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प्रवृत्ति का छद्म द्वंद प्रकृति से

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शशिकांत गुप्ते

एक ओर बुलडोजर के द्वारा आशियाने जमीदोंज किए जा रहें हैं, दूसरी ओर कुछ आशियाने खुद ही दरक रहें हैं। एक कमाल मानव की प्रवृत्ति का है,दूसरा नतीजा प्रकृति के साथ खिलवाड़ के कारण भुगतना पड़ रहा है।
दोषी कौन? इस सवाल का जवाब किसी विचारक की इस सूक्ति में है।
किसी की बुराई तलाश करने वाले इंसान की मिसाल उस मक्खी की तरह होती है, जो सारे खूबसूरत जिस्म को छोड़कर केवल ज़ख्म ओर ही बैठती है
हमेशा दोषियों को सजा देने का रटारटाया आश्वासन रूपी परंपरागत वादा तो किया ही जाता है।
शायर नज़ीर इलाहाबादी ने क्या खूब कहा है।
तिरी तस्वीर तो वा’दे के दिन खिंचने के क़ाबिल है
कि शर्माई हुई आँखें हैं घबराया हुआ दिल है

फिर भी जो शाब्दिक वादों पर यकीन करतें रहतें हैं। ऐसे लोगों के लिए शायर दुष्यन्त कुमारजी का यह शेर सटीक है।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभाला यारों

साहित्य समाज का दर्पण है। इसी दर्पण के माध्यम से यह दिखाना है। दुष्यन्त कुमार अपने इस शेर के माध्यम से यथार्य को बयाँ करते हैं।
मैं बेपनाह अँधेरे को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

साहित्य के दर्पण से यथार्थ निरंतर दिखाना चाहिए। यह एक अंनत सिलसिला है।
इस मुद्दे पर शायर एजाज़ रहमानीजी इस शेर के माध्यम से सलाह देतें हैं।
अभी से पाँव के छाले न देखों
अभी यारों सफ़र की इब्तिदा है
(इब्तिदा का शुरुआत)
परिवर्तन का जज़्बा रखने वाले अपने जहन में यह संदेश मज़बूती के साथ रखतें हैं।
यह संदेश शायर एजाज़ रहमनीजी ने इस शेर में कहा है।
जो तूफ़ानो में पलते जा रहें हैं
वही दुनिया बदलते जा रहें हैं

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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