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सत्ता बेख़ौफ़ आदमी से डरती है

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सत्ता जितनी ताकतवर दिखती है
शायद उतनी होती नहीं है
संगीनों की नोकें
बूटों की थप-थप
जेल की चहारदीवारी
के ख़ौफ़ से ही
लोग दुबक जाते हैं
इससे भी ज्यादा
शायद बाल-बच्चों की चिन्ता
बूढ़ी मां क्या होगा?
बीमार पिता की देखभाल कौन करेगा?
घर का किराया कौन भरेगा?
यह आंशका ही कंपा देती है

लेकिन जब कोई
बेख़ौफ इंसान
सत्ता के सामने तनकर खड़ा हो जाता है
सत्ता बुरी तरह डर जाती है
सहम जाती है
भीतर से हिल जाती है
असल में
अन्याय पर टिकी सत्ता की
अपनी कोई ठोस जमीन नहीं होती है
जबतक उसका ख़ौफ़ है,
तब तक वह कायम है
इसीलिए सत्ता बेखौफ आदमी से डरती है
वह आदमी
80 वर्षीय एक बूढ़ा
कवि ही क्यों न हो ?

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