1. हम हैं मदर ऑफ डेमोक्रेसी! : राजेंद्र शर्मा
यारों, न विरोधी समझे हैं न समझेंगे मोदी जी की बात! बताइए, मोदी जी के विरोधी ब्राजील की मॉडल की हरियाणा की मतदाता सूची में एंट्री तक का स्वागत करने को तैयार नहीं हैं। उल्टे इसके वोट चोरी का सबूत होने का शोर मचा रहे हैं। मोदी जी की इच्छा से ज्ञानेश बाबू अगर मतदाता सूची को अंतर्राष्ट्रीय बनाने में लगे हुए हैं, उसमें सिर्फ एक प्रदेश के ही नहीं, पूरे देश के और सिर्फ अपने देश के ही नहीं, परदेश के भी लोगों के भी चेहरे लाने में लगे हुए हैं, तो किसलिए? जाहिर है कि भारत की डेमोक्रेसी को इंटरनेशनल बनाने के लिए। आखिर, हमारी डेमोक्रेसी, मदर आफ डेमोक्रेसी है या नहीं?
पर सिर्फ मदर ऑफ डेमोक्रेसी होने से ही क्या होगा? दुनिया से मनवाना भी तो पड़ेगा कि डेमोक्रेसी की मम्मी हमारे पास हैं। वर्ना जंगल में मोर नाचा, किसने देखा? और दुनिया हमारे कहने से ही थोड़े ही मान लेगी हमारे पास डेमोक्रेसी की मम्मी हैं। दुनिया सबूत मांगेगी। और अब हम भी उसके मुंह पर सबूत दे मारने की स्थिति में होंगे। हमारी मतदाता सूची में ब्राजीलियाई मॉडल का नाम है और वह भी एक बार नहीं, बार-बार, पूरे बाईस बार! और किसी देश में ऐसी अंतर्राष्ट्रीय मतदाता सूची होगी क्या? और सुनते हैं कि ब्राजीलियाई मॉडल की तस्वीर के साथ, दर्जनों वोट पड़े भी थे। यानी हरियाणा में डेमोक्रेसी को ब्राजीलियाई मॉडल ने जमकर सहारा दिया है।
होने को तो दुनिया में डेमोक्रेसी में और बहुत कुछ भी है, बहुत सी वैराइटी हैं। अमरीका के ट्रंप और तुर्किए के एर्दुआं जैसे कहने को चुनाव से बने राष्ट्रपति हैं, जो खुद को पुराने जमाने के बादशाहों से कम नहीं समझते हैं। पड़ोस में पाकिस्तान जैसे और आगे बांग्लादेश में होने जा रहे चुनाव हैं, जिनमें चुनाव तो होता है, लेकिन विपक्ष नहीं होता है। और तो और नेतन्याहू जैसे नेता भी हैं, जो नेता तो चुनाव से बने हैं, पर ऐसे चुनाव में जिसमें जिस आबादी पर राज कर रहे हैं, उसके बड़े हिस्से को वोट देने का अधिकार ही नहीं है। ऐसी-ऐसी ढीली डेमोक्रेसी भी हैं, जहां नागरिक को वोट देने का मौका मिलता है, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में रहता हो। और भी बहुत कुछ। पर मतदाता सूची के ऐसे अंतर्राष्ट्रीयकरण की हमारे जैसी दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी।
दुनिया झख मारकर मानेगी — यही है मदर ऑफ डेमोक्रेसी!
फिर भी हमारी मतदाता सूचियों में ही मदर ऑफ डेमोक्रेसी के लक्षण और भी बहुतेरे हैं। सुना है कि हरियाणा में ही मतदाता सूची में एक माताजी के फोटो के साथ पूरे 222 वोट पाए गए हैं। लाखों वोटर हैं, जिनका पता संख्या वाला शून्य है या अक्षरों में शून्य है यानी अ, ब, स, द वगैरह। हजारों वोटर, छोटे-छोटे घरों में सैकड़ों की तादाद में, मुर्गियों की तरह भी नहीं, शायद कबूतरों की तरह रहते हैं। हजारों वोटर हैं, जिन्हें एक व्यक्ति एक वोटर की कैद मंजूर नहीं है और एक व्यक्ति, अनेक वोटर बनकर रहने की आजादी पसंद करते हैं, आदि, आदि। बेशक, ये सब भी हैं तो डेमोक्रेसी की मम्मी वाले लक्षण ही। फिर भी जो वजन ब्राजीलियाई मॉडल को भारतीय जनतंत्र का महत्वपूर्ण सहारा बनाने में है, वह दूसरे छोटे-मोटे लक्षणों में कहां है!
