(क्या “90% को अशिक्षित व भूखा रख कर 90% पूंजी कुछेक हाथों में समेटने” का मॉडल लागू किया जा रहा है?)
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
आजकल ग्रामीण तबकों में प्राथमिक विद्यालयों को बंद किए जाने के पीछे की मंशा के बारे में एक कटु सत्य बताया जा रहा है कि यदि किसी भी देश में बराबर सत्ता में बने रहना है तो शासन को चाहिए कि वह देश की 90% जनता को अ शिक्षित और भूखा रखने के साथ-साथ देश की 90% पूंजी को कुछेक पूंजीपतियों तक सीमित करदे तो तानाशाही को कायम किया जा सकता है। क्या आपको नही लगता कि मोदी जी उसी दिशा में काम कर रहे हैं।
यह सवाल बहुत ही गहरा और राजनीतिक-आर्थिक और नैतिक सवाल उठाता है। इसे केवल भावनात्मक या प्रत्यात्मक स्वर में नहीं, बल्कि तथ्यों, नीतियों और परिणामों की रोशनी में परखा जाना चाहिए। नीचे मैंने इसी प्रश्न — “क्या सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिए जानबूझकर आबादी को अलक्ष्य/अशिक्षित और गरीबी में रखा जाता है, तथा पूँजी कुछ इकाइयों के हाथों में केन्द्रित की जाती है — और क्या मोदी सरकार वही दिशा अपनाती दिखती है?” — का विस्तृत, संदर्भित, संतुलित और समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेख प्रवाहमयी है, पर जहाँ-जहाँ महत्वपूर्ण तथ्य या आंकड़े हैं उनके स्रोत भी दिए हैं ताकि आप चाहें तो और गहराई से जांच-परख कर सकें।
तर्क का औचित्य और उसका इतिहास:
राजनीति-विज्ञान, इतिहास और आर्थिक सिद्धांतों में एक पुराना तर्क मिलता है, जिसे सत्ता टिकानी है, वह अक्सर ऐसे सामाजिक-आधार तैयार करता है जो प्रतिरोध-क्षमता को घटाते हैं — विभाजन, आर्थिक निर्भरता और नियंत्रित सूचना उसका भाग होते हैं। कुछ तानाशाहों ने सीधे तौर पर शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाकर नागरिकों को राजनीतिक सक्रियता से दूर रखा; कुछ अन्य शासन में यह नियंत्रण महीन-नियोजन (institutional capture) के माध्यम से होता है — आर्थिक नीतियाँ, शिक्षा-नीतियाँ और सिविल-स्पेस को बदले बिना भी प्रभावी नियंत्रण सम्भव है। इसलिए आपका सवाल ऐतिहासिक और तात्त्विक रूप से वैध है| क्या आज के भारत में ऐसी कोई संरचनात्मक रणनीति चल रही है जो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर कर रही हो?
1) क्या भारत में गरीबी और असमानता बढ़ी है — और किस हद तक?
यहाँ दो महत्वपूर्ण परतें अलग की जानी चाहिए — आय/दौलत का असमान वितरण और अत्यधिक/चरम गरीबी की दर।
· दौलत-केंद्र के मोर्चे पर कुछ रिपोर्ट चिंताजनक हैं। Oxfam-India की 2023 रिपोर्ट बताती है कि शीर्ष 1% की संपत्ति का हिस्सा बहुत बड़ा है — और कि निचले 50% की संपत्ति-भागीदारी पिछले सालों में और सिकुड़ गई है; इस तरह की असमानता लोकतंत्र और समावेशी विकास के लिए खतरनाक मानी जाती है। (oxfamindia.org+1)
· दूसरी ओर सरकार-समर्थक और अंतरराष्ट्रीय आँकड़े बताते हैं कि अत्यन्त चरम गरीबी (World Bank की नई माप) में बड़े पैमाने पर गिरावट आई है; सरकार के संचार (PIB/World Bank सारांश) के अनुसार 2011-12 से 2022-23 के बीच करोड़ों लोग गरीबी-रेखाओं से ऊपर उठे हैं — पर यह भी सच है कि आँकड़ों के मापदंड, रेखाएँ और समय-सीमाएँ भिन्न होने से बहस खुली रहती है और आलोचक कहते हैं कि वितरण में सुधार अपेक्षाकृत धीमा और असमान रहा। (Open Knowledge Repository+1)
इस भाग में -- दौलत-असमानता स्पष्ट है (शीर्ष पर बहुत सान्द्रता- concentration) और गरीबी कम हुई है पर वितरण संबंधी फायदे विवादास्पद रहे हैं। यानी अमीर और अमीर-तर बनते गए, जबकि बहुत-सी आबादी का सापेक्ष लाभ सीमित या असमान रहा — यह वही स्थितियाँ हैं जो सत्ता-स्थिरता के लिए अनुकूल मानी जा सकती हैं यदि राजनीतिक नियंत्रण का उद्देश्य आर्थिक केंद्रण हो।
