भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (आरडब्ल्यूपीआई) ने दिल्ली-एनसीआर की विभिन्न क्रान्तिकारी मज़दूर यूनियनों जैसे बिगुल मज़दूर दस्ता, ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री कॉण्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन, बवाना इण्डस्ट्रियल एरिया वर्कर्स यूनियन, करावलनगर मज़दूर यूनियन, दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन, दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन और दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन के साथ मिलकर मोदी सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गयी चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) के ख़िलाफ़ सोमवार को शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया।
प्रदर्शन में शामिल मज़दूरों, छात्रों और आम नागरिकों को सम्बोधित करते हुए विभिन्न संगठनों के सदस्यों ने कहा कि पूँजीपति वर्ग के अधिकतम मुनाफ़े को सुनिश्चित करने के लिए इन चार लेबर कोड को लागू किया गया है। ये लेबर कोड मज़दूरों के शोषण को और बढ़ायेंगी तथा उन्हें ग़ुलामी जैसी परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर करेंगी।
सभा को आरडब्ल्यूपीआई की ओर से योगेश ने चार लेबर कोड के ख़तरों को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि चार लेबर कोड में पहला कोड वेतन संहिता (कोड ऑफ वेजेस) है। ये मालिकों को कई रास्ते देती है जिनके माध्यम से वे मज़दूरों को न्यूनतम वेतन देने की अपनी ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं। यह संहिता मज़दूरों से आठ घण्टे से अधिक काम करवाने और उसका ओवरटाइम न देने की प्रथा को भी वैध बनाती है।
दूसरा कोड है व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता। यह असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को पूरी तरह नज़रअन्दाज़ करती है। चूँकि यह केवल उन कार्यस्थलों पर लागू होती है जहाँ दस से अधिक कर्मचारी हैं, इसलिए भारत की व्यापक मज़दूर आबादी इस दायरे से बाहर हो जाती है, जिससे मालिकों को मज़दूरों को बुनियादी और सम्मानजनक कार्य स्थितियाँ देने से बचने की खुली छूट मिल जाती है।
तीसरा कोड है सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा संहिता। यह संहिता सरकार या मालिकों पर ईएसआई, पीएफ, ग्रेच्युटी, पेंशन, मातृत्व लाभ और अन्य सुरक्षा प्रदान करने की बाध्यता पूरी तरह समाप्त कर देती है। अब ये सभी लाभ केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी की जाने वाली अधिसूचनाओं पर निर्भर होंगे।
चौथा कोड है औद्योगिक सम्बन्ध संहिता। यह मालिकों के लिए मज़दूरों की रोजगार सुरक्षा की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का रास्ता साफ़ करती है। अब मज़दूरों को काम पर रखना और निकालना मालिकों के सुविधानुसार होगा।
इसके अलावा, अब 300 तक मज़दूरों वाली फैक्ट्रियों (पहले यह सीमा 100 थी ) को छँटनी या काम बन्द करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। अब मज़दूरों को हड़ताल करने के लिए 60 दिन पहले नोटिस देना होगा। इसके साथ ही कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली को पूरी तरह वैध कर दिया गया है।
बिगुल मज़दूर दस्ता की ओर से भारत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पहले भले ही पुराने श्रम कानूनों का पालन कमज़ोर था, लेकिन कई जगहों पर चाहें मज़दूर असंगठित हों या संगठित, वे एकजुट होकर, लेबर कोर्ट का रुख करके, अपनी सामूहिक ताक़त के दम पर कई बार जीत भी हासिल कर पाते थे। लेकिन अब, जब उन सभी पुराने क़ानूनों को पूरी तरह रद्द कर दिया गया है, नये लेबर कोड मज़दूरों से वे औपचारिक अधिकार भी छीन लेती हैं जो पहले उनके पास थे।
वास्तव में ये चारों लेबर कोड कारख़ाने के मालिकों, कॉरपोरेट घरानों के साथ ही पूरे पूँजीपति वर्ग को मज़दूरों का बेरोकटोक शोषण करने की खुली आज़ादी दे देती है। अब मालिकों को मज़दूरों से काम लेने की पूरी छूट है, बिना यह सुनिश्चित किये कि उन्हें जीवन जीने योग्य वेतन, सामाजिक सुरक्षा या मानवोचित कार्य स्थितियाँ प्राप्त हों।
सभा को बवाना इण्डस्ट्रियल एरिया वर्कर्स यूनियन के आशीष, करावलनगर मज़दूर यूनियन के विशाल, दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन के केशव, दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन की नौरीन और दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन की ओर से प्रियम्वदा ने भी संबोधित किया।
वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि आज न सिर्फ़ मज़दूरों को बल्कि आम मेहनतकश और इंसाफ़पसन्द आबादी को भी इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ आगे आना होगा।
प्रदर्शनकारियों ने चार लेबर कोड को तुरन्त रद्द करने की माॅंग की। इसके साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि यदि हम अभी इन मज़दूर विरोधी क़ानूनों, जो पूँजीपतियों को मज़दूरों का बेरोकटोक शोषण और दमन करने की पूरी छूट देती हैं, के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष नहीं करते, और यदि हम सरकार को इन्हें वापस लेने के लिए जुझारू संघर्ष, विशेषकर अनिश्चितकालीन हड़ताल, शुरू नहीं करते, तो कल बहुत देर हो चुकी होगी।

