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सियासत बनाम “हिंदू” : 550 वर्ष पहले और अब

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पुष्पा गुप्ता

   _भारत के इतिहास में ईस्वी 647 से ईस्वी 1190 तक का क़रीब साढ़े पाँच सौ वर्ष का एक ऐसा काल-खंड है, जो अंधकार में है। किसी को नहीं पता, कि सम्राट हर्षवर्धन के बाद और दिल्लीश्वर पृथ्वीराज चौहान के मध्य कौन-कौन बड़े शासक हुए।_
     *मज़ा देखिए, कि केंद्र में आठ साल से संघ निर्देशित भाजपा शासन में है। उसने घृणा तो खूब फैलाई किंतु एक भी काम ऐसा नहीं किया, जिसमें सुल्तानी राज्य के पूर्व के हिंदू शासकों के शौर्य और साहस का पता चलता।*
     उसके पास नेशनल बुक ट्रस्ट और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद जैसी सक्षम संस्थाएं हैं, किंतु पिछले आठ सालों में न तो कोई शोध हुआ न पुस्तक आई।
   _आठ वर्षों में हिंदू शासकों से संबंधित कितनी पुस्तकें प्रकाशित की गईं? शायद एक भी नहीं। जब तक इस काल खंड के बारे में जानकारी नहीं मिलती, तब तक हिंदुओं का इतिहास रहस्य के आवरण में डूबा रहेगा। हिंदू गौरव की बात करने वालों को राम, कृष्ण और परशुराम की जयंतियाँ मनाने से अधिक महत्त्वपूर्ण है, इस काल-खंड की खोज।_
      इससे पता चलेगा, कि वे कौन-कौन सी कमियाँ थीं, जिनके कारण भारत में हिंदू एक जाति के रूप में नहीं उभर सका। और इसीलिए राष्ट्रीयता की भावना उसके अंदर नहीं विकसित हुई। 

सम्राट हर्षवर्धन भी पूरे भारतवर्ष के एकक्षत्र शासक नहीं थे। अलबत्ता समस्त उत्तरी और पूर्वी भारत उनके अधीन था। उन्होंने आंध्र के पुलकेशिन द्वितीय को हराया ज़रूर पर वहाँ राज नहीं किया।
पूर्वी भारत में शशांक से उन्होंने समूचा गौड़ देश ले लिया था। अर्थात् बंग, उत्कल, मगध आदि। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उनका वर्णन किया है। उन्हें बहुत दान-पुण्य करने वाला राजा बताया है, जो कुम्भ में अपने वस्त्र तक दान कर देता था।
कल्हण की राज-तरंगिणी, महान दार्शनिक श्रीहर्ष और बाणभट्ट की कृतियों में उसका ज़िक्र है। लेकिन सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भारतीय इतिहास मौन है। जो कुछ है, वह स्मृतियों, किंवदंतियों और लोकोक्तियों में ही मिलता है।
अलबत्ता शिल्प और स्थापत्य से भी इस काल-खंड की खोज की जा सकती है। मज़े की बात, कि दक्षिण भारत के इतिहास में वहाँ का पूरा काल खंड उपस्थित है। सौराष्ट्र और गुजरात में भी। मगर उत्तर और पूर्वी भारत के बारे में कुछ नहीं मिलता। यह इतिहास खोजने के लिए भाषा-बोली, व्याकरण और दर्शन के ग्रंथों में जाना चाहिए।
इस काल खंड में चंदेलों की उपस्थिति का पता चलता है। खजुराहो के मंदिर इसी समय बने। बुंदेलखंड में खंगार राजाओं का अभ्युदय हुआ। उनका बनवाया गढ़ कुंडार अद्वितीय है। एक ऊँची पहाड़ी पर ग्यारहवीं शताब्दी में बना यह दुर्ग पाँच मंज़िल का है, तीन नीचे और दो ऊपर। जहांगीर तक इस राजवंश का पता चलता है।
इसी कालखंड में बघेलों का उदय हुआ और मथुरा में एक यादव राजा वासुदेव का पता चलता है, जिसने मथुरा के मंदिरों को लूटने आए महमूद गजनवी का गला दबोच लिया था, फिर उसके गौ-गौ चिल्लाने पर छोड़ दिया। क्योंकि उस समय ‘गौ’ का नाम लेने से ही जीवन दान मिल जाता था। यह वही काल है, जब उत्कल में सूर्य मंदिर कोणार्क बना।
अर्थात् स्थापत्य, बोली, व्याकरण, दर्शन, धर्म और अतीत से विद्रोह आदि सब कुछ मिलता है, मगर शासकों के बारे में सन्नाटा है। अवध, काशी और मगध के किसी भी शासक का पता नहीं चलता। किंतु यदि हम मंडन मिश्र, शंकराचार्य, भामती टीका और नागार्जुन की कृतियों में तलाशें, तो उस समय के राज्य-शासन का पता चलेगा।
जैसे रामचरित मानस में मौन तुलसी कवितावली में अपने समय की व्यथा का पूरा उल्लेख करते हैं।
हर्ष के बाद का भारत!

