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*राजनीति विज्ञान है……

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शशिकांत गुप्ते

राफेल विमान सीमा पार के दुश्मनों पर हमला करने के लिए काम आए या ना आए, लेकिन कुछ ही माह पश्चात होने वालें पाँच प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में विपक्ष को सत्तापक्ष पर शब्दिक गोले दागने के लिए राफेल जरूर उपयोगी होगा।सत्तापक्ष, विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाएगा।राजनैतिक दल में सलग्न सक्रिय लोग यदि राजनीति नहीं करेंगे तो कौन करेगा?राजनीति के सम्बंध में षड्यंत्रकारियों ने आमजन के बीच बहुत भ्रांति फैलाई है।

कुछ कथित साहित्यकार भी षडयंत्र के शिकार हैं।कुछ षडयंत्रकारी  चाहतें ही नहीं है कि,अच्छे लोग राजनीति में शिरकत करें।आमजन, आमदिनों में राजनीति को कोसता रहता हैं।इसी तरह मंचीय कवि जो साहित्य के नाम पर हंसी ठिठोली करतें हैं। साहित्य के नाम पर चुटकुलों को प्रस्तुत करतें हैं।ऐसे लोग मंच पर खड़े होकर बड़े शान से कहतें हैं कि, मेरी करोड़ो की कविता दो कौड़ी की राजनीति पर क्यो जाया करूं?यदि राजनीति दो कौड़ी है, तो विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की पढ़ाई बंद करवा देनी चाहिए?

यदि चिकित्साविज्ञान की पढ़ाई कर चिकित्सक को सेवाभाव के विपरीत आचरण  करतें हैं। चिकित्सा का शुद्ध व्यापार करने वाले चिकित्सकों के कारण चिकित्सविज्ञान भी पढ़ाना बन्द कर देना चाहिए।यह नियम हर एक क्षेत्र पर लागू होता है।आमजन के मुँह से हमेशा यह उदगार निकलते रहतें हैं कि,अपने को राजनीति क्या लेना देना? राजनीति बहुत गंदी है।यही लोग चुनाव के समय किसी दल के कट्टर समर्थक हो जातें हैं।बहुत ही गर्व से कहतें हैं।अपन तो शुरू से फलाँ पार्टी को ही वोट देतें हैं।क्या यह राजनीति नहीं है?जो कथित साहित्यकार मंचो से राजनीति को गंदा कहतें हैं।

वे यह भूल जातें हैं कि,राजनीति ने ही हमें लोकतंत्र दिलवाया है,और लोकतंत्र के मूलभूत अधिकार में हमें वाणी की स्वतंत्रता प्राप्त हुई है।हरएक व्यक्ति की दिनचर्या पर विचार करें तो एक भी व्यक्ति राजनीति से अछूता दिखाई नहीं देगा।हरएक व्यक्ति का पहनना, ओढ़ना,सजना,सवरना,सामाज में स्वयं को सामान्य से अलग दर्शाने के लिए विशिष्ठ वेशभूषा धारण करना राजनीति ही तो है।स्वयं के व्यक्तित्व पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए।पशु,पक्षियों को दाने खिलाना।गरीबो को मदद देतें हुए समाचारों में  फ़ोटो छपवाना,राजनीति ही तो है।राजनीति शास्त्र नीति निर्धारण का सशक्त मोर्चा है।सत्तारूढ़ की जैसी नीति होती है,वैसा ही निर्धारण होता है।सत्तारूढ दल की नीति यदि आमजन की समर्थक हो तो उसका लाभ जनता को मिलता है।गलत नीतियों का खामिजा जनता को ही भोगना पड़ता है।किसी भी दल की नीति कितनी भी अच्छी हो महत्वपूर्ण नहीं है। नीति को लागू करने के लिए नीयत साफ नही चाहिए।वर्तमान में यह महसूस किया जा रहा है कि,सिर्फ लोकलुभावन नीति बनाई जाती है,व्यवहार में नतीजा शून्य ही दिखाई देता है।दिन अच्छे आएंगे यह कहना ही गलत है।अच्छेदिन कोई मेहमान नहीं है किसी के कहने पर आजाएंगे।अच्छेदिनों की अनुभूति  होनी चाहिए।अच्छेदिन आएंगे का विज्ञापन देश के गरीबो का मख़ौल उड़ाने जैसा है।बेरोजगारों के साथ मजाक है।कृषिप्रधान देश के किसान महीनों से सड़कों पर है।यह नीति नहीं नीयत का दोष है।
शशिकांत गुप्ते इंदौ

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