लेकिन, कोई इससे यह नहीं समझे कि हमारा मदर ऑफ डेमोक्रेसी का दावा सिर्फ अनोखी मतदाता सूचियों पर ही टिका हुआ है। हर्गिज नहीं। वैसे हमारी मतदाता सूचियों का अनोखापन भी सिर्फ किसी ब्राजीलियाई मॉडल का मोहताज नहीं है। बेशक, मोदी जी की ही इच्छा से, ज्ञानेश गुप्ता जी के विशेष शुद्धिकरण की गंगा में नहाकर निकली मतदाता सूचियां तो अपने आप में एक अजूबा हैं। देखा नहीं कैसे बिहार में एक-दो नहीं, दस-बीस नहीं, सैकड़ों नहीं, दसियों हजार लोग जब पहले चरण में गांव-मोहल्ले के नजदीक के मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि मतदाता सूचियों को तो उनके नाम से ही शुद्ध कर दिया गया है। जाहिर है कि गरीब-गुरबा की गंदगी जितनी कम होगी, सूची उतनी ही ज्यादा स्वच्छ होगी। मतदाता सूचियों की जो सफाई कराने की बीस साल में किसी की हिम्मत नहीं हुई, वह सफाई मोदी-ज्ञानेश की जोड़ी करा रही है और ऐरों-गैरों से मतदाता सूची को स्वच्छ करा रही है।
लेकिन, स्वच्छता लाने का मतलब सिर्फ कूड़ा-कर्कट हटाना ही थोड़े ही है। स्वच्छता का मतलब मतदाता सूचियों में सलमा-सितारे टांकना भी है। जुगल जोड़ी ने सूचियों में सितारे भी खूब ही टांके हैं। तभी तो मोदी जी की पार्टी के पूर्व सांसद, पहले संसद के चुनाव में और फिर इसी साल के शुरू में विधानसभा के चुनाव में दिल्ली में वोट डालने के बाद, साल खत्म होने से पहले ही बिहार में वोट डाल आए। और सिर्फ पूर्व सांसद जी ही थोड़े ही, मोदी जी की पार्टी के दूसरे कई नेता, दिल्ली के बाद बिहार में वोट डाल आए। और उत्तराखंड समेत दूसरे कई राज्यों के नेता भी। और ये तो वो नेता हैं, जो ढोल पीटकर, राज्य बदल-बदलकर वोट डालते देखे गए। जो सैकड़ों किसी ब्राजीलियाई मॉडल या किसी बुजुर्ग दादी की फोटो के पीछे छुपकर वोट डाल आए होंगे, उनका क्या? ऐसे टूरिस्ट वोटर भी दुनिया में और कहां मिलेंगे? दुनिया क्या अब भी हमें डेमोक्रेसी की मदर नहीं मानेगी!
वैसे डेमोक्रेसी की मदर होने के साक्ष्य और भी बहुत हैं। हमारे जैसा तटस्थता-मुक्त चुनाव आयोग दुनिया में कहीं और होगा, क्या? विशेष ट्रेनों में भर-भरकर, दूसरे राज्यों से मतदाताओं को जैसे मोदी-शाह पार्टी बिहार के चुनाव के लिए लायी है, वैसे दुनिया में और कहीं लाने दिया जाता होगा क्या? सरायरंजन में वीवीपैट की हजारों पर्चियां जैसे खेतों में पड़ी मिली हैं, वैसे वीवीपैट वाली मशीन से कहीं और चुनाव कराया जाता होगा क्या? जैसे यहां-वहां ईवीएम के स्ट्रांग रूमों में बिजली जाने और सीसीटीवी बंद होने और संदिग्ध गतिविधियां होने की शिकायतें आयी हैं, उस सब के बाद भी चुनाव आयोग कान में तेल डालकर कहीं और सोया रहता होगा क्या?
दुनियावालों, मोदी जी-ज्ञानेश जी को मदर ऑफ डेमोक्रेसी कहलवाने के लिए, अब और क्या करना होगा?
