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वर्तमान समय बनाम आस्था व अंधविश्वास

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-निर्मल कुमार शर्मा

पिछले कुछ दिनों पूर्व अजमेर के एक गांव में एक वृद्धा ,अशक्त महिला को ‘डायन ‘ बताकर उसे क्रूरता से मारपीट और अमानवीय अपमान करना व बूंदी में एक अबोध बच्ची से एक पक्षी {टिटहरी } के अंडे फूट जाने पर उसे ऐसा दण्ड दे देना कि वह बच्ची नदी में डूब कर मर गई । आज इस तरह की घटनाएं लगभग प्रत्येक दिन देश के किसी न किसी भाग में होती ही रहतीं हैं ,परन्तु बहुत सी घटनाएं समाचारों की सुर्खियां नहीं बन पातीं ,वे वहीं दफ़न हो जाती हैं ।


बौद्ध धर्म इकलौता धर्म है जो एक वैज्ञानिक धर्म है जो अंधविश्वासों का भरपूर खण्डन करता है ,आर्यसमाज में भी स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म में व्याप्त बुराईयों और मूर्ति पूजा का जोरदार खण्डन और विरोध किया था ,परन्तु बौद्ध धर्म और आर्य समाज में भी दुःखद रूप से कुछ-कुछ बुराईयाँ और पाखंड का समावेश होता जा रहा है । भारत में दुनिया के अन्य जगहों की तुलना में अंधविश्वास कुछ ज्यादे ही है ,भारतीय समाज में हमें बात-बात में अंंधविश्वासी बातों की जकड़न से दो-चार होना पड़ता है ।
आज भारत में बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई है , एक तरफ भारत के वैज्ञानिक , प्रबुद्ध और प्रगतिशील लोग समय के साथ दुनिया और आधुनिक ज्ञान विज्ञान के साथ कदमताल मिलाते हुए भारतीय समाज और संपूर्ण देश को तर्कशीलता और वास्तविकता की धरातल पर खड़ी आधुनिक दुनिया के समकक्ष ले जाने के लिए प्रयत्नशील हैं तो दूसरी तरफ कुछ स्वार्थी राजनैतिक और धार्मिक तत्व कथित आस्था { धार्मिक आस्था } के नाम पर पाखंण्ड , पौराणिककाल की दकियानूसीभरी बातों , अंधविश्ववास, मूढ़ता ,जादूटोने ,छूआछूत ,भूतप्रेत और तमाम मूर्खतापूर्ण बातों को पुनर्प्रतिष्ठित कराने का पुरजोर कोशिश कर रहे हैं ।
उदाहरणार्थ पिछली शताब्दी में भारतीय समाज की मानवीयता के नाम पर कलंक और क्रूरता और वहशीपन की सारी मर्यादाओं को लांघती ‘सती प्रथा ‘भी राजा राम मोहन राय और गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिंग के अथक प्रयासों से बन्द हुई थी ,भी तत्कालीन समय और समाज में ‘आस्था ‘ की कसौटी पर बिल्कुल सही ही थी ,परन्तु क्या वह मानवीयता और न्यायपरक दृष्टिकोण पर ‘सही ‘ हैं ? ,बिल्कुल नहीं । ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं ।
आज सुप्रीमकोर्ट के समयोचित ,मानवोचित और न्यायोचित निर्णयों चाहे वे प्रदूषण की समस्या पर हों या सबरीमाला मन्दिर में सभी स्त्रियों के भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए दिए गये न्यायोचित निर्णयों पर भी कुछ धर्म के कथित ठेकेदारों और वोट के लालची राजनैतिक दलों के नेताओं के इस बयान पर कि ‘सुप्रीम कोर्ट ऐसे निर्णय न दे ,जिसका पालन ही न हो सके ‘ ,सिवाय जाहिलता और मूर्खता के कुछ नहीं है ,आखिर ये चुनी हुई सरकारें सुप्रीमकोर्ट की न्यायोचित और समयोचित निर्णयों को आस्था के नाम पर विरोध करके ,अपने हिन्दुओं के वोट की लालच में , क्या पुराने अंधविश्ववासी विचारधाराओं को पुनर्प्रतिष्ठित करके आधुनिक समय के विपरीत जाने की मूर्खता नहीं कर रहीं हैं ?
हिन्दू ,मुस्लिम ,ईसाई आदि विभिन्न सभी धर्मों में भी इनके अभिर्भाव के समय की वही पुरानी घिसीपिटी ,उस समय की तथ्यहीन और जाहिलता भरी बातों की भरमार है । आज की दुनिया में सभी देश व वहाँ का समाज विज्ञान के आलोक में अपने यहाँ नये विचारों , शोधों ,अविष्कारों से अपने में सुधार ला रहे हैं । इसी प्रकार हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई ये धार्मिक पुस्तकें और उनके धार्मिक ठेकेदारों को क्या समय के साथ अपने चाल-ढाल और आस्था के नाम पर मूर्खतापूर्ण सोच और कृत्यों में सुधार नहीं करना चाहिए ? जहाँ भी ‘आस्था ‘ की बात होती है वहाँ जाहिलता ,अँधविश्वास और मूर्खतापूर्ण बातें होने लगतीं हैं । अब समय आ गया है कि ये कथित धर्म के ध्वजवाहक अपनी विचारधारा और कृत्य समयानुसार आधुनिक समय के अनुसार बदलें । आधुनितम समय में वे आस्था के नाम पर मूर्खतापूर्ण और औचित्यहीन बातों को शिक्षित और सभ्य पीढ़ी पर ‘थोप ‘नहीं सकते ।

-निर्मल कुमार शर्मा , गाजियाबाद,संपर्क – 9910629632

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