2) शिक्षा — ग्रामीण प्राथमिक स्कूल बंदियों और निजीकरण की प्रवृत्ति
आपने विशेषकर ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने व निजी स्कूलों के विस्तार को जिम्मेदार ठहराया — यह बेहद सेंसेटिव विषय है क्योंकि प्राथमिक शिक्षा लोकतांत्रिक भागीदारी की नींव है। तथ्य-स्थिति मिश्रित है:
· महामारी (COVID-19) के बाद स्कूलों के बंद रहने, ‘रेशनलाइजेशन’ और कुछ स्थानों पर सरकारी छोटे विद्यालयों के विलय/समापन के आँकड़े सामने आए हैं; कुछ विश्लेषण बताते हैं कि 2018-20 के आसपास हजारों स्कूली इकाइयां बंद/मर्ज हुईं — पर यह प्रवृत्ति केवल तबाही नहीं दर्शाती; कई बार यह तकनीक/बजटीय कारणों से भी होता है। साथ ही परिवारों की प्राथमिकताएँ और निजी स्कूलों की बढ़ती माँग भी निजीकरण में भूमिका निभाती है। LinkedIn+1
· ASER/देशीय सर्वे लगातार बताता रहा है कि सीखने के परिणाम और स्कूल-उपस्थिति़याँ ग्रामीण भारत में चिंताजनक हैं; निजी स्कूलों में दाखिला बढ़ने का कारण भागतः ‘गुणवत्ता की धारणा’ भी है, न कि केवल सरकारी विद्वेष। यही कारण है कि नीति-निर्माता NEP 2020 जैसे दस्तावेजों में निजी-सहभागिता और प्रणालीगत बदलाव का जिक्र करते हैं — और आलोचक इसे “निजीकरण का मार्ग” कहते हैं। img.asercentre.org+1
इस भाग में– कुछ सरकारी प्राथमिक विद्यालय बंद हुए हैं और निजी स्कूलों का प्रसार बढ़ा है — पर इसे सीधे तौर पर “जानबूझकर ग्रामीणों को अशिक्षित रखने” का प्रमाण कहना कठिन है। कारणों का मिश्रण है: महामारी के प्रभाव, स्थानीय प्रशासनिक नीतियाँ, माता-पिता की प्राथमिकता, तथा राष्ट्रीय नीति-ढांचे जो निजी-सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं।
3) नीतियाँ और संस्थागत निर्देश — क्या जानबूझकर केन्द्रित रणनीति दिखती है?
यहाँ दो तरह के सबूत देखें — (A) प्रत्यक्ष-नीति और (B) परिणाम-आधारित संकेत।
A) प्रत्यक्ष-नीति (laws, schemes, NEP आदि):
· National Education Policy (NEP) 2020 ने शिक्षा के ढांचे में बड़े बदलाव सुझाए — बहु-पाठ्यक्रम, निजी-सहयोग के लिए गुंजाइश, HEFA और अन्य वित्तीय-ऑप्शन से संस्थाओं को ऋण-आधारित संसाधन दिलाना। आलोचक कहते हैं कि इन प्रावधानों से फीस-स्तर बढ़ सकता है और सार्वजनिक मुफ्त/सुलभ शिक्षा पर दबाव आएगा; राज्यों और विपक्ष ने NEP के कुछ हिस्सों को “केंद्र-संचालित” व “वाणिज्यिक” करार दिया है। EPW+1
B) परिणाम-आधारित संकेत:
· असमानता में बढ़ोतरी और शीर्ष पर सम्पत्ति-संग्रह — जो Oxfam जैसी रिपोर्टें दर्शाती हैं — बताती हैं कि आर्थिक नीतियों के समेकन का लाभ बड़े पूँजी-स्वामियों को मिला। साथ ही निजीकरण के स्वर ने शिक्षा/स्वास्थ्य-जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में बाज़ार-भागी तरीके बढ़ाए। oxfamindia.org+1
इस भाग में– नीति-दस्तावेजों में निजी-सहयोग तथा वित्तीय उपकरणों का विस्तार दिखता है और उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक-क्षेत्र का दायरा आर्थिक तौर पर प्रभावित हुआ है। क्या यह जानबूझकर “90% को अशिक्षित/भूखा रखने” जैसा उद्देश्य है? नीति-लेखन में सीधी ऐसी बात नहीं लिखी; पर नीतिगत रुझान और परिणाम मिलकर कुछ ऐसी संरचनाएँ बनाते हैं जो असमानता को तेज कर सकती हैं — और यह सत्ता-स्थिरता के लिये सहायक सिद्ध हो सकती है।
4) क्या यह सब “संकल्पित रणनीति” है — अर्थात मोदी सरकार की मंशा का सवाल?