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)
2. हम सच नहीं बोलेंगे : विष्णु नागर
चाहे जो कर लो, चाहे जितना एक्सपोज़ कर दो, झूठ तो हम बोलेंगे ही, फ्राड तो हम करेंगे ही। रुकेंगे नहीं। आप ही बताइए, अगर हम झूठ नहीं बोलेंगे, जालसाजी नहीं करेंगे तो, फिर यह काम हमसे बेहतर कौन करेगा?जितना फर्स्ट क्लास झूठ बोलना हमें आता है, किसी और को आता है? अब चुनाव आयोग को नहीं मिले बिहार में घुसपैठिए तो वह जाने, यह उसकी नालायकी है! अभी आधे बिहार में वोट पड़ने वाले हैं जनाब, घुसपैठियों वाला झूठ तो हम बोलेंगे ही बोलेंगे। हमने हर जगह यह झूठ बोला है, तो बिहार को क्यों छोड़ देंगे? आखिर बिहार भी तो अपना है!
हम ‘असत्य वीर’ जब झूठ के मैदान में उतरते हैं, तो फिर पीछे नहीं हटते। इस देश और इसके बचे-खुचे लोकतंत्र की ऐसी-तैसी करके ही हम दम लेंगे। अभी तो ट्रेलर ही देखा है तुमने। फिल्म तो अभी हमने रिलीज ही नहीं की है। जब रिलीज करेंगे, तो अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाएंगे!
हमारे प्रधानमंत्री जी तो आदतन झूठ बोलते ही हैं। हमारे गृहमंत्री जी उनके सच्चे अनुयायी हैं। हमारे रक्षामंत्री कुर्सी-रक्षा यज्ञ में आहूति देते हुए दो कदम आगे बढ़कर झूठ बोलते हैं। बुलडोजरनाथ जी का तो धर्म ही है झूठ बोलना। वह पीठाधीश्वर हैं, तो झूठ उनके मुंह से बहुत सुहाता भी है। हिमंत बिस्वा सरमा जी संघ की शरण में आए, नये-नये मुल्ला हैं, ज्यादा प्याज़ नहीं खाएंगे, तो पद पर कैसे रहेंगे? झूठ हमारी अमूल्य संपदा है! और झूठ बोलने में हमें आज जितनी सुविधा है, सुरक्षा है, चर्चा है, वह कल हो, न हो। आज सीबीआई, ईडी, अदालत सब हमारी है। कल अगर किसी और की हो गई तो!
मान लिया कि हम भाजपाई भी पूरे बिहार में केवल 16 घुसपैठिये ढूंढ पाए। उसमें से भी जांच के बाद चुनाव आयोग ने केवल तीन को संदिग्ध माना, मगर इस कारण हम अपना गुण-धर्म छोड़ नहीं सकते! झूठ ही संघ-भाजपा के प्राण हैं, उसकी सभ्यता और संस्कृति है, आचरण की उसकी शुद्धता है। झूठ से हमारी सौ साल पुरानी रिश्तेदारी है! झूठ तो हम बोलेंगे ही। एक बार नहीं, हजार बार बोलेंगे। हज़ार बार से भी काम नहीं चला तो, लाख बार बोलेंगे, मगर जब भी, जहां भी, जिस युग में भी बोलेंगे, झूठ ही बोलेंगे!
जब तक देश में एक भी मुसलमान है, हम झूठ बोलेंगे।जब तक इस देश में एक भी सच जिंदा है, हम झूठ बोलेंगे। जब तक महात्मा गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष बोस का नाम है, झूठ बोलेंगे। संविधान की शपथ लेकर भी हम झूठ ही बोलेंगे। भारत माता की जयकार करते हुए भी हम झूठ ही बोलेंगे। तिरंगा हाथ में लेकर भी हम झूठ ही बोलेंगे। राम का नाम लेकर झूठ पहले भी खूब बोला है, आगे भी बोलेंगे। फ्राड बिहार में किया है और फ्राड आगे भी करते रहेंगे!
