भरत झुनझुनवाला
एबीजी शिपयार्ड ने पिछले 16 वर्षों में 165 पानी के जहाज बनाए। इनमें से 46 का निर्यात हुआ। इस कंपनी को अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों जैसे लॉयड्स, ब्यूरो वेरिटास, अमेरिकन ब्यूरो ऑफ शिपिंग जैसों से अच्छी रेटिंग मिली हुई थी, जो किसी कंपनी की वित्तीय मजबूती का संकेत होता है। लेकिन 2008 वैश्विक संकट के बाद जहाजों की मांग कम हो गई और कंपनी संकट में आ गिरी। 2013 में कंपनी लिए गए लोन की अदायगी नहीं कर सकी और इस लोन को बैंकों ने नॉन-परफॉर्मिंग एसेट यानी खतरे वाला कर्ज घोषित कर दिया।
बैंकों की लापरवाही
इन सबके बावजूद 2016 की ऑडिट रिपोर्ट में सिर्फ इतना बताया गया कि एबीजी शिपयार्ड को घाटा लगा है। यह भी कहा गया कि कंपनी ने समुचित पारदर्शिता के साथ अपनी स्थिति को बैलेंस शीट में दिखाया है। ऑडिट रिपोर्ट में किसी भी धोखाधड़ी की बात नहीं बताई गई। इसके बाद 2018 में लोन देने वाले बैंकों की एक सामूहिक मीटिंग में निर्णय लिया गया कि कंपनी के खातों की फॉरेंसिक यानी आपराधिक जांच कराई जाए। इस काम के लिए अर्नस्ट एंड यंग सलाहकारी कंपनी को नियुक्त किया गया। अर्नस्ट एंड यंग ने जनवरी 2019 में अपनी रिपोर्ट में बताया कि कंपनी के मालिकों ने घपला किया है। लोन ली गई रकम को उन्होंने अपने निजी बैंक खातों में भेज दिया। वैसे, इसमें यह नहीं बताया गया कि घपले की रकम कितनी थी। शायद तब खोदा पहाड़ और निकला चूहा वाली स्थिति बनी क्योंकि कंपनी को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली हुई थी।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को उस वक्त कंपनी में धोखाधड़ी की जानकारी हो गई, लेकिन उसने पहली शिकायत नवंबर 2019 में यानी 10 महीने बाद दायर की। बैंक ने दूसरी शिकायत अगस्त 2020 में की और इसके एक साल बाद सीबीआई को एबीजी शिपयार्ड मामले की जांच सौंपी गई। अब कहा जा रहा है कि कंपनी ने बैंकों के साथ बहुत बड़ा स्कैम किया है। आश्चर्य है कि बैंकों को यह बात अर्नस्ट एंड यंग की जनवरी 2019 की रिपोर्ट के बाद ही समझ में आई। आखिर उनके अपने आतंरिक ऑडिटर क्या कर रहे थे? बैंक इतने समय तक सो क्यों रहे थे?
एबीजी शिपयार्ड को लोन देने वाले प्रमुख बैंकों में आईसीआईसीआई, एसबीआई, आईडीबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन ओवरसीज बैंक शामिल थे। आईसीआईसीआई इनके बीच लीड बैंक था यानी इस लोन की प्रमुख जिम्मेदारी उसी की थी। अन्य बैंक उसका अनुसरण करते थे। इसी आईसीआईसीआई बैंक पर 2018 में मनी लॉन्ड्रिंग यानी नंबर 2 के धन को नंबर 1 में बदलने का आरोप लगाया गया था। इसकी प्रमुख चंदा कोचर के पति दीपक कोचर के वीडियोकॉन से निजी संबंध थे। इसी वीडियोकॉन को आईसीआईसीआई बैंक ने लोन दिए गए और इस मामले में चंदा कोचर को पद से हटाया गया।
एबीजी शिपयार्ड बुनियादी तौर पर मजबूत कंपनी थी। उसका कामकाज वैश्विक था। 2008 वैश्विक संकट के बाद इसकी स्थिति बिगड़ती गई। कहावत है कि बनिये की दो पूर्णिमा एक जैसी नहीं होती। व्यापार में लाभ-हानि लगी रहती है। इसलिए एबीजी शिपयार्ड का दिवालिया होना विशेष बात नहीं है। विशेष बात यह है कि बैंकों द्वारा इस बिगड़ती स्थिति को समय रहते क्यों नहीं समझा गया?
असल में, बैंक समेत तमाम सार्वजनिक इकाइयों के अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ और सार्वजनिक इकाइयों के स्वार्थ में भेद होता है, जोकि निजी कंपनियों के अधिकारी और निजी कंपनी के स्वार्थ में नहीं होता। निजी उद्यमी यदि बैंक चलाता है तो उसका प्रयास रहता है कि बैंक पैसा कमाए। उनके सैलरी पैकेज में कुछ मानक हासिल होने पर अतिरिक्त रकम दी जाती है।
इसके विपरीत सरकारी बैंकों के मुख्य अधिकारी अगर बैंक के लिए अधिक पैसा कमाते हैं तो उन्हें इस तरह का कोई लाभ नहीं होता। इसलिए सरकारी बैंकों के लिए यह लाभप्रद हो जाता है कि वे घटिया ऋण दें और रिसाव इत्यादि पर खामोशी बनाए रखें। 2 लाख रुपये प्रति माह का वेतन पाने वाले के लिए 20 करोड़ की घूस आकर्षक होती है। 200 करोड़ का लाभ कमाने वाले निजी उद्यमी के लिए वही 20 करोड़ की घूस निरर्थक होती है।
इसलिए इसे अचानक की घटना नहीं माना जाना चाहिए। इस तरह के मसले सरकारी बैंकों के डीएनए में रहे हैं। अपने देश में लगातार तमाम बैंकों के स्कैम होते रहे हैं और मैं दावे के साथ कह सकता हूं ये आगे भी होते रहेंगे क्योंकि सरकारी बैंकों के अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थों की सिद्धि के लिए घूस लेकर या राजनीतिक दबाव में घटिया ऋण देना लाभप्रद होता है। समय आ गया है कि केंद्र कठोर निर्णय लेकर सभी सरकारी बैंकों का शीघ्र निजीकरण करे, जिससे बैंकों की ओर से सही कर्ज ही दिए जाएं।
आरबीआई को मजबूत बनाएं
इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि निजी बैंकों की ओर से ऐसी गड़बड़ी ना हो। लेकिन वहां रिजर्व बैंक के नियंत्रकों और निजी बैंक के मालिक के बीच घर्षण होता है, जबकि सार्वजनिक इकाइयों में चोर चोर मौसेरे भाई हो जाते हैं। जैसे, आईसीआईसीआई बैंक के मुख्य अधिकारी और रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर दोनों ही एक ही जमात के होते हैं। इनकी आपसी दोस्ती होती है। ये एक दूसरे के विरुद्ध कठोर कदम नहीं उठाना चाहते, इसलिए सरकारी बैंकों में धोखाधड़ी व्याप्त रहती है।
इसीलिए हमारी परंपरा में क्षत्रिय और वैश्य के बीच घर्षण को जरूरी बताया गया है। समय आ गया है कि सरकार सभी सार्वजनिक बैंकों का शीघ्र निजीकरण और रिजर्व बैंक की नियंत्रक भूमिका को सुदृढ़ करे, जिससे सरकारी बैंकों द्वारा देश की पूंजी का एबीजी शिपयार्ड जैसी डूबती हुई कंपनियों को कर्ज देकर स्वाहा ना किया जाए।
ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

