शशिकांत गुप्ते
धर्म का,सरलता और सहजता से समझने वाला अर्थ है,धारण करना। दया,उदारता,सत्य, क्षमा,आदि को धारण करना।
दया शब्द भावनाओं को दर्शाता है।दया का शाब्दिक अर्थ है।करुणा, रहम।
दया शब्द हिंदी में काफी प्रयुक्त होता है।तुलसीदास जी ने दया को धर्म का मूल कहा है।जब तक ह्रदय में दया है,तब तक धर्म उस पर टिका हुआ है दया की अनुपस्थिती में धर्म का कोई अस्तित्व नहीं है।
तुलसीबाबा का दोहा है।
दया धर्म का मूल है,पाप मूल अभिमान
तुलसी दया न छोड़िये, जब तक घट में प्राण
उक्त दोहे में जीवनपर्यन्त दया को नहीं छोड़ना चाहिए ऐसा उपदेश है।
जब कोई भिखारी दया की याचना करते हुए उक्त दोहे को रटता है।तब दोहे के गूढ़ अर्थ की अवहेलना होते देख दुःख होता है।
अवहेलना पर दुःख होते ही यकायक लेखक के अंतर्मन ने दुःख को शांत करते हुए समझाया,इनदिनों धर्म और राजनीति का तालमेल हो गया है।
धर्म के द्वारा मनुष्य में मानवता जागृत करने के लिए जो उपदेश बताए हैं। मानव इन उपदेशों का अपने स्वार्थपूर्ति के लिए उपयोग कर रहा है।
इसीतरह वर्तमान में धार्मिक आस्था की दुहाई देते हुए रामभगवान के नाम का उपयोग तीन जगह प्रमुखता से किया जा रहा है।
एक राजनीति में दूसरा,भीख मांगने के लिए और तीसरा जीवन के अंतिम सत्य को प्रकट करने के लिए अंतयात्रा के दौरान जोर शोर से राम के नाम उच्चारण किया जाता है।
सड़क पर भीख की याचना करतें हुए,जब भिखारी निम्न दोहे को दिनभर रटता है,तब भगवान रामजी के नाम पर हो रही आमजन के भावनाओं की लूट प्रत्यक्ष दिखाई देती है।
राम नाम की लूट है,लूट सके तो लूट
अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट
वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था की रीतिनित के कारण तो आमजन को हरपल स्वयं का अंत दिखाई दे रहा है।महंगाई के कारण आमजन की स्थिति तो आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया जैसी हो रही है।आमजन राम राम उच्चारते हुए जैसे तैसे दिन गुजार रहा है।
“उम्मीद पर दुनिया कायम है” इस मुहवारे को याद करते हुए मानुष्य जीता है।हर मनुष्य की हसरत रहती है कि,वह जीवन के सम्बंधित हर पहलू से खुश रहे।
राजनीति और धर्म का तालमेल बैठा कर जो लोग व्यवस्था को संभालते हैं वे लोग आमजन को लुभावने वादों में उलझाकर रख देतें हैं।आमजन हसरत मतलब हर तरह से खुश रहने की कामना करता है।झूठे वादों के प्रलोभन में आने से आमजन के हसरतों का इसतरह का हश्र होता है।
हसरतों का हो गया है इस क़दर दिल में हुजूम
साँस रस्ता ढूँढती है आने जाने के लिए
शायर जिगर जालंधरी
उक्त शेर वर्तमान स्थिति के लिए एकदम प्रासंगिक है।
आमजन की स्थिति हूबहू शेर के दूसरे मिसरे की तरह हो गई है।
दूषित व्यवस्था के कारण आमजन की साँसों का हाल निम्न पंक्तियों जैसा हो गया है:-
रात कटती नहीं दिन गुजरता नहीं
जख्म ऐसा दिया है कि भरता नहीं
जिंदा रखा मगर जिंदगी छीन ली
धर्म की स्थिति पर युग निर्माण योजना का यह स्लोगन सटीक है।
कथनी करनी भिन्न जहाँ
धर्म नहीं पाखण्ड वहाँ
इसलिए राजनीति से अलग कर धर्म को समझना जरूरी है।
स्वामी विवेकानंद जी कहा है।धर्म जीवन का शाश्वत और सार्वभौमिक सत्य है।मनुष्य में जो स्वाभाविक बल है,उसकी अभिव्यक्ति ही धर्म है मानव के आचरण में शुद्धता ही धर्म है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

