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जनसंख्या बिल : विसंगतियों का पुलिंदा

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बॉबी रमाकांत एवं संदीप पाण्डेय

दुनियाभर में मान लिया गया है कि आबादी पर नियंत्रण के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए बेहतर ढंग से जीने और रोजगार प्राप्त करने की खासी अहमियत है। लेकिन इसके बावजूद सरकारें जनसंख्या नियंत्रण की नीतियां और कानून बनाने और उन्हें आम लोगों पर जबरन थोपने में लगी हैं।

जिस समाज में सभी इंसानों के लिए विकास के सभी संकेतक बेहतर हैं वहां पर जनसंख्या स्वतः ही नियंत्रित एवं स्थिर हो जाती है। यानि यदि जनसंख्या नियंत्रित और स्थिर करनी है तो हर इंसान का विकास करना होगा। और हर इंसान के विकास की जिम्मेदारी किसकी है – इन्सान की या सरकार की? लेकिन ‘उत्तरप्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण व कल्याण) बिल – 2021’ को देखें तो वह राजनीति से प्रेरित लगता है। इसका उद्देश्य अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मतों का ध्रुवीकरण है।

एक अफवाह फैलाई जाती है कि भारत में मुसलमानों की जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि एक दिन वे हिन्दुओं से ज्यादा हो जाएंगे। इस बिल के माध्यम से मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उसने मुसलमानों की जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए इसे पेश किया है। हकीकत है कि परिवार में बच्चों की संख्या का किसी धर्म से ताल्लुक नहीं होता बल्कि गरीबी से होता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह समझ बनी है कि विकास ही सबसे अच्छा गर्भ-निरोधक है।

बांग्लादेश, जो कि एक मुस्लिम-बहुल देश है, में 2011 में महिलाओं की साक्षरता दर 78 प्रतिशत थी। भारत में यह दर 74 प्रतिशत थी। कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बंग्लादेश में 57 प्रतिशत था जबकि भारत में वह 29 प्रतिशत था। सिर्फ शिक्षा व रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर बांग्लादेश ने प्रति परिवार बच्चों की संख्या 2.2 प्रतिशत हासिल कर ली थी, जबकि 2.1 पर जनसंख्या का स्थिरीकरण हो जाता है। भारत में तब प्रति परिवार बच्चों की संख्या 2.6 थी। इससे साबित होता है कि प्रति परिवार बच्चों की संख्या का ताल्लुक महिलाओं के सशक्तिकरण है।

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