शशिकांत गुप्ते
वर्तमान में देश के औसत व्यक्ति की जो स्थिति है, वह प्रख्यात शायर दुष्यन्त कुमार ने अपने शेर में प्रकट की है।
भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस यह मुद्दआ
(ज़ेरे का अर्थ हुकूमत के अधीन)
आमजन की हालत पर दुष्यन्त कुमार का यह शेर है।
न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
देश के रहबरों को कोई गलतफहमी है।इस गलतफहमी को दूर करते हुए दुष्यन्त कुमार कहतें हैं।
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा
आमजन की स्थिति तो इस कहावत का उदाहरण है। नो दिन चले अढ़ाई कोस
यह स्थिति बनने के लिए आमजन खुद दोषी है। बार बार ठोकरें खा रहा है, फिर भी ठाकुर बनने की ललक नहीं जागती। बार बार झूठे वादों पर यकीन कर धोखा खाना मतलब इस कहावत को चरितार्थ करना है आ बैल मुझे मार मतलब विपत्तियों को निमंत्रण देना।
इस संदर्भ में लेखक की एक कविता प्रासंगिक है।
दौरान चुनाव के लुभावने वादें
पश्चात बनाने को सरकार
दावें प्रति दावें
पहले तो अलग अलग,फिर मिलकर
अर्थात मिलबांट कर
पक्ष क्या विपक्ष
इस मामले में सभी समकक्ष
हम सब एक हैं
बस जनता ही भोली और नासमझ है
यही हो रहा है।खुशनुमा दिन आएंगे इस लालच में अमूल्य मत का दान करने के लिए गलत बटन दबा बैठें।
उक्त स्थिति पर दुष्यन्त कुमार का यह शेर एकदम मौजु है।
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
(चराग़ाँ का अर्थ दीपोत्सव)
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
लोकतंत्र के चौथें स्तम्भ का महत्व है।इनदिनों कुछ समाचार माध्यम और कुछ विपक्षी सिर्फ अपनी औपचारिकता का निर्वाह करतें हैं। ऐसी मानसिकता के लिए दुष्यन्त कुमार कहतें हैं।
गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए
वादें और दावें सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों में सिमट के रह गए हैं।
बुनियादी समस्याओं को इश्तिहारों में कैद कर दिया है।चारों ओर इश्तिहार ही इश्तिहार नजर आतें हैं।
इसीलिए आमजन को आगाह करतें हुए दुष्यंत कुमार कहतें हैं
अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तेहार
इसीलिए विचारक,चिंतक,बार बसर आगाह करतें हैं
जागते रहों
शशिकांत गुप्ते इंदौर

