उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह कोई साधारण नाम नहीं है. वे भाजपा के उन संस्थापक नेताओं में से एक थे जिन्होंने काफी चुनौतियों के बीच पोस्टकार्ड और साइकिल से पार्टी का प्रारंभिक विस्तार किया और उसे मुकाम तक पहुंचाकर ही दम लिया. उस दौर में मोबाइल और इंटरनेट नहीं था, लेकिन कल्याण सिंह के पोस्टकार्ड की पहुंच सूबे के हर हिस्से तक थी.
वे पिछड़े वर्ग से निकले ऐसे नेता थे जिसे अगड़ों का भी भारी समर्थन हासिल हुआ. इसी के बूते वह दो बार यूपी के सीएम रहे हैं. ये वो दौर था जब उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और कलराज मिश्र की जोड़ी जातीय आधार पर भाजपा के लिए हिट फार्मूला साबित हुई थी.
कल्याण सिंह ने विधायक के लिए सबसे पहला चुनाव जनसंघ से 1962 में दीपक के चुनाव चिन्ह पर लड़ा था. इस चुनाव में वह हार गए. इसके बाद 1967 में कल्याण सिंह फिर चुनाव मैदान में उतरे और जीत हासिल की. वह विधानसभा क्षेत्र अतरौली के 10 बार विधायक रहे. दो बार बुलंदशहर व एटा के सांसद के बाद वह उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री भी रहे.
जमीनी संघर्ष कर दी भाजपा को मजबूती
कल्याण सिंह उस पीढ़ी के नेताओं में थे जिन्होंने पोस्टकार्ड और साइकिल युग में पार्टी को खड़ा किया था. उनके साथ काम करने वाले लोग बताते हैं कि कल्याण सिंह की हैंडराइटिंग काफी सुंदर थी. वह अपनी हैंडराइटिंग में ही पार्टी कार्यकार्ताओं और पदाधिकारियों को पोस्टकार्ड भेजते थे. उनके लिखे पोस्टकार्ड उनके बहुत से साथियों ने सहेज कर भी रखे हैं. उस दौर में मोबाइल और इंटरनेट नहीं था, लेकिन कल्याण सिंह के पोस्टकार्ड की पहुंच सूबे के हर हिस्से तक थी. कल्याण सिंह के संदेश पोस्टकार्डों के जरिए पहुंते थे और खुद कल्याण सिंह ने साइकिल से ही पार्टी को मजबूत करने के लिए मीलों का सफर तय किया.
1989 के आस-पास जब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा का उभार होने लगा तो वे प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गए. कलराज मिश्र के साथ कल्याण सिंह की जोड़ी का राज्य में गहरा प्रभाव रहा. 1989 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के बाद 1991 में वे मुख्यमंत्री बने. उनके तुकबंदी युक्त भाषणों के कारण और दृढ़तापूर्वक, अड़ियल ढंग से अपनी बात रखने के कारण उनकी नई पहचान बनी.
“मेरा शव भाजपा के ही झंडे में लिपट कर जाएगा.”
1999 में जब उनसे पूछा जाता था कि वे भाजपा छोड़ सकते हैं, तो वे नकारते हुए कहते थे, “मेरा शव भाजपा के ही झंडे में लिपट कर जाएगा.”
