अजीब इत्तेफाक है कि कई बार दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन जब अपनी जायज मांगों के लिए हड़ताल पर जाती थी तो लगता था की प्रोफेसर बेते इस इंतजार में है कि कब इस हड़ताल के खिलाफ टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लेख लिखू। एक नामवर शिक्षा शास्त्री होने के बावजूद उनकी सोच विश्वविद्यालय प्रशासन के समर्थन में रहती थी। ऐसे में जब यूनिवर्सिटी का कन्वोकेशन हॉल हजारों शिक्षकों से भरा होकर अपनी मांगों का समर्थन करता था उस समय मैं बहुत ही आक्रामक भाषा में उन पर हमला करता था। परंतु उनकी महानता इस बात में थी कि जब कभी भी दिल्ली स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के कॉफी हाउस में मेरा आमना सामना हो जाता था तो बड़ी मुस्कुराहट से कहते थे सुना है कि तुमने बड़ा जोरदार भाषण मेरे खिलाफ दिया। तो मैं भी अदबके साथ कहता था सर आप भी इसी मौके की तलाश में रहते हैं। मैं अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।।
राजकुमार जैन