हम 1947 के बाद के स्वतंत्रता सेनानी हैं, इसलिए झूठ बोलेंगे। झूठ हम हजारों और लाखों मुंह से बोलेंगे। सैकड़ों टीवी चैनलों से बोलेंगे। सोशल मीडिया-आईटी सेल के माध्यम से झूठ के परनाले बहाएंगे। झूठ असंसदीय शब्द है, इसलिए संसद में हम झूठ नहीं, असत्य बोलेंगे। राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ को हम ‘घुसपैठिया बचाओ यात्रा’ बताएंगे। झूठ का डंका पूरे विश्व में बजाएंगे। हिटलर और गोयबल्स की आत्मा को जगाएंगे।
घुसपैठियों के नाम पर हम चार साल पहले भी असम में झूठ बोल चुके हैं। वहां हमारा झूठ जीता। अब भी वहां हम झूठ को विजय दिलाएंगे। सबसे आसान और सबसे लोकप्रिय झूठ है – ‘विकास’। बिहार में ‘विकास’ जारी रहेगा, फिर हम वहां से उसे उठाकर असम ले जाएंगे। बिहार को नंबर वन बनाया है, फिर असम को नंबर वन बनाएंगे। इस तरह हर राज्य को नंबर बनाते हुए खुद को नंबर वन बनाते जाएंगे। नंबर टू, थ्री, फोर के लिए हमारे एजेंडा में जगह नहीं है।
हमने पश्चिम बंगाल में भी झूठ बोला था, मगर वहां पिट गया था। फिर अगले साल मौका आ रहा है, फिर झूठ बोलेंगे। इस बार झिंगुर की तरह डट कर बोलेंगे! हमने झारखंड में भी यही झूठ बोला था, मगर वहांं नहीं चला तो क्या हुआ, दिल्ली में तो चल गया, वहां तो हमने सरकार बना ली! सच भी हर बार कहां जीत पाता है, तो झूठ हार गया, तो क्या गजब हो गया! इसलिए ‘झूठ के प्रयोग’ हम जारी रखेंगे। हम झूठ का साथ मरने तक निभाएंगे। काली टोपी की कसम, हम झूठ बोलेंगे। खाकी की निक्कर की सौगंध, हम झूठ बोलेंगे। डंडे की शपथ, हम झूठ ही झूठ बोलेंगे। नागपुर में हमारे मुख्यालय की सौगंध, हम झूठ बोलेंगे।
ऐसा-वैसा नहीं, हर बार पहले से बड़ा और नया झूठ बोलेंगे। झूठ ने हमें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया है। हम न यह शीर्ष छोड़ेंगे, न झूठ छोड़ेंगे। हमने झूठ के साथ सात फेरे लगाए हैं, हम इसके साथ जिंदगी भर के ‘पवित्र बंधन’ में बंधे हुए हैं, हम इसका साथ नहीं छोड़ेंगे। मरने पर ‘झूठ की समृद्ध विरासत’ देश के लिए छोड़ जाएंगे। हमारे बाल-बच्चे इसके दम पर मौज करेंगे!
हम आजादी की लड़ाई के बारे में झूठ बोलेंगे। हम मुगलों के बारे में झूठ बोलेंगे। हम छुपकर गांधी जी के बारे में भी झूठ बोलेंगे। हम नेहरू के बारे में सीना फुलाकर झूठ बोलेंगे। हम अंबेडकर के बारे में भी झूठ बोलेंगे। हमारे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक सभी दिशाओं में झूठ बोलेंगे। सुबह, दोपहर, शाम झूठ बोलेंगे।हम ‘मन की बात’ में झूठ बोलेंगे और फिर समूह में रामकथा की तरह उसका श्रवण कर उसका विडियो वायरल करेंगे। हम राष्ट्र के नाम संदेश में झूठ बोलेंगे।हमने लाल किले से हमेशा सफेद झूठ बोला है और आगे भी बोलेंगे। लाल पर सफेद खूब फबता है न!
झूठ से सारे देश के वातावरण को प्रदूषित कर देंगे। हम झूठ को सच के साये से दूर रखेंगे। झूठ का पीछा हम सच के जिंदा रहने तक नहीं छोड़ेंगे। ज्ञान -विज्ञान की किताबों में हम झूठ हगेंगे, झूठ मूतेंगे। झूठ का ही कुल्ला करेंगे। हम स्कूलों-कालेजों को दुर्गंध से भर देंगे और दुर्गंध का नाम सुगंध कर देंगे। हम किसी के धड़ को किसी और के सिर से जोड़ेंगे और उसका रिश्ता धर्म से जोड़ देंगे। हम झूठ को सनातनी आदत बना देंगे।हम झूठ की कार्बन- डाई-ऑक्साइड से गरीबों को मार देंगे। मुसलमानों को फना कर देंगे। दलितों को उनकी ‘असली जगह’ फिर से बता देंगे। झूठ की अनश्वरता में हमारा विश्वास अटल है।हम सत्य की ऐसी-तैसी न कर दें, तो फिर कहना कि हम झूठ की असली औलाद नहीं! हम झूठ बोलेंगे, केसरिया को तिरंगे के ऊपर बुलंद रखेंगे।
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

