक दलों की आंतरिक राजनीति, षडयंत्र, उठापटक और कलह को कवर करने में अधिक रूचि ले रहा है। मीडिया की नजर में बेमौत मर रहे लोग, मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, महिलाओं के प्रति घटित होने वाले अपराध और हिंसा, वेश्यावृत्ति, भिक्षावृत्ति, बिजली-पानी की समस्या कोई बड़ी खबर नहीं है। मीडिया के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनावों में भाजपा की या कांग्रेस की स्थिति क्या होगी। आईपीएल में सट्ट्र्रेबाजी में कौन-कौन शामिल हैं, जिया खां ने प्यार में धोखा खाने के बाद आत्महत्या कर ली आदि। लेकिन देश भर में विकट होती आम आदमी की समस्या और पल-पल रूलाती बिजली की समस्या मीडिया की नजर में शायद खबर नहीं है। देश के कई हिस्सों में सूखे की या बाढ की स्थिति हर साल बनती है लेकिन न्यूज चैनल का कैमरा वहां नहीं पहुंच पाता है। मीडिया राजनीतिक दलों के भोंपू और अखबार पार्टी के मुखपत्र की भूमिका निभाते दिख रहे हैं। राजनीतिक दल तो सोची-समझी राजनीतिक के तहत देश की जनता को ध्यान असल समस्याओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों से हटाना चाहते हैं और इसमें मीडिया उसका मददगार बनकर खड़ा है। कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे से लड़ते जरूर दिखे लेकिन जहां तक राजनीतिक दलों को कानून में बांधने या लगाम लगाने के मुद्दे पर सभी दल किसी निर्णायक मोड़ पर पहुचंने की बजाय मामलों को उलझाते हुए दिखे। असल में राजनीतिक दलों का चरित्र एक समान है। सभी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं और अपने ऊपर किसी तरह की बंदिश और कानूनी घेरा उन्हें पसंद नहीं है।
देश की जनता को भरमाने और मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिये सोची-समझी रणनीति के तहत राजनीतिक दल और नेता एक दूसरे पर तीखी बयानबाजी करने से बाज नहीं आते हैं। टीवी पर बहस के दौरान एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते और आरोप-प्रत्यारोप लगाते नेता देश की जनता के समक्ष ऐसा दृश्य प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं कि जैसे वो राष्ट्र और जनहित में खून-पसीना बहाने को सदैव तत्पर हैं और वेा दूध के धुले हैं। आम आदमी रोज कुआं खोदता और पानी पीता है आम आदमी को आलू-प्याज की कीमतें, पैट्रोल-डीजल और रसोई गैस के भाव इन तमाम खबरों से अधिक महत्व रखते हैं। चीन सीमा का अतिक्रमण कर रहा हो या फिर पाकिस्तान आंतकवाद को हवा दे रहा हो लेकिन आम आदमी की दुनिया पानी, बिजली, सड़क और साग-सब्जी की कीमतों के इर्द-गिर्द ही मंडराती है।
भाजपा और उसके सहयोगी तो अपनी नालाकियों और नाकामियों को छुपाने की कोशिश में जुटे हैं तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी खुद को मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करने में नाकामयाब साबित हुआ। राजनीतिक दल सत्ताप्राप्ति की कोशिशों और जोड़-तोड़ में जुटे हैं। पिछले आठ साल में पच्चीसों बार पैट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी हुई, मंहगाई का आंकडा नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, सरकार की सारी नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमानी अम्बारी जैसे पूंजीपतियों के फायदे के लिए बन रही हैं और इस पर तुर्रा यह है कि सरकार और उसके मंत्री बड़ी बेशर्मी से बढ़ती मंहगाई को परिभाषित कर रहे हैं असल में सरकार के एजेण्डे में आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं है वो केवल भाषणबाजी और नारों तक ही सीमित है।
सरकारी योजनाओं में मची लूट और भ्रष्टाचार ने आम आदमी को उसके वाजिब हक से दूर किया है तो वहीं विकास कार्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। सरकार को अपनी नाकामियों का पूरी तरह इल्म है तो वहीं विपक्षी दल भी रस्मी तौर पर सरकार का विरोध कर अपने कर्तव्य से इतिश्री समझते हैं। सत्तासीन और विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल बखूबी समझते हैं कि देश में विकास का नारा लगाकर जनता को बेवकूफ बनाते रहो और जात-पात, आपसी मतभेद-मनभेद की मदद लेकर वोट बटोरते रहो। इसलिए विपक्ष सरकार के प्रति तीखे तेवर तभी अपनाता है जब संकट स्वंय उसके सिर पर मंडराने लगता है ।
राजनीतिक दलों का चरित्र सत्ता हासिल करना और उसके मजे लूटने से अधिक नहीं है। सरकार यूपीए की रही हो या एनडीए कीहर सरकार अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिशों में जुटी रही है वहीं अन्य विपक्षी दल भी राजनीतिक नफे-नुकसान के हिसाब से चाल चल रहे हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं को सत्ता में बने रहने और सत्ता हासिल करने की चिंता तो है लेकिन उनके एजेण्डे और सोच में आम आदमी और उसकी परेशानियां दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती हैं। अब जनता को ही ये निर्णय लेना होगा कि उन्हें आंखे मंूदकर जात-पात और वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं के पीछे चलना है या फिर आम आदमी के असल मुद्दो के एजेण्डे को तरजीह देनी है।
( लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष हैं)

