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*निजीकरण और हड़ताल

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*मनीष सिंह*

बैंक यूनियन आता है, निजीकरण का डर दिखाता है, हड़ताल करवाता है। बैंक यूनियन के जाल में नही फंसना चाहिए। 
यह तोता रटन्त रट लीजिए, और कारण इस कथा से समझ लीजिए। –एक समय की बात है। भारतपुर में राम नामक लोहे का व्यापारी था। उसने 100 रुपये का कर्ज लेकर, लोहा खरीदा। जिसे वह 130 रुपये में बेचकर, बैंक को 112 रुपये लौटा देता। इस तरह राम के 18 रुपये मुनाफे के बच जाते। 
यह काम वह कई बरसों से सफलता से कर रहा था। लेकिन इस बार एक दरिंदर नामक गली का गुंडा, हावी हो गया है। वह राम की दुकान खुलने नही देता। उसके ग्राहकों को धमकाता है। उसकी दुकान के सामने गड्ढा खुदवा देता है। 


जब राम अपना लोहा बेच नहीं पाया, तो उसमे जंग लगने लगी। बैंक का कर्ज एनपीए हो गया। एनपीए होने की, शहर के अखबार में बड़ी बड़ी खबरें छपी। एंकरों ने डिबेट चलाई, राम बदनाम हो गया। आखिरकार, किश्ते न पटने पर, बैंक राम की दुकान पर कब्जा कर लिया और सारे लोहे की नीलामी करवा दी। —श्याम, जो दरिंदर का दोस्त था, और तेल बेचता था। अब उसने चटपट एक लोहे की दुकान खोल ली। फिर 100 का माल, (जो अब ब्याज के साथ 150 का हो चुका) नीलामी में मात्र 30 रुपये में खरीद लिया (क्योकि दरिंदर ने और किसी को, नीलामी में घुसने ही नही देता) 
इस तरह बैंक को 150 के बदले 30 मिलते हैं। और श्याम को 100 का माल 30 मे। 
बैंक के 120 रुपये डूब जाते हैं, लेकिन श्याम को, एक झटके में 70 रुपये का मुनाफा हो जाता है। वह रातोरात अब उसका नाम फोर्ब्स की लिस्ट में आ जाता है। वह एशिया का सबसे बड़ा अमीर हो जाता है। मोहल्लेवाले उसकी सफलता पर रोज सुबह उठकर गर्व करते है। ~यह न्यू इंडिया में सफलता का शार्टकट है। जहां पूरी मेहनत के बाद राम, महज 18 रुपये कमाता, श्याम झटके में 70 रुपये कमा गया। उसे सिर्फ एक काम करना था। उसे दरिंदर के गैंग का पूरा खर्च उठाना था, और नई दुकान खोलने का स्वांग करना था। ~पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। 
बैंक का बिकना बाकी है मेरे दोस्त। तो बैंक ऐसे कई रामः, रामौ, रामा: का घाटा सह- सहकर डूब जाता है। लेकिन अभी भी उसके पास बहुत पैसे है। तो अब दरिंदर और श्याम उसे भी खरीदने के जुगाड़ में हैं। 
बैंक एसोसिएशन हड़ताल करती है। पर हमें उसका साथ नही देना चाहिए। क्योकि … 
(1) बैंक यूनियन वामपन्थ की निशानी है। बैंक के कामचोर, ताश खेलने वाले, बदतमीज और आलसी कर्मचारियों पर ध्यान नही देना चाहिए। ( आइडियोलॉजीकल कारण)
(2)  यूनियन मे जो हिन्दू है, वो गद्दार हैं। जो मुसलमान है वो पाकिस्तानी है, और जो सिख हैं, वो खालिस्तानी है। ये सब लोग टुकड़े टुकड़े गैंग है। ( राष्टवादी कारण) 
(2) दरअसल अगर बैंक ही न होता, तो राम कर्ज ही न लेता, और न यह सब झमेला पैदा होता। आगे भी अगर बैंक रहेगा, दरिंदर रहेगा, तो रामः, रामौ, रामा: कर्जा लेते रहेंगे, श्याम उन्हें बर्बाद करता रहेगा, इस तरह जनता का पैसा डूबता रहेगा। जब न रहेगा बैंक, तो न बचेगी बांसुरी (इकॉनमिस्ट कारण) 
(3) इंदिरा ने प्राइवेट सेक्टर के बैंक, अधिग्रहण किये थे। यह अन्याय था, जिस तरह एयरइंडिया को टाटा से छीन लेना अन्याय था। देश मे बहुत कुछ गलत हो चुका। अब हम , सत्तर साल की गलतियां, सारी एक साथ, सही करेंगे। टाटा की एयरलाइन टाटा को, और बाटा का बैंक बाटा को लौटाएंगे  ( न्यायपूर्ण कारण) 
(4) दरिंदर रोज भंडारे चलाता है। गली के मंदिर भी बनवाता है। उसके होने से अब्दुल की पंचर वाली दुकान पहले ही बन्द हो चुकी। वही अब्दुल, जो बीफ खाता है, और जिसने 132 पीढ़ी पहले तराइन के युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान को हराया था। ( धार्मिक, सांस्कृतिक एवम ऐतिहासिक कारण) 
(5) ……….. ( आज वाला फ़ारवर्ड आते ही जोड़ दूंगा) —-तपस्या में थोड़ी कमी जरूर है दरिंदर में, लेकिन विकल्प भी तो नही है। दरिंदर नही तो और कौन..??? 
हमे दरिंदर को थोड़ा और वक्त देना चाहिए। यही कोई, दस बीस या पचास साल, क्योकि मार्किट में और भी बहुत सी दुकानें श्याम के लिए बिकनी बाकी है। —इसलिए भाइयों, भैनो, च्युतियों। तोता रटन्त रट लीजिये। 
“बैंक यूनियन आता है, निजीकरण का डर दिखाता है, हड़ताल करवाता है। बैंक यूनियन के जाल में नही फंसना चाहिए”  
*मनीष सिंह*

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