यहाँ हम सीधे इरादे (intent) पर नहीं पहुँच सकते — क्योंकि नीतियाँ, उनके दायरों, और उनका कार्यान्वयन अनेक एजेंटों (ब्यूरोक्रेसी, प्राइवेट पार्टनर, राज्य सरकारें) के मध्य होता है। पर प्रभाव-समूह और परिणामों के आधार पर तीन बातें कही जा सकती हैं—
1. इरादा/मंशा की माँग का प्रमाण-स्तर: उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज़, नीति-रूपरेखाएँ और व्यवसायिक-हितों के अनुरूप कुछ निर्णय यह संकेत देते हैं कि सरकार ने निजी-क्षेत्र को अधिक भूमिका दी। पर यह अकेले “जानबूझकर 90% को वंचित रखना” जैसा संकेत देने के लिये अपर्याप्त है — ऐसा बड़ा दावा सीधे-सीधे ठोस गुप्त-डॉक्यूमेंट या स्पष्ट उद्घोष के बिना साबित नहीं किया जा सकता। EPW
2. प्रभाव-गति (outcome dynamics): परिणाम यह दिखाते हैं कि बड़े पूँजीपतियों का हिस्सा बढ़ा और सार्वजनिक-सेवा-क्षेत्रों में निजीकरण के रास्ते खुले; शिक्षा-क्षेत्र में असमानता और ‘गुणवत्ता-की धारणा’ ने निजी स्कूलों को बढ़ावा दिया। ये परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर सकते हैं — खासकर यदि नागरिक-शक्ति (शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वतंत्र मीडिया) कमज़ोर होती जाए। oxfamindia.org+1
3. राजनीतिक व्यवहार (political strategy): सत्ता-रहने के व्यवहारिक तरीकों में आर्थिक एलाइट के साथ गठजोड़, सूचना-मैदानी नियंत्रण और सामाजिक विभाजन शामिल हो सकते हैं — और कुछ आलोचक कहते हैं कि वर्तमान शासन ने इन तरीकों को उपयोगी रूप से अपनाया है। पर यह कहना कि यह एक समग्र, सुसंगठित “90/90” मॉडल है — अर्थात् आंकिक लक्ष्य-निर्धारण के साथ — अभी तक साबित नहीं हुआ; यह एक पारंपरिक साजिश-विकल्प (conspiracy) जैसा दावा बन सकता है। The Guardian
5) व्यावहारिक प्रभाव — आम लोगों पर क्या असर हुआ?
· गरीबी के आंकड़ों में सुधार के संकेत हैं (World Bank/सरकारी आँकड़े) — यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में कुछ सरोकार निचले स्तर तक पहुँचा है; पर असमानता की जिस तरह की रिपोर्टें आती हैं, वे बताती हैं कि लाभ संतुलित नहीं रहा। Open Knowledge Repository+1
· शिक्षा के स्तर पर सीखने का संकट (learning crisis) बना हुआ है; स्कूल की उपस्थिति, सीखने-प्राप्ति और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा की कमी से सामाजिक ऊँचाई पर असर पड़ता है। img.asercentre.org
6) निहितार्थ — अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो परिणाम क्या होंगे?
· लोकतांत्रिक पुनरुत्थान के लिए नागरिक शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और सार्वजनिक-हित संस्थाओं की ताकत जरूरी है। यदि शिक्षा निजीकरण और असमानता बढ़ने का रास्ता अपनाया गया और यह राजनीतिक नियंत्रण के साधन बने, तो नागरिक सहभागिता और सार्वजनिक-जवाबदेही कमजोर होगी। Oxfam जैसी संस्थाएँ भी चेतावनी देती हैं कि अत्यधिक असमानता लोकतंत्र के लिए जहरीली है। oxfamindia.org
7) नीतिगत विकल्प और प्रतिकार — क्या किया जा सकता है?
यदि किसी राष्ट्र की प्राथमिक चिंता लोकतंत्र और समावेशी विकास हैं, तो नीचे कुछ व्यवहारिक कदम सुझाए जा सकते हैं:
· सार्वजनिक शिक्षा में पुनर्रोज़गार और निवेश — प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा को मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण और स्थानीय-नियंत्रित बनाना। (ASER और नीति-विवेचनाएँ) img.asercentre.org
· कर नीति और समावेशन — संपत्ति-कर, विरासत-कर और प्रगतिशील कर-नियमों के माध्यम से असमानता पर अंकुश। (Oxfam जैसी रिपोर्टें) oxfamindia.org
· पारदर्शिता और सार्वजनिक-निगरानी — सरकारी-नियुक्तियों, शिक्षा-निधि और सार्वजनिक विभागों के पारदर्शी आडिट; नागरिक समाज एवं मीडिया-सक्रियता को संरक्षण।
· नियोक्ता-नियमन और सार्वजनिक-न्याय — बड़े आर्थिक समूहों के एकाधिकार-स्वभाव पर प्रतिस्पर्धा-नियंत्रण और श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा।
इस लेख में जो कटु सिद्धांत पेश किया — कि सत्ता टिकाने के लिए 90% जनता को अशिक्षित, भूखा और आर्थिक रूप से निर्बल रखा जाए तथा 90% पूँजी कुछेक हाथों में केन्द्रित कर दी जाए — वह सैद्धान्तिक रूप से संभव है और इतिहास में कुछ आंशिक उदाहरण मिलते हैं। वर्तमान भारत में बात कुछ इस तरह है—
· निर्णायक प्रमाण नहीं मिलता कि कोई आधिकारिक, लिखित “90/90” रणनीति लागू की जा रही है; पर नीति-रुझान, परिणाम और असमानता के आँकड़े बतलाते हैं कि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण और सार्वजनिक-सेवाओं में बाज़ार-प्रवृत्ति जैसी स्थितियाँ बढ़ रही हैं — जो दीर्घकाल में लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकती हैं। oxfamindia.org+1
· मोदी सरकार के कार्यकाल में गरीबी हाशिए से हटाने के दावे और असमानता-बढ़ने के दावे — दोनों ही मिले-जुले परिणामों का संकेत देते हैं; कुछ लोगों को आर्थिक लाभ मिले और कुछ को सरकारी योजनाओं का फ़ायदा पहुँचा, पर वितरणीय असमानताएं अब भी बड़ी चुनौती हैं। Open Knowledge Repository+1
· इसलिए निष्कर्ष यह है कि इरादा (intent) सिद्ध नहीं हुआ पर प्रकृति (structure & outcome) ऐसी है कि वही संरचनाएँ सत्ता-स्थिरता के लिए फ़ायदे़मन साबित हो सकती हैं — और यही चिंता का कारण है।
संक्षेप नीति (Policy Brief)
“समान अवसर और सामाजिक न्याय की पुनर्स्थापना हेतु समेकित नीति-संकेत”
1. नीति-पृष्ठभूमि
भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना पिछले दशक में गहरे परिवर्तन से गुज़री है।
एक ओर आय और संपत्ति के उच्चतम स्तरों पर दौलत-केंद्रण बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी प्राथमिक शिक्षा की पहुँच और गुणवत्ता दोनों पर दबाव बढ़ा है। ऑक्सफैम (2023) के अनुसार देश की 1% आबादी के पास लगभग 40% राष्ट्रीय संपत्ति है। साथ ही ASER रिपोर्टें लगातार दिखा रही हैं कि ग्रामीण बच्चों में बुनियादी सीखने की दक्षता घट रही है। इन रुझानों से यह संकेत मिलता है कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा तभी सुदृढ़ रह सकता है जब सार्वजनिक सेवाओं में निवेश और कर-न्याय दोनों को प्राथमिकता मिले।
2. नीति-समस्या का सारांश
| क्षेत्र | मुख्य समस्या | प्रभाव |
| शिक्षा | सरकारी विद्यालयों का बंद होना, शिक्षक-अभाव, निजीकरण का प्रसार | ग्रामीण गरीब बच्चों की शिक्षा तक पहुँच घट रही है |
| राजकोषीय न्याय | अमीर वर्गों को कर-छूट, प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी में गिरावट | असमानता में वृद्धि, सरकारी राजस्व पर दबाव |
| नियमन | कॉर्पोरेट और शिक्षा-क्षेत्र में पारदर्शिता का अभाव | पूँजी-केंद्रण, सार्वजनिक जवाबदेही में कमी |
3. नीति-उद्देश्य:
1. सार्वजनिक शिक्षा का पुनरुद्धार — शिक्षा को अधिकार नहीं, निवेश मानने की नीति-त्रुटि को सुधारना।
2. कर-प्रणाली में समानता — राजस्व-संग्रह में न्यायसंगत भागीदारी और पुनर्वितरण के सिद्धांत को मज़बूत करना।
3. नियामक संरचनाओं की पारदर्शिता — बड़े पूँजी-समूहों और निजी शिक्षा-संस्थानों पर जवाबदेही सुनिश्चित करना।
4. प्रमुख नीति-सिफारिशें
A. सार्वजनिक शिक्षा-वापसी
1.प्राथमिक स्तर पर “एक गाँव–एक विद्यालय” योजना :
· बंद/विलयित सरकारी स्कूलों को पुनः सक्रिय करना।
· स्थानीय निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता देना।
2. शिक्षक-भर्ती एवं प्रशिक्षण अभियान 2026-2030 :
· ST/SC/OBC वर्गों के रिक्त आरक्षित पदों को शीघ्र भरना।
· शिक्षक प्रशिक्षण को जिला-स्तर पर अनिवार्य सतत प्रक्रिया बनाना।
3. सरकारी विद्यालयों के लिए ‘गुणवत्ता सूचकांक’ (Public School Quality Index) :
· विद्यालयों को अंकित करना ताकि प्रतिस्पर्धी सुधार संभव हो।
4. NEP 2020 में संशोधन :
· निजी-सहभागिता की सीमाएँ स्पष्ट की जाएँ और सार्वजनिक-वित्त पोषण की प्राथमिकता तय की जाए।
B. कर-न्याय (Fiscal Equity):
1. प्रगतिशील कर सुधार :
· उच्चतम आय-वर्गों के लिए सर्ज टैक्स और विरासत-कर लागू करना।
· कॉर्पोरेट कर-छूटों की वार्षिक समीक्षा कर उन्हें परिणाम-आधारित बनाना।
2. संपत्ति और पूँजी-लाभ पर कर-पारदर्शिता :
· बड़े निवेशकों की लाभ-सूचना को सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराना।
3. सामाजिक व्यय लक्ष्य (Social Expenditure Target) :
· GDP का न्यूनतम 6% शिक्षा और 3% स्वास्थ्य में अनिवार्य निवेश।
C. नियामक और संस्थागत सुधार
1. शिक्षा क्षेत्र के लिए स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण (Indian Public Education Commission) :
· नियुक्तियों, अनुदानों और निजी संस्थानों की पारदर्शी निगरानी।
2.कॉर्पोरेट एकाधिकार-निरोधक नीति :
· Competition Commission को अधिक शक्तिशाली बनाना;
· पूँजी-संग्रह के स्तर पर वार्षिक असमानता-आडिट अनिवार्य करना।
3.राजनीतिक-शैक्षणिक विभाजन का विधान :
· विश्वविद्यालय कुलपतियों और वरिष्ठ शिक्षकों को सक्रिय राजनीतिक पद स्वीकारने से रोकने वाला कोड-ऑफ़-कंडक्ट।
5. अपेक्षित परिणाम:
| नीति क्षेत्र | अनुमानित लाभ (5 वर्ष) |
| शिक्षा | ग्रामीण क्षेत्रों में 25% अधिक नामांकन, सीखने की गुणवत्ता में सुधार |
| कर न्याय | राजस्व-संग्रह में 2%-GDP की वृद्धि; सामाजिक व्यय के लिए अतिरिक्त संसाधन |
| नियमन | कॉर्पोरेट एकाधिकार में कमी, शिक्षा और पूँजी-प्रवाह में पारदर्शिता |
6. सारांश —
यदि भारत को सचमुच ज्ञान-आधारित लोकतंत्र बनना है, तो शिक्षा को व्यावसायिक वस्तु नहीं, संवैधानिक उत्तरदायित्व माना जाना चाहिए। कर-नीति को केवल राजस्व-संग्रह नहीं, सामाजिक पुनर्वितरण का उपकरण बनना होगा। और नियामक संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त किया जाना अनिवार्य है। केवल तभी सत्ता-स्थिरता का अर्थ लोकतांत्रिक स्थायित्व होगा, न कि सामाजिक असमानता की मजबूती।
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