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अंतरराष्ट्रीय कसौटी पर भारतीय न्यायपालिका की साख का सवाल ?

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सनत जैन

भारतीय न्यायपालिका की साख अंतरराष्ट्रीय कसौटी पर कसी जा रही है। स्वतंत्रता के बाद से लगभग 2014 तक भारत की न्यायपालिका जिस तरह से काम करती थी, उसके कारण भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, भारतीय न्यायपालिका की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत भरोसेमंद और मजबूत थी। भारतीय न्यायपालिका कभी सरकार के अधीन नहीं रही। भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर ऐसे-ऐसे फैसले दिए, जिस कारण भारत की संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं तथा भारतीय कानून का सम्मान सारी दुनिया के देशों में बना हुआ था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता था।

मानव अधिकारों को लेकर भारत की सारी दुनिया में प्रशंसा होती थी। अंतरराष्ट्रीय जगत में इस बात की प्रशंसा भी होती थी, कि भारत एक ऐसा देश है, जिसमें सभी धर्म और संस्कृति के लोग एक साथ निवास करते हैं। शांतिपूर्ण ढंग से रहते हैं। यह दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय भी था। भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं की चर्चा सारी दुनिया के देशों में होती थी। पिछले एक दशक में भारतीय न्यायपालिका को लेकर समय-समय पर ऐसी बातें सामने आती रही हैं, जिसमें न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम करती हुई दिख रही है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से आरोपों के आधार पर आरोपियों को कई महीने और वर्षों तक जेल में बंद करके रखा जा रहा है। कुछ इस तरीके के कानून बनाए गए हैं, जिसमें न्यायालय को जमानत देने के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। इसे सरकार का उत्पीड़न माना जा रहा है।

न्यायपालिका जिस तरीके से काम कर रही है, उसको देखते हुए यह सारी दुनिया में महसूस किया जा रहा है, कि भारतीय न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम कर रही है। पिछले एक दशक में भारत सरकार ने जो कानून बनाए हैं। कानूनो में जो संशोधन किए हैं। उससे नागरिकों की स्वतंत्रता के अधिकार बाधित हो रहे हैं। न्यायपालिका कई कई वर्षों तक इस तरह के कानून के मामलों की सुनवाई नहीं करती है। सरकार द्वारा बनाए गए कानून, और की गई कार्यवाही पर न्यायपालिका त्वरित सुनवाई और आदेश पारित नहीं करती है। जिसके कारण आरोपों के आधार पर आरोपियों को कई महीनो और सालों तक जेल में बंद रखा जा रहा है। भारतीय संविधान, लोकतांत्रिक एवं मानव अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियमों को भारत सरकार ने भी स्वीकार किया है। उनका पालन अब भारत में नहीं हो रहा है।

हाल ही में केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय द्वारा मनी लॉंड्रिंग एक्ट में विपक्षी दलों के राजनेताओं के ऊपर जो कार्रवाई की जा रही है, उन्हें वर्षों तक गिरफ्तार करके जेल में बंद रखा जा रहा है। हाल ही में चुनावी बांड को लेकर जो जानकारी सामने आई है। उसकी क्रिया और प्रतिक्रिया सारी दुनिया के देशों में देखने को मिल रही है। लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा जिस तरह से विपक्ष को परेशान किया जा रहा है। हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के मामले में जर्मनी और अमेरिका ने जिस तरह से मुखर होकर चिंता जताई है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी लगभग इसी तरह से गिरफ्तार किया गया था, जो अभी भी जेल में बंद है। न्यायालय से उन्हें कोई राहत नहीं दी जा रही है। जांच एजेंसियां कई महीने और वर्षों तक जांच करने के नाम पर विपक्षी दलों के नेताओं को जेलों में बंद रख रही हैं। उसके बाद से भारत की न्यायपालिका की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है।

वैश्विक व्यापार समझौते के बाद सारी दुनिया के देशों से भारत के राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंधों के साथ-साथ आर्थिक संबंध भी विकसित हुए हैं। चुनावी बांड को लेकर जो जानकारियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उजागर हुई हैं। भारत में जिस तरह से विपक्षी दलों और कारोबारी समूह से जुड़े संस्थानों और कारोबारियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। औद्योगिक समूहों के ऊपर भी जिस तरीके की कार्रवाई सरकार द्वारा की जा रही है। उसे मानव अधिकारों और धर्म आधारित उत्पीड़न के रूप में देखा जा रहा है। जिसके कारण भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्थाओं को लेकर जो छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी हुई थी। उसमें धक्का लगना शुरू हो गया है। वैश्विक संस्थाओं द्वारा भारत की वर्तमान स्थिति को लेकर जो चिंता जताई जा रही है। निश्चित रूप से भारतीय न्यायपालिका की अभी तक जो छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी हुई थी।

ठीक उसके विपरीत है। अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए जिस तरह से गिरफ्तार किया गया है। पीएमएलए कानून में वर्षों तक लोगों को बंद करके रखा जा रहा है। कई वर्षों तक जांच के नाम पर विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में बंद करके रखा जा रहा है। उससे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर विश्व स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है। यह माना जाने लगा है, कि भारतीय न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि इस तरीके की छवि भारत की बन रही है, तो भारत सरकार और भारतीय न्यायपालिका के लिए चिंता का विषय है। भारत की न्यायपालिका हमेशा से स्वतंत्र रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायपालिका की छवि को धक्का लग रहा है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को स्वयं आत्म निरीक्षण करने की जरूरत है। यदि न्यायपालिका की साख अंतरराष्ट्रीय जगत में नहीं होगी, तो भारत के विकास और अंतरराष्ट्रीय जगत में भारतीय नेतृत्व को लेकर जो सपने हम आज देख रहे हैं। वह शायद कभी पूरे नहीं होंगे। अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की तुलना अब चीन और पाकिस्तान से जोड़कर की जाने लगी है। यह चिंता का विषय है।

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