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*स्तुति योग्य सेतु सशुल्क दर्शनीय?

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शशिकांत गुप्ते

पुल मतलब सेतु इंग्लिश में ब्रिज (Bridge) कहतें हैं। पुल पर प्रख्यात व्यंग्यकार स्व.शरद जोशीजी ने अपने एक व्यंग्य में लिखा है कि सरकार पुल इसलिए बनाती है,जिनके नीचें से नदी निकल सके। यदि सरकार पुल ही नहीं बनाएगी तो नदियां किसके नीचें से निकलती?
यह तो व्यंग्य की बात हुई। पुल का निर्माण इसलिए होता है कि नदियों के ऊपर से यातयात सुगम रीति से निर्विघ्नं चल सकें।
सम्भवतः पुल निर्माण की संस्कृति की शुरुआत त्रेतायुग से हुई है।
भगवान रामचन्द्रजी ने समुद्र को पार करने के लिए सेतु निर्मित किया था।
इनदिनों नदियों पर पुल दर्शनार्थ निर्मित किए जा रहें हैं।
इस मुद्दे पर चर्चा की शुरुआत करते ही बापू की महानता को प्रकट करता,यह गीत याद आ गया।
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।
दर्शनीय पुल नदी को निर्विघ्न पार करने के लिए नहीं बनाया गया है। इस पुल के दर्शन कर पुल पर निश्चित समयावधि तक ही घूमफिर सकतें हैं। पुल पर तय समयावधि विचरण करना भी सशुल्क है।
यातायात को सुगम बनाने के लिए उपरिगामी पुल भी निर्मित होतें है। उपरिगामी मतलब उड़ान पुल, सरलता से समझने के लिए इसे Flyover bridge कहतें हैं।
पुल का एक अर्थ यह भीहोता है, अंतर मिटाना। इक्कीसवीं सदी में पहुँचने बाद भी हम रोटी और बेटी के व्यवहार का अंतर नहीं मिटा पाएं हैं। एक ओर दलित को सर्वोच्च पद विराजित कर स्वयं के द्वारा स्वयं के लिए प्रसंशा के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, दूसरी ओर दलितों पर हो रहे अत्याचारों को रोक नहीं पा रहें है। ठीक वैसा ही जैसा पुल अंतर मिटाने के लिए निर्मित नहीं किया जा रहा है सिर्फ दर्शनार्थ निर्मित किया गया है।
गरीब-अमीर,ऊंच-नींच, और
अगड़े-पिछडे के बीच हम कब पुल बना पाएंगे? मतलब इस अंतर को कब मिटायेंगे?
इतिहास में दर्शनीय स्थलों की स्थिति कहीं दूर को ढोल सुहावने वाली कहावत बनकर न रह जाए।
देश की भावीपीढ़ी सवाल करेगी क्या हमारे पूर्वज सिर्फ दर्शनीय स्थलों के ही निर्माण करतें थे?
आमजन की बुनियादी समस्याओं को हल करने के लिए पूर्वजो के पास समय नहीं था या क्षमता नहीं थी?
महानगरों में प्रायः उड़ान पुल के नीचें निर्धन,भिखारियों और लावारिस लोगों का बसेरा दिखाई देता है। यह एक अहम विचारणीय प्रश्न है।
नदियों पर पुल निर्मित कर फीता काटकर पुल का लोकापर्ण का भव्य समारोह आयोजित होता है। इस आयोजन के विज्ञापन और समाचार भी प्रकाशित और प्रसारित होतें तब नदियों की सफ़ाई में हो रही कोताही का गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है।
पुल का जो एक अर्थ है अंतर इस अर्थ को ही व्यवहारिकजामा पहनाना चाहिए। यह सलाह जागरूक नागरिकों की है।
अंत में यही कहना उचित होगा कि, हमें रचनात्मक (Construtive) और हानिकारक (Destructive) मानसिकता के अंतर को समझना होगा और मिटाना होगा?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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