भले सातवीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी के आख़िरी दशक तक का हिंदुस्तान अंधकार में डूबा रहा हो, लेकिन जब तारीख़ें होंगी तो तवारीख भी होगी। और है, भी। लेकिन यह परस्पर युद्ध, बिखराव और आपाधापी का युग है।
यह वह समय है, जब पूरे भारत में कोई भी केंद्रीय अथवा सर्व शक्तिशाली सत्ता नहीं थी। पूर्वी हिंदुस्तान में पाल राजा थे, दक्षिणी हिंदुस्तान में राष्ट्रकूट उभरे और मध्य हिंदुस्तान में गुर्जर प्रतिहार। पाल राजा बौद्ध थे, और इनकी नीति भी बौद्ध विहार एवं बौद्ध विद्यापीठ बनाने की थी।
नालंदा, विक्रमशिला, बिहार शरीफ़ जैसे विश्विद्यालय इनकी देन थे। शशांक के पतन के बाद इन्होंने बौद्ध पंथ को अपनाया। याद रखें, कि राजा शशांक कट्टर शैव था, और उसने बौद्धों का उच्छेद किया। कन्नौज के मौखरी वंश को नष्ट किया। इसी मौखरी वंश की महारानी थी राजश्री, जिसका भाई हर्षवर्धन थानेसर (कुरुक्षेत्र के निकट) का राजा था।
वह कन्नौज आया और उसने शशांक का पीछा किया। शशांक उसके सम्मुख टिक नहीं सका। शशांक ने बंगाल में वैदिकीय शैव धर्म की स्थापना की और इसके लिए वह कन्नौज से ब्राह्मणों को ले गया। बंगाल में जो मुखोपाध्याय, वंद्योपाध्याय, भट्टाचार्य आदि ब्राह्मण मिलते हैं, वे कन्नौज से ही गए थे।
मशहूर पुरातत्त्वविद् राखालदास वंद्योपाध्याय ने शशांक पर एक अद्भुत पुस्तक लिखी है, जिसका अनुवाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी में किया था।

हर्ष ने मध्यम मार्ग अपनाया, वह वैदिकीय और बौद्ध हिंदुओं में कोई भेद नहीं करता था। बाणभट्ट और श्रीहर्ष जैसे कई वैदिक विद्वान उसके मित्र थे। किंतु उसके पतन के बाद जब गोपाल पाल ने बंगाल में पाल वंश का राज क़ायम किया तो उसने शशांक के समानांतर बौद्ध धर्म अपनाया।
बंगाल में बौद्धों का प्रभाव बहुत दिनों तक रहा। गाँव के गाँव बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए और शशांक के बनवाए देवालयों में बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गईं। पाल क्षत्रियों का यह राजवंश 750 ईस्वी से 1174 तक चला। महाराष्ट्र, धारवाड़ तथा गुजरात के इलाक़े में राष्ट्रकूट राजा उभरे। मूल रूप से ये कर्नाटक के थे।
ये शैव शासक थे। संस्कृत को इन्होंने जन भाषा बनाने के लिए बहुत काम किए। इसके साथ ही मध्य भारत में गुर्जर प्रतिहारों का शासन हुआ। राजा भोज ने भोपाल के निकट भोजपुर नाम का एक समृद्ध नगर बसाया। ये वैष्णव थे, लेकिन शैव धर्म के प्रति भी उदार थे। उज्जैन का प्रसिद्ध महाकाल मंदिर इन्हीं के शासन काल में बना।
किंतु इन तीनों में से कोई भी कन्नौज की समृद्ध नगरी को नहीं पा सका। पाल राजाओं ने कई बार कन्नौज पर हमला किया, लेकिन सिवाय धर्मपाल के कन्नौज में कोई नहीं आ सका। धर्मपाल को कमान अपने पिता गोपाल पाल की मृत्यु के बाद यानी 770 ईस्वी में मिली। उसका साम्राज्य समूचे बंग, उत्कल, मगध और आज के असम तक फैला था, लेकिन हिंदुस्तान तब तक किसी राजा को चक्रवर्ती नहीं माना जाता था, जब तक कन्नौज उसके अधीन न हो।
तीन राजाओं की नज़र कन्नौज पर थी। कन्नौज के लिए पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट तीनों भिड़े थे। सबसे पहले प्रतिहार शासक वत्सराज ने धर्मपाल को हरा कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इसके बाद राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने कन्नौज पर धावा बोला।

झाँसी के पास युद्ध में उसने वत्स राज को हरा दिया। फिर उसने धर्मपाल को भी हराया। लेकिन राष्ट्रकूटों ने यहाँ राज नहीं किया और वापस लौट गए। यूँ भी उनकी शत्रुता प्रतिहारों से थी। प्रतिहार कमजोर पड़े तो धर्मपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। कन्नौज जीत की ख़ुशी में उसने जो दरबार किया, उसमें गांधार और काबुल के राजा भी आए।
कन्नौज बहुत बड़ी शक्ति था। इन तीनों साम्राज्यों के बीच क़रीब 200 साल तक युद्ध चले। एक बार फिर कन्नौज के प्रभुत्व के लिए धर्मपाल को प्रतिहार सम्राट ‘नागभट्ट’ द्वितीय से युद्ध करना पड़ा। ग्वालियर के निकट एक अभिलेख मिला है, जो नागभट्ट की मृत्यु के 50 वर्षों बाद लिखा गया और जिसमें उसकी विजय की चर्चा की गई है।
इसमें बताया गया है कि नागभट्ट द्वितीय ने मालवा तथा मध्य भारत के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त की तथा ‘तुरुष्क तथा सैन्धव’ को पराजित किया जो शायद सिंध में अरब शासक और उनके तुर्की सिपाही थे।
उसने बंग सम्राट को, जो शायद धर्मपाल था, को भी पराजित किया और उसे मुंगेर तक खदेड़ दिया।
[चेतना विकास मिशन]

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