अग्नि आलोक

प्रेमचंद जयंती पर… पूरा आन्दोलन थे : प्रेमचंद

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सुसंस्कृति परिहार

बस तुम ही पा सकोगे, कुरेदोगे तुम अगर ,
मैं अपनी राख में ,वो शरर छोड़ जाऊंगा ।

किसी शायर की ये पंक्तियाँ प्रेमचंद पर एकदम युक्ति संगत हैं ।यकीनन वे अपने लेखन में वह शरर छोड़ गये हैं जिनकी आज जरूरत है ।वे नहीं हैं पर एक साहित्यिक योद्धा के नाते उन्होंने समाज को मानवीय मूल्यों की जो दृष्टि, पक्षधरता एवं प्रतिबद्धता की राह अपने अकूत लेखन के जरिए दिखाई है वह आज के इस संकटापन्न दौर में विंसंगतियों वा अन्तर्विरोधों से जूझने में मार्गदर्शक का काम करती है
उन्होंने कहा था कि लेखक स्वभावतः प्रगतिशील होता है ।प्रेमचन्द स्वभावतः प्रगतिशील व्यक्तित्व के धनी थे ।यह प्रगतिशीलता उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में स्पष्ट नज़र आती है ।उन्होंने बाल विधवा शिवरानी से विवाह किया था ।अपने प्रगतिशील लेखन के कारण जीवन भर कष्टों में रहे ।समझौते नहीं किये ।प्रगतिशीलता में ठहराव ,जड़ता और पूर्वाग्रहों का कोई स्थान नहीं होता़ ।ये उनका विचार था ।
जन्म के बाद से निजी स्तर पर प्रेमचन्द ने कठोर संघर्ष किया ।सामाजिक अंतर्विरोधों से टकराते हुए उनका झुकाव गांधी और तिलक द्वारा रूढ़ियों के खिलाफ शुरू हुईं मुहिम की तरफ बढ़ा लेकिन आदर्शवादी सिद्धांतों के कारण शीघ्र ही मोहभंग हो गया ।वे तो रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष के पक्षधर थे ।जड़ताओं के विरुद्ध धुंआंधार लिखकर प्रतिरोध झेले ।स्वाधीनता संघर्ष के दिनों में प्रेमचंद ने ब्रिटिश साम्राज्य की पूंजीवादी साम्प्रदायिक चालबाजियों का खुलासा किया जिनसे हमारा आन्दोलन कमजोर पड़ रहा था ।वे साम्प्रदायिक दंगों और कट्टरपंथियों की तानाशाही को मनुष्यता के लिये सबसे बड़ा खतरा मानते थे ।संस्कृति के प्रगतिशील एवं जनोपयोगी मूल्यों के प्रति उनकी समझ तार्किक और साफ थी ।प्रेमचंद ने अपने एक आलेख ,साम्प्रदायिकता एवं संस्कृति में लिखा है-“यह जमाना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिसमें जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिसमें धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास पाखंड और गरीब शोषण मुक्त हों ।”
आज जनता को अपनी संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न जरूरत ।संस्कृति अमीरों का ,बेफ्रिकों का व्यसन है ।दरिद्रों के लिये प्राण रक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है। कट्टरपंथी उनके सदैव निशाने पर रहे ।आजादी की लड़ाई में वे इन्हें बाधक मानते थे ।
प्रेमचंद ने पूंजीवाद के दुष्परिणामों और इसकी जनविरोधी प्रवृत्तियों को समय रहते पहचान लिया था। महाजनी सभ्यता लेख में लिखते हैं -मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने खपने वालों का है जिन्हें अपनी शक्ति और प्रभाव से बस में किया गया है। इनके साथ कोई हमदर्दी नहीं, कोई रियायत नहीं। उनका अस्तित्व केवल इसलिये कि वे मालिकों के लिये पसीना बहायें, खून गिरायें और एक दिन चुपचाप इस दुनियां से बिदा हो जायें ।गोदान का होरी भी अंतत: इस महाजनी सभ्यता का शिकार होता है ।प्रेमचंद की चर्चित कथा कफन के दोनों चरित्रों की कमजोरियों मौकापरस्ती, संवेदनहीनता भी अंततः पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्यता पर गहराते संकट का संकेत देती है ।

याद आती है नमक का दारोगा इस कहानी की शुरुआत प्रेमचंद जिस तरह से करते हैं, उससे ही इसकी आगे की तस्वीर थोड़ी-थोड़ी साफ होने लगती है। वो लिखते हैं- ‘जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे.’ यानि नमक का गलत ढंग से व्यापार करने लगे।
इसके बाद प्रेमचंद एक ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ किरदार वंशीधर को रचते हैं जो गलत के खिलाफ सशक्त होकर आवाज़ उठाता है और पंडित अलोपीदीन को नमक के कालाबजारी के आरोप में गिरफ्तार करवा लेता है, अलोपीदीन को अपने धन पर अटूट विश्वास होता है तभी तो वे कहते हैं- ‘न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं ।’अलोपीदीन अपने धन की ताकत और रसूख के दम पर अदालत से छूट जाता है और उल्टे वंशीधर को दंड मिलता है।यह कहानी आज भी हमारे इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है।अंतर सिर्फ यह है तब अंग्रेजों का शासन था आज कथित तौर पर जनता का शासन है आज भी ईमानदार ,सच बोलने और दिखाने वाले वंशीधर जेल में हैं।न्याय और नीति आज लक्ष्मी के खिलौने तो है ही वे आज राजनैतिक तुष्टिकरण के पर्याय भी बन चुके हैं। प्रेमचंद की कहानियां आज और ज्यादा प्रासंगिक है तथा अवाम को जगाने का काम करती हैं।वे जो शरारा छोड़ गए हैं वह मशाल बने तब बात बनेगी।

            कहा जा सकता है  बापू ने जो काम राजनीति के माध्यम से किया वह प्रेमचंद ने कलम से किया ।गोर्की की भांति उन्होंने भी दुर्बलताओं, विषमताओं, विपन्नता में न केवल सौन्दर्य की खोज की बल्कि उन कारणों की तलाश कर उन पर चोट की । वे शोषण के समस्त रूपों के  खिलाफ है उनका सम्पूर्ण साहित्य जनता का ऐसा साहित्य है जिसमें सामान्य व्यक्ति नायक है ।उनका साहित्य समाज में गति, संघर्ष और बैचेनी पैदा करने की क्षमता रखता है । यकीनन वे जनयोध्दा ही नहीं बल्कि पूरा आन्दोलन थे